December 13, 2008

उफ... ये मौजा ही मौजा ...

उफ... ये मौजा ही मौजा ...
- डॉ. प्रतिमा चंद्राकर

यदि आपको भी आता है गुस्सा तो आइए उस गुस्से को उदंती.com के इस पृष्ठ पर लिख कर उतारने की कोशिश करें। क्योंकि बड़े- बुजूर्ग कहते हैं कि गुस्से को मन में नहीं रखना चाहिए, उसे बाहर निकाल देने से गुस्सा कम हो जाता है, तो यदि उस गुस्से को लिखकर आपस में बांट लें तो गुस्सा कम तो होगा ही साथ ही इसके माध्यम से एक अभियान चला कर संबंधित विभाग और प्रशासन का ध्यान आकर्षित भी कर सकते हैं। साथ ही एक दूसरे की समस्या का समाधान निकालने का प्रयास।

आज सुबह जब मैं कॉलेज जाने के लिए गेट से बाहर निकली तो सामने वाले पड़ोसी के घर में हलचल देखकर एक अजीब सी दहशत और घबराहट होने लगी। शाम को लौटने पर गाडिय़ां और लाइट की सजावट देखकर सारा माजरा समझ में आ गया। मन गुस्से से भर गया यह सोच कर कि आज फिर रात की नींद हराम होगी।
मेरे पड़ोसी का घर बहुत बड़ा है, अपने हवेलीनुमा मकान को वे शादी, जन्म दिन आदि की पार्टी के लिए किराए पर देते हैं। मैं यहां आए दिन होने वाली शादी और पार्टियों से डरने लगी हूं। अरे ... पर यह कॉलम तो गुस्से का है, मैं डर के विषय में क्यों लिख रही हूं? दरअसल मेरा गुस्सा डर में बदल चुका है। मैं लिख रही हूं और मेरे कानों में full sound में मौजा ही मौजा... की आवाज़ गरम लावे की तरह पिघल रहा है। रात के साढ़े दस बज चुके हैं पर डिस्को की कान के पर्दे फोड़ देने वाली आवाज़.... उफ।

मैं और मेरे परिवार का सम्बन्ध पढ़ाई -लिखाई से है। शाम को और देर रात तक इस तरह कि आवाज़ से सभी परेशान रहते हैं। आप सोचते होंगे पढ़ा-लिखा परिवार और जागरूकता जऱा भी नहीं? तो मैं बता दूं तीन वर्ष पहले मैंने पुलिस को इसकी लिखित शिकायत दी थी, कि रहवासी इलाके में देर रात तक इस तरह के आयोजन हेतु कोई अपना घर कैसे किराए पर दे सकता है? पुलिस ने बताया कि उनके पास परमिशन है। ऐसी बात भी नहीं है कि इस कालोनी में अन्य जगरुक लोग नहीं रहते, यहां कई सरकारी अफसर भी रहते हैं पर शिकायत करने का कीड़ा मुझे ही काटा।
हां तो मैं बता रही थी कि जब शादी, जन्मदिन और डिस्को पार्टी का शोर शिकायत करने के बाद भी नहीं रुका तो नियमानुसार सही-सही जानकारी प्राप्त कर पुन: शिकायत पत्र लिखा परन्तु प्रशासन तो प्रशासन है चलेगी तो अपनी ही चाल से। भले ही आज हम चांद तक पहुंचने पर गर्व करें पर चलेंगे उसी बैल गाड़ी वाले युग की चाल।
आज भी स्थिति यह है कि जब तक थाने फ़ोन न करो, लाऊड स्पीकर कि आवाज़ धीमी नहीं होती। थक कर मैंने मानव अधिकार में भी इस सम्बन्ध में शिकायत की है। लेकिन शायद वहां भी उनकी अपनी सीमाएं हैं। देखते-देखते तीन साल बीत गए और दीपावाली के बाद से गर्मी कि छुट्टियों तक हम बारातियों का स्वागत करते भांगड़ा एवं पटाखे तथा गानों की गूंज में जीने के आदि हो गए।
जब-जब इस घर को किराए पर शादी या किसी और पार्टी के लिए दिया जाता है हमारी और हमारे बच्चों की पढ़ाई लिखाई तो प्रभावित होती ही है, यदि हम इस शोर से बचने के लिए घूमने निकल जाते हैं तो रात को लौटते पर अपनी गाड़ी अन्दर रखने हेतु पहले शादी घर जाकर सैकड़ों लोगों से पूछ -पूछ कर अपने गेट के सामने से गाड़ी हटवाते हैं या फिर अपनी गाड़ी सडक़ पर भगवान भरोसे छोडक़र कानों में रूई डालकर सभी दरवाज़े बंद कर सोने कि कोशिश करते हैं।
मेरे बच्चे बड़े हो गए हैं एक तो इसी शोर शराबे के बीच पढ़ते हुए बोर्ड पास कर दूसरे शहर पढऩे चली गई, दूसरी बोर्ड की तैयारी में है। इस तरह हम बरस- दर बरस अपने गुस्से के ग्राफ़ को ऊपर से नीचे करते हुए हार मान कर चुप- चाप बैठ गए हैं।
पर उदंती में गुस्से का यह कॉलम देखकर अपने आपको रोक नहीं पाई और मन छटपटा उठा। उदंती के पृष्ठों के लिए अपने दिल का गुबार निकाल कर मन हल्का तो हो गया लेकिन मेरी समस्या का समाधान मुझे नहीं मिल रहा है। मैंने अपने पढ़े- लिखे होने की जिम्मेदारी पूरी तरह निभाई है और पहल भी की है। लेकिन जब-जब सामने वाले इस घर में जब- जब पार्टी का आयोजन होता है, मेरे गुस्से का ग्राफ बढऩे लगता है। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ है क्योंकि आज रात मुझे कानों में रुई डालकर सोने का प्रयास करना ही पड़ेगा, अन्यथा कल नौकरी पर कैसे जा पाऊंगी।

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