November 27, 2010

डिजाइनर कपड़ों के युग में कोसा कारीगरी

- नीलाम्बर प्रसाद देवांगन

छत्तीसगढ़ में कोसा से बने कपड़े का हर साल लगभग 400 से 500 करोड़ का व्यवसाय होता है। राज्य में उत्पादित हो रहे कोसे की खरीदी यदि प्रदेश में ही की जाए तो राजस्व में वृद्धि होने के साथ ही लोगों को कोसा का सही दाम भी मिलेगा।
कोसा से बने वस्त्रों का नाम सुनते ही हर किसी के आंखों की चमक बढ़ जाती है। दरअसल कोसा हमारी परंपरा से जुड़ा हुआ नाम है। ऐसे में कोसा कारीगरी युक्त वस्त्र बाजारों की शोभा बन रहे हैं। आज सबसे ज्यादा किस्में, सबसे ज्यादा डिजाइन, सबसे ज्यादा प्रतिस्पर्धा किसी उद्यम में है तो वह वस्त्र उद्योग में ही है। हर मौसम में हमारा पहनावा बदल जाते है, समुन्दर की लहरों की तरह फैशन आते हंै और चले जाते हैं। यह सिलसिला चलता ही रहता है और चलता ही रहेगा।
हमारे देश में कुटीर उद्योग के रूप में हाथकरघा वस्त्र उद्योग का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि कृषि के बाद सबसे ज्यादा लोगों के रोजगार का सृजन इसी उद्योग के माध्यम से होता है। किन्तु वैश्वीकरण के युग में यक्ष प्रश्न यह है कि आज गलाकाट प्रतिस्पर्धा एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चकाचौंध में हाथकरघा वस्त्र उद्योग को कैसे जीवित रखा जाए। पर खुशी की बात है कि हाथकरघा वस्त्र उद्योग ने कठिनाइयों के दौर से गुजरते हुए भी अपने आप को जीवित रखा है।
हमारे देश में कुटीर उद्योग को संरक्षित कर जीवित रखने रखने का मतलब, देशवासियों को संरक्षित कर जीवित रखना है। हम अपने देश के 100 अरब से भी ज्यादा आबादी को बड़े- बड़े उद्योगों के माध्यम से रोजगार देकर उनका भरण पोषण नहीं कर सकते इसलिए लघु एवं कुटीर उद्योग ही एक ऐसा उद्यम है जिसके माध्यम से हम ज्यादा से ज्यादा लोगों को रोजगार दे सकेंगे और भरण पोषण कर सकेंगे। अत: लघु एवं कुटीर उद्योगों को पर्याप्त संरक्षण एवं सहायता दिया जाना नितान्त आवश्यक है। अन्यथा देश में बेरोजगारी एवं भूखमरी का भयावह संकट पैदा हो जाएगा।
लघु एवं कुटीर उद्योगों को पर्याप्त संरक्षण एवं वित्तीय सहायता देकर ही इस क्षेत्र के उद्यमियों को उन्नत तकनीकी प्रशिक्षण, उन्नत उपकरण द्वारा उत्पादित वस्त्रों के माध्यम से सीधे उपभोक्ताओं से जोडऩा होगा, ताकि उद्यमियों को ज्यादा से ज्यादा लाभ मिल सके। वैसे किसी भी उत्पाद के लिए मार्केटिंग की व्यवस्था सुनिश्चित करना अति आवश्यक होता है। उद्योग में सबसे ज्यादा समस्या मार्केटिंग की होती है यदि छत्तीसगढ़ के कोसा उद्योग की मार्केटिंग की बात करें तो यहां ज्यादा समस्या नहीं है। यहां का कोसा उत्पाद ऐसा है जो हाथों हाथ बिकता है। छत्तीसगढ़ के कोसा वस्त्र देशी और विदेशी बाजार में भी विख्यात है यही वजह है कि कोसा वस्त्रों की मांग अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।
समय के साथ कोसा कपड़ों के डिजाइन में परिवर्तन होने लगा है। कोसा कपड़े में भी सिंथेटिक कपड़ों के समान रंगीन, कसीदाकारी युक्त उडिय़ा बार्डर और ब्लीच्ड कपड़ों का आकर्षण लोगों को कोसा कपड़ों की ओर खींचने लगा है। मौसम कोई भी हो हर मौसम के अनुकूल कोसा का निर्माण हो रहा है इसमें कोसा सूटिंग- शर्टिंग, धोती- कुर्ता, सलवार- सूट और साडिय़ों का विशाल कलेक्शन बाजार में उपलब्ध है। आज कोसा कपड़ा न केवल पूजा- पाठ के समय पहनने वाला कपड़ा माना जाता है वरन अनेक अवसरों, आयोजनों में पहनने का कपड़ा बन गया है। इन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचकर आर्थिक सम्पन्नता हासिल की जा रही है। आज देश के सभी बड़े शहरों दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, कलकत्ता, बेंगलोर, हैदराबाद, सिकंदराबाद, अहमदाबाद, नागपुर, जबलपुर, इंदौर, भोपाल, विशाखापट्टनम, जयपुर, नेपाल आदि में कोसे का व्यवसाय फैला हुआ है। अत: यह कहा जा सकता है कि हाथकरघा वस्त्र उद्योग का भविष्य उज्जवल है।
छत्तीसगढ़ में कोसा से बने कपड़े का हर साल लगभग 400 से 500 करोड़ का व्यवसाय होता है। राज्य में उत्पादित हो रहे कोसे की खरीदी यदि प्रदेश में ही की जाए तो राजस्व में वृद्धि होने के साथ ही लोगों को कोसा का सही दाम भी मिलेगा। इससे उत्साहित होकर कोसा उत्पादक किसान और अधिक मेहनत करेंगे। विभागीय सूत्रों के अनुसार देश में सत्रह हजार लूम हैं जिनमें बुनकर काम करते हैं। इन बुनकरों को प्रतिवर्ष कुल दस करोड़ कोसे की जरूरत होती है, लेकिन उन्हें सिर्फ ढाई करोड़ कोसा ही उपलब्ध हो पाता है। 75 प्रतिशत कोसा धागा यहां के बुनकरों को बाहर से खरीदना पड़ता है। राज्य के छह जिलों वाले बुनकरों को प्रतिवर्ष 18-20 करोड़ का धागा खरीदना पड़ता है। इन बुनकरों को यदि पूरा कोसा यहीं उपलब्ध हो जाए तो उन्हें अपना व्यवसाय करने में आसानी होगी। भले ही उन्हें कोसे से धागा बनाने में समय थोड़ा ज्यादा लगेगा, लेकिन उन्हें काम करने में सुविधा होगा।
विदेशों में भी कोसे के कपड़ों की मांग
खराब कोसे का भी उपयोग- जिस कोसे में छेद हो जाता है उससे पतले और रेशमी धागे नहीं बनते, बल्कि थोड़े मोटे धागे बनते हैं। ऐसे कोसे का उपयोग भी विदेशों में किया जाता है। विदेशों में इससे बनी चादरों को घर की दीवारों पर लगाते हैं। साथ ही उसका उपयोग जमीन पर बिछाने के लिए मेट की तरह भी करते हैं। कोसा वस्त्रों को बनाने के लिए मशीन ज्यादा उपयोगी नहीं है, क्योंकि कोसे का धागा मशीन के झटके नहीं सह पाता।
टसर की मांग- प्योर कोसे से बने कपड़ों की मांग देश के भीतर ही होती है, लेकिन मिक्स कोसे के कपड़ों की विदेशों में सबसे ज्यादा मांग है। इसमें कोसा के धागे में रंगीन और कुछ अन्य धागे मिलाकर बनाया जाता है जो दिखने में काफी आकर्षक और रंगीन होता है।
पता- संचालक, योगिता हैंडलूम, कपड़ा मार्केट, पंडरी, रायपुर (छ.ग.)

0 Comments:

लेखकों से... उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।
माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। माटी संस्था कई वर्षों से बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से उक्त गुरूकुल के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (U.K.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर, रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी, रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से स्कूल जाने में असमर्थ बच्चे शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होंगे ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेंगे। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ.ग.) मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष