November 27, 2010

एक ही परिवार के तीन सदस्य राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित

किसी भी व्यक्ति के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार मिलना कई पीढिय़ों को सम्मानित करने वाला सम्मान होता है। और जब एक ही परिवार की दो पीढिय़ां लगातार देश के इस सर्वोच्च सम्मान से नवाजी जा चुकी हों तो फिर कहना ही क्या। छत्तीसगढ़ राज्य के लिए यह बहुत गौरव की बात है कि जांजगीर जिले के चंद्रपुर ग्राम के बुनकर परिवार के तीन- तीन सदस्यों को कोसा कपड़े में कलाकारी करने और उसकी रंगाई में वनस्पति का उपयोग करने के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार दिया गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस परिवार की दोनों पीढिय़ां आज भी अपनी इस परंपरागत कला की सेवा कर रही हैं।

पहली बार यह राष्ट्रीय पुरस्कार परिवार के मुखिया सुखराम देवांगन को इंद्रधनुषी साड़ी बनाने के लिए सन् 1988 में प्रदान किया गया था। इसके बाद उनके बड़े बेटे नीलांबर प्रसाद देवांगन को 1992 में कोसा सिल्क साड़ी में विशेष कलाकारी करने के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया। इसके अगले ही वर्ष 1993 में कोसा मयूरी साड़ी बनाने के लिए परिवार के ही छोटे बेटे पूरनलाल देवांगन को भी राष्ट्रपति पुरस्कार प्रदान किया गया। ऐसे सम्मान पाले वाले परिवार पर भला किसे गर्व नहीं होगा।
पिता घासीदास से विरासत में मिली कला को सुखराम ने आगे बढ़ाया तो उनके पुत्र नीलाम्बर और पूरन भी पीछे नहीं रहे उन्होंने भी अपने दादा व पिता से मिली इस परंपरागत कला में कुछ और नया करते हुए इस कला में अपने हुनर की छाप छोड़ी। दोनों मिलकर कोसा कपड़े पर आज भी नए- नए प्रयोग कर रहे हैं और प्रदेश का नाम रोशन कर सफलता की ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहे हैं। वास्तव में छत्तीसगढ़ को इस परिवार पर गर्व है।
नीलाम्बर और पूरन ने मिलकर कोसा सिल्क साड़ी पर बस्तर के जीवन को जीवंत करने वाली कारीगरी की। नीलाम्बर का मानना है कि उनका झुकाव परंपरागत कलाओं की ओर पहले से ही था। इस दिशा में कार्य करते हुए ही उन्होंने एक नया प्रयोग करने की ठानी और कोंडागांव के लौह शिल्प की कला को साडिय़ों पर जीवंत कर दिखाया।
छत्तीसगढ़ में इस तरह का यह पहला और अनूठा प्रयास था। उनके इस प्रयास को पूरे देश में सराहा गया। हम गर्व से कह सकते हैं कि हमारे प्रदेश के एक परिवार ने भारतीय शिल्पकला की प्राचीन परंपराओं को जागृत रखा। श्रेष्ठ शिल्पी के लिए नीलाम्बर देवांगन को यह राष्ट्रीय पुरस्कार 12 दिसंबर 2005 को दिल्ली में राष्ट्रपति डॉ ए. पी. जे. अब्दुल कलाम द्वारा दिया गया। वितरण समारोह में इस विधा में पुरस्कार पाने वाले वे सबसे कम उम्र के युवा थे। (उदंती फीचर्स)

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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