January 15, 2019

चुनाव और जनता की उम्मीदें

चुनाव और जनता की उम्मीदें 
डॉ. रत्ना वर्मा
 नये साल का स्वागत हम हर बार कुछ अच्छा करने का संकल्प लेकर करते हैं। इसी अच्छे की उम्मीद में जाते हुए साल के अंत में जनता ने छत्तीसगढ़ सहित तीन प्रदेशों में सरकारें बदल दीं। नववर्ष का सूरज सबके लिए उम्मीदों का परचम लहराते आया है। इस जीत से नई सरकार के हौसले बुलंद हैं और अब उनकी नज़र आसन्न लोकसभा चुनाव पर है। नई- नई घोषणाएँ, ढेर सारे वादे और बहुत सारे सपने...
 छत्तीसगढ़ राज्य की जनता ने पिछली सरकार को ज़रूरत से ज्यादा समय देकर कुछ ज्यादा ही पाने की उम्मीद कर ली थी। 15 साल का समय कम नहीं होता। पिछली सरकार चाहती, तो इन पन्द्रह सालों में राज्य को विकास की ऊँचाइयों पर ले जा सकती थी। जनता की उम्मीदों पर खरा उतर कर उनका विश्वास जीत सकती थी, परन्तु ऐसा हो नहीं पाया। अगर कुछ अच्छे काम हुए हों, तो भी बहुत सारे ऐसे काम जो होने थे, नहीं हुए। साल दर साल शासन-प्रशासन आकंठ भ्रष्ट्राचार में डूबता चला गया। अमीर और अमीर होते चले गए, गरीब और गरीब। जनता बस लोकलुभावन वादों में जीती रही और नेता अतिआत्मविश्वास के चलते दंभी होते चले गए। उन्हें लगने लगा- अब उन्हें कोई नहीं हरा सकता। जनता को बेवकूफ़ बनाते जाओ और अपनी तिजोरी भरते जाओ। नतीजा सबके सामने है।
प्रश्न यह उठता है कि प्रदेश की जनता अपनी चुनी हुई सरकार से क्या चाहती है- प्रदेश के समुचित विकास में उनका व्यक्तिगत विकास भी जुड़ा हुआ है, जिसमें उनकी वे मूलभूत आवश्यकताएँ आती हैं जिनपर उनका हक है- रोटी कपड़ा और मकान के साथ- साथ स्वच्छ पानी, पर्याप्त बिजली, सुविधाजनक सड़कें, साफ-सुथरा शहर। इसके साथ ही न्याय और कानून- व्यवस्था तथा भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन, जो उनके जीवन को आसान और तनावमुक्त बनाए।
प्रदेशवासियों के लिए उनका प्रदेश उनकी आन-बान और शान होता है। छत्तीसगढ़ वह अभागा प्रदेश है, जो अलग राज्य बनने से पहले और राज्य बनने के बाद भी उपेक्षा ही झेलता आया है। भरपूर वन- सम्पदा और खनिज क्षेत्र में धनी होने के बाद भी उसका दोहन ही होता आया है। किसी ने नहीं सोचा कि इस सम्पदा से अपनी धरती को और सम्पन्न बनाते हुए अपनी जड़ों को और मजबूत करते हुए देशभर में एक अलग पहचान बनाई जाए। धान का कटोरा कहलाने वाले हमारे प्रदेश के किसान ही सबसे ज्यादा उपेक्षित और असहाय हो गए। इससे बड़ा दु:ख और क्या होगा कि पिछले कुछ सालों में यहाँ के किसान भी आत्महत्या करने को मजबूर हो गए हैं।  कृषि और कृषि आधारित व्यवसाय ही छत्तीसगढ़ की पहचान है और हम है कि अपनी पहचान को ही मिटाते चले जा रहे हैं। ऐसे में राज्य के विकास का दावा करना छत्तीसगढ़वासियों के साथ अन्याय होगा।
पुरातन जड़ों को अपनी धरती में समेटे हमारा प्रदेश कला और संस्कृति का गढ़ भी है। दु:ख की बात है कि  किसी समय में महाभारत जैसे महाकाव्य को पंडवानी लोक गाथा के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलवाने वाले हमारे प्रदेश की भव्यता कहीं गुम-सी होती चली जा रही है। जरूरत उस भव्यता को उसी शान-बान और आन के साथ लौटाने और सँजोकर रखने की है।
 इसमें कोई दो मत नहीं कि किसी भी सरकार का काम प्रदेश की जनता की खुशहाली और सम्पन्नता है। एक आम धारणा बन चली है कि सत्ता जिनके हाथों में होती है, उसे अपने कामों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित प्रसारित करने की लत लग जाती है और उनके मातहत सरकार को खुश करने के लिए ऐसा दिखावा भी करते हैं। यह धारणा टूटनी चाहिए। जमीनी हकीकत से न जुडऩे वाले तंत्र को लोकतंत्र नकार देती है। जनता को मुफ़्त में कितनी भी सुविधाएँ प्रदान कर दो, वे दो दिन में उडऩछू हो जाती हैं। मेहनत की कमाई में जो सुख और संतोष मिलता है उसका कोई मुकाबला नहीं।
  हकीकत तो यही है कि यदि विकास कहीं हुआ है ,तो वह दिखाई देता है। सड़कें यदि बनी हैं, तो उन,पर चलने वाली जानता को पता है कि सड़कें बनी हैं। गाँव -गाँव में बिजली पहुँची है, तो वह दिखाई देता है। कितने प्रतिशत औरतों के पास गैस सिलेंडर की सुविधा है ,ये वे औरते जानती हैं। किसानों को बीज, खाद, बिजली, पानी सही समय पर मिल रहा है या नहीं यह प्रत्येक किसान को पता है। कहने का मतलब यह कि सिर्फ पोस्टर में योजनाओं के पूरे होने और आँकड़ों को बढ़ा -चढ़ाकर दिखा देना सफलता या जीत की निशानी नहीं है।
 वैसे भी कागजी योजनाओं को जमीनी स्तर पर करके दिखाने के लिए किसी भी सरकार के पास पाँच साल का समय कम नहीं होता। यदि इरादे पक्के हों, तो हर काम मुमकिन है। सरकार चाहे जिसकी भी हो योजनाएँ प्रदेश के विकास और जनता की खुशहाली के लिए ही बनाई जाती हैं। फर्क उन योजनाओं को कार्यान्वित करने के तरीकों में होता है। इसके लिए दृढ़संकल्प की जरूरत होती है।
इस दिशा में सत्ता संभालते ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने वीआईपी कल्चर का विरोध किरते हुए सादगी से जनसेवा करने की बात कही है, विश्वास है वे अपनी बात पर कायम रहेंगे और दिखावे की संस्कृति को अपनी सरकार से दूर रखेंगे। चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादों को पूरा करने की दिशा में भी भूपेश मंत्रिमंडल ने काम करना शुरू कर दिया है। ‘गढ़बो नवा छत्तीसगढ़’ के संकल्प के साथ शुरू हुआ नई सरकार का यह सफर उम्मीद है जनता की कसौटी पर खरा उतरेगा।
नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ-

0 Comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष