May 14, 2020

समाजवाद की प्रतीक्षा

 समाजवाद की प्रतीक्षा
-उर्मि कृष्ण    
        गाँववाले जानते थे कि अफसर की अगाड़ी और घोड़े की पिछाड़ी बुरी होती है, इसलिए उस दल के पहुँचने पर गाँववालों ने आपस में कुछ कानाफूसी तो की, पर उनका उद्देश्य पूछने की हिम्मत किसी की नहीं हुई।
        अगली सुबह उन्होंने स्वयं डोण्डी पिटवाकर सारे गाँव को पंचायत के मैदान में इकट्ठा होने का आदेश दिया गाँववाले आशंका से त्रस्त हो उठे।
        उन्होंने बताया, ‘‘समाजवाद आ रहा है। अब तुम लोगों के दिन पलटेंगे। हम इसीलिए आए हैं कि तुम सब समाजवाद के स्वागत के लिए तैयार हो जाओ और उसे लाने में पूरा सहयोग दो।’’
        ‘‘समाजवाद आने पर सबको भरपेट रोटी मिलेगी।… कई भूखी आवाजें विस्मय से चिल्लाई।
        ‘‘हाँ’-हाँ भरपेट, और सूखी रोटी नहीं, चुपड़ी हुई। यानी डालडा भी मिलेगा।’’ लोग खुशी से झूमने लगे।
        तभी उन्होंने घुड़ककर कहा, ‘‘अच्छा, हमारे डेरे पर रसद पहुँचाओ।’’
        लोग सहमकर आँखों -आँखों में एक-दूसरे की ओर देखने लगे। एक बूढ़े ने साहस बटोरकर कहा, ‘‘पर हमारे पास फालतू रसद बिलकुल नहीं है।’’
        ‘‘तुम कंजूस, नीच और निकम्मे हो। समाजवाद को लाने में हाथ नहीं बँटाना चाहते।’’ अफसर गुर्राया, ‘‘मूर्खों, कल चुपड़ी और दो-दो मिलें, इसके लिए आज एक रोटी का बलिदान आवश्यक है।’’
        हर घर से उन्हें रसद पहुँचा दी गई और गाँववाले उस रात खाली पेट सो गए। अफसरों के डेरे में जश्न रहा।
        सब तन-मन से समाजवाद की अगवानी में जुट गए। ग्रामीणों को हाँक-हाँककर गाँव में आनेवाली सड़क की सफाई कराई गई। उस पर चूना-सुर्खी बिछा दी गई। रंग-बिरंगी झण्डियाँ और द्वार बनाए गए। सब गाँववाले समाजवाद की प्रतीक्षा में सड़क के किनारे आँखें बिछाए खड़े रहते। अपनी आधी रसद अफसरों को पहुँचाने से वे तेजी से दुबले होते जा रहे थे। तिस पर दिनभर धूप, हवा, बारिश में खड़े रहना। उनकी ठठरियाँ निकल आई थीं और आँखें धँस गई थीं।
कभी-कभी कोई अफसर कुछ कागजों का पुलिन्दा लाने या ले जाने के लिए शहर जाता। एक बार सफेद खादी पहने कुछ और भी चिकने-चुपड़े व्यक्ति आए। उनके आने पर अफसर लोग दबे-दबे स्वरों में या सिर्फ इशारों में बातें करने लगे, पर उस दिन गाँववालों को और भी ज्यादा रसद देनी पड़ी, और जश्न और भी जोरदार रहा। अफसरों ने उन्हें एक ओर बुलाकर समझाया,‘‘अब समाजवाद आया ही समझो। यह समाजवाद का हरावल दस्ता है।’’
फिर वे बोले, ‘‘रसद तो ठीक पहुँच रही है,पर हमारे डेरे कमजोर हैं और घिस गए हैं। इनमें हवा,धूप बारिश घुसती है। तुम सब अपने धोती-गमछे हमें दो ताकि डेरों की मरम्मत की जा सके। समाजवाद लाने के लिए अभी हमे यहाँ रहना है। हरावल दस्ते का तो खास खयाल रखना है। ’’
वे फिर सहमकर आँखों-आँखों में एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
अफसर ने घुड़ककर कहा, ‘‘तुम नीच ओर जाहिल हो। अपने मैले-फटे चीथड़े भी नही छोड़ सकते जबकि कल कपड़ों के थान मिलनेवाले है।’’
उन्होंने एक-दूसरे से नजरें बचाते हुए अपने-अपने कपड़े उतारकर उन्हें थमा दिए, जिन्हें लेकर वे चलते बने।
तब से ग्रामीण समाजवाद की प्रतीक्षा में सड़क के किनारे ही खड़े हैं।
अपनी शर्म ढकने के कारण वे हाथ ऊपर नहीं उठा पाते। उनकी आँखें पथरा गई हैं और गर्दनें अकड़ गई हैं।

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

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