April 16, 2019

लघु कथा

विक्रम सोनी की
 चार लघुकथाएँ
1-कारण
चमचमाती, झंडीदार अंबेसडर कार बड़े फौजी साज–सामान बनानेवाली फैक्टरी के मुख्य द्वार से भीतर समा गई। नियत स्थान पर वे उतरे। अफसरान सब पानी जैसे होकर उनके चरणों को पखारने लगे। कुछ गण्यमान्य कहे जानेवाले खास लोग विनम्रता के स्टूच्यू सरीखे खड़े हो गए। फैक्टरी के इंजीनियर स्वचालित मशीनों की तरह चल पड़े। उनकी निगाहे बाई ओर घूमीं।
‘‘इधर विद्युत् संबंधी काम होता है सर!’’
उन्होंने दाईं ओर देखा।
‘‘इधर टूलरूम है महोदय!’’
वे आगे बढ़ गए।
‘‘सामने बारूद का काम होता है सरकार!’’
वे बारूद के ढेर में सम्मिलित हो गए।
सुबह अखबारों ने मुँह खोल दिए। जब मैंने निकाले गए मजदूर तथा तकनीशियनों से उनके निकाले जाने के कारण जानना चाहा तो सात छोटे–बड़े पारिवारिक बेटों के मुखिया ने कहा, ‘‘भइया जी, कल हमारे कारखानों में लोकतंत्र घुस आया था।’’
2-अंतहीन सिलसिला
दस वर्ष के नेतराम ने अपने बाप की अर्थी को कंधा दिया, तभी कलप–कलपकर रो पड़ा। जो लोग अभी तक उसे बज्जर कलेजे वाला कह रहे थे, वे खुश हो गए। चिता में आग देने से पूर्व नेतराम को भीड़ सम्मुख खड़ा किया गया। गाँव के बैगा पुजारी ने कहा, ‘‘नेतराम…!’’साथ ही उसके सामने उसके पिता का पुराना जूता रख दिया गया, ‘‘नेतराम बेटा, अपने बाप का यह जूता पहन ले।’’
‘‘मगर ये तो मेरे पाँव से बड़े हैं।’’
‘‘तो क्या हुआ, पहन ले।’’ भीड़ से दो–चार जनों ने कहा।
नेतराम ने जूते पहन लिये तो बैगा बोला, ‘‘अब बोल, मैंने अपने बाप के जूते पहन लिये हैं।’’
नेतराम चुप रहा।
एक बार, दूसरी दफे, आखिर तीसरी मर्तबा उसे बोलना ही पड़ा, ‘‘मैंने अपने बाप के जूते पहन लिये हैं।’’ और वह एक बार फिर रो पड़ा।
अब कल से उसे अपने बाप की जगह पटेल की मजदूरी–हलवाही में तब तक खटते रहना है, जब तक कि उसकी औलाद के पाँव उसके जूते के बराबर नहीं हो जाते।
3-मुआवजा
वह बोझिल कदमों से अस्पताल की सीढि़याँ उतर रहा था। उसके पीछे–पीछे उसकी पत्नी बिसूरती हुई चली आ रही थी। उसके दोनों हाथों के समानंतर फैलाव पर उसके सातेक साल के बच्चे की लाश बेकफन पसरी हुई थी। बाहर अब भी वर्षा हो रही थी।
पिछले कई दिनों से वर्षा थमी नहीं थी। और वह था तेज का मजदूर। चौथे दिन के ढलते–ढलते बच्चा भूख और तेज ज्वर से बिलबिलाने लगा था। घर में बचा–खुचा जो भी था, दाना–दाना लील लिया गया। बच्चे को पोलीथिन की छप्पर तले अधिक देर तक नहीं रखा जा सकता था। भीगी कथरी में बच्चे को लपेटकर सुबह ही वह सरकारी अस्पताल जा पहुँचा। बच्चे को भरती कर लिया गया। अभी उसके हाथों में दवाई की पर्ची तथा दूध, फल देने की हिदायतें पकड़ाई ही गई थीं कि बच्चे ने दम तोड़ दिया। डॉक्टर ने लाश जल्दी उठाने को कहते हुए सलाह दी, ‘‘करीब ही सरकारी राहत पड़ाव है। वहाँ चले जाओ। बरसात से हुई हानि का मुआवजा मिल जाएगा और तुम दोनों भी सुरक्षित रहोगे।’’
वह बच्चे को उठा ही रहा था कि नर्स ने कुढ़ते हुए–सा कहा, ‘‘बच्चा बरसाती पानी में डूबकर मरा होता तब तो मुआवजा मिलता। यह तो भूख से मरा है।’’
अंतिम सीढ़ी पर पहुँचते–पहुँचते उसकी पत्नी के खाली पेट में जमकर मरोड़ उठा। रुलाई की वजह से नस–नस में ऐंठन–सी हो रही थी। उसने पत्नी को दिलासा दी और दोनों भीगते हुए ही घुटने भर पानी में चल पड़े। सड़क जनशून्य थी। सामने से एक लॉरी आदमी, औरतों, बच्चों से ठसाठस भरी आ रही थी। उसने उसे रोकना चाहा, मगर तभी लॉरी लड़खड़ाई तथा बाईं ओर बनी दीवार से टकराकर अधउलटी रुक गई। कई जिस्म नीचे पानी में गिरकर छटपटाने लगे। कोहराम मच गया। वह बच्चे की लाश को फेंककर छटपटाते लोगों के बीच खड़ा हो चिल्ला पड़ा ‘‘हाय मेरा बच्चा, मेरी औ…..र…त।’’
उसकी निगाहें पीछे आती पत्नी को ढूँढ रही थीं और उसकी पत्नी अपने ही करीब तैरती बच्चे की लाश से परे हिलोरें खाती डबलरोटी को झपटने की कोशिश कर रही थी।
4-सर्वशक्तिमान
उस नवनिर्मित के द्वार पर दिन–ब–दिन भीड़ बढ़ती जा रही थी। चौबीसों घंटे श्रद्धालुओं की उपस्थिति से मंदिर का मुख्य द्वार कभी बंद नहीं हो पाता था। पूजन–अर्चन के बाद लौटते हुए इतनी संतुष्टि,आज से पहले दुनिया के किसी भी धर्मगढ़ से निकलते लोगों के चेहरों पर नहीं देखी गई। खास बात तो यह कि इस मंदिर में सभी धर्मों और समुदायों के लोग आ–जा रहे थे।
किसी से पूछते कि इस मंदिर में किसकी मूर्ति रखी हुई है तो लोग एक ही उत्तर देते, ‘सर्वशक्तिमान की,’ और श्रद्धा–भक्ति से आँख मूँद लेते।
सरकार एक दिन खुद ताव खाते मंदिर में घुस पड़े। आखिर उनसे ज्यादा ताकतवर यह कौन सर्वशक्तिमान अवतरित होकर एक धर्म साम्राज्य पर फावड़ा चला रहा है? वे पहुँचे। दर्शन पाते ही उनकी गर्दन झुक गई। वे फर्श से माथा टेककर बड़बड़ाए, ‘‘हे सर्वशक्तिमान, मुझ दरिद्र पर कृपा करो।’’ दरअसल वहाँ स्वर्ण–सिंहासन पर चाँदी का एक गोल सिक्का रखा हुआ था।

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