May 15, 2020

दो लघुकथाएँ


1. सूरजमुखी खिल उठे

-सुदर्शन रत्नाकर

दरवाज़े की घंटी बजते ही शीना बिस्तर से उठ कर बाहर आ गई। इतनी सुबह कौन हो सकता है। दरवाजा खोलातो देखा मम्मी जी खड़ी थीं। अनायास ही उसके मुँह से निकला, ‘अरे मम्मी जी आप! इतनी सुबह, सब ठीक तो है न। आपने आने के लिए फ़ोन ही नहीं किया। हम आपको लेने आ जातेउसने एक साथ कई प्रश्न पूछ डाले और साथ ही झुक कर पाँव छू लिए।
सब ठीक है, अंदर तो आने दो।उनकी आवाज़ सुन कर अजय भी उठ कर आ गया। आते ही वह माँ के गले लग गया और उन्हें गोद में उठाने की कोशिश करने लगा।
चल हट ,अभी तुम्हारा बचपना नहीं गया।कहते हुए पुष्पा अंदर आ गई। अजय ने सामान उनके कमरे में रख  दिया।
मम्मी जी फ़्रेश होने के लिए गईं तो शीना उनके लिए चाय-नाश्ता बनाने किचन में चली गई। ट्रे हाथ में लिए जब वह मम्मी जी के कमरे के सामने पहुँची तो उसने सुना, वह कह रही थीं, ‘नहीं परेशानी तो कोई नहीं थी। रिया ने बड़े आराम से रखा लेकिन जब उसके सास -ससुर आ गए तो वह कुछ अधिक ही व्यस्त हो गई थी। घर, परिवार, नौकरी सभी जगह काम करना, पर वह सब सम्भाल लेती थी। इन सबके बीच मुझे परायापन सा लगता था। सोचती शीना से अकारण नाराज़ हो कर अपना घर छोड़ कर यहाँ चली आई हूँ। अपनी बेटी है फिर भी कुछ था, जो ठीक नहीं, अच्छा नहीं लगता था। बेटा अपना घर अपना ही होता है। अब तो शीना ही बहू है, शीना ही बेटी है।
शूल जो चुभा था, निकल गया था।
उसने अंदर आकर मुस्कुराते हुए नाश्ते की ट्रे मेज़ पर रख दी। भोर हो गई थी और सूरज की सुनहरी किरणें खिड़की के रास्ते आकर कमरे में फैल गई थीं मानों हज़ारों सूरजमुखी खिल गए हों।

2. मैं हूँ न

आज माँ की सतरहवीं था। सुबह ही सभी रस्में निभा ली गईं थीं । ब्राह्मणों को भोजन करा लिया गया। दोपहर तक सभी काम निपट गए। शाम की गाड़ी से अंजलि को अपने घर लौटना था। उसका मन बुझा -बुझा सा था। माँ थी तो वह कभी कभार मायके चली आती थी। भाई-भाभी भी उसका ध्यान रखते थे। मायका तो माँ के साथ होता है। वह नहीं रही तो किस अधिकार से आएगी। सबकी अपनी अपनी गृहस्थी है। जीवन की आपा-धापी है । किसी के पास रिश्तों को निभाने का समय कहाँ है !
एक तो माँ नहीं रही, दूसरा पता नहीं भाई-भतीजों से फिर कब मिल पाएगी। यह सोच कर अंजलि के मन में कुछ कँटीला -सा चुभ रहा था। सब कुछ समाप्त हो गया था।
गाड़ी रात आठ बजे छूटनी थी। वह सात बजे घर से निकलने के लिए तैयार हो गई। बार बार मना करने पर भी
भाई- भाभी उसे स्टेशन पर छोड़ने आए। गाड़ी चलने लगी तो भाई ने आँखों में आँसू भर कर कहा, ‘दीदी आप ज़रूर आती रहें। माँ नहीं रही तो मत सोचना कि यहाँ कोई नहीं है । मैं हूँ न दीदी, माँ के बाद मेरा सहारा भी तो आप हैं।भाई ने चलते चलते कहा तो भाभी ने उसकी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, ‘हा दीदी ज़रूर आते रहना। यह भी आपका ही घर है।
गाड़ी के चलने के साथ भाभी के शब्द दूर होते जा रहे थे पर उसका बोझिल मन हल्का हो गया था।

सम्पर्कः ई-29, नेहरू ग्राँऊड, फ़रीदाबाद 12100, मो. 9811251135

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