June 11, 2018

पर्यावरण

कृषि को समेटता जलवायु परिवर्तन
- डॉ. खुशालसिंह पुरोहित
औद्योगीकरण एवं वर्तमान में जीवाश्म ईंधनों का अधिकाधिक उपयोग से जलवायु परिवर्तन हो रहा है। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। पृथ्वी का औसत वार्षिक तापमान लगभग 15 डिग्री सेंटीग्रेड है। पृथ्वी को गर्म रखने की वायुमण्डल की यह क्षमता ग्रीनहाऊस गैसों की उपस्थिति पर निर्भर करती है। इनकी मात्रा में वृद्धि के परिणामस्वरूप ग्रीनहाऊस प्रभाव बढ़ जाएगा, जिससे वैश्विक तापमान में अत्यधिक वृद्धि हो जाएगी। बढ़ते वैश्विक तापमान यानी ग्लोबल वार्मिंग के लिए  कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं है।
इक्कीसवीं शताब्दी के पहले 16 बरसों में 15 बरस पिछली एक शताब्दी की तुलना में सर्वाधिक गर्म रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण हरियाली में आ रही निरन्तर कमी है। पेड़, नदियों और पहाड़ों के अलावा जीव जन्तुओं तक की पूजा करने वाले भारतीय समाज में आज इनके विनाश को लेकर गम्भीर चिन्ता नहीं है।
तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन हमारी कृषि व्यवस्था, आर्थिक और औद्योगिक नीति तथा जीवनशैली से जुड़ा हुआ है। जलवायु परिवर्तन का सीधा प्रभाव खेती पर पड़ेगा। क्योंकि तापमान वर्षा आदि में बदलाव आने से मिट्टी की क्षमता में कमी होगी और कीट-पतंगों से फैलने वाली बीमारियाँ बड़े पैमाने पर होगी। गर्म मौसम होने से वर्षा चक्र प्रभावित होता है इससे बाढ़ या सूखे का
खतरा बढ़ता है।
एक समय था डग-डग रोटी पग-पग नीर के मुहावरे के लिए मालवांचल प्रसिद्ध था। इन दिनों गायब होती हरियाली और तेजी से नीचे जा रहे भूजल स्तर के कारण मालवा की वर्तमान पर्यावरणीय स्थिति दयनीय हो गई है। कृषि वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं यदि तापमान 3-5 डिग्री बढ़ता है तो गेहूँ के उत्पादन में 10-15 प्रतिशत की कमी आ जाएगी।
औद्योगीकरण एवं वर्तमान में जीवाश्म ईंधनों का अधिकाधिक उपयोग से जलवायु परिवर्तन हो रहा है। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। पृथ्वी का औसत वार्षिक तापमान लगभग 15 डिग्री सेंटीग्रेड है। पृथ्वी को गर्म रखने की वायुमण्डल की यह क्षमता ग्रीनहाऊस गैसों की उपस्थिति पर निर्भर करती है। इनकी मात्रा में वृद्धि के परिणामस्वरूप ग्रीनहाऊस प्रभाव बढ़ जाएगा, जिससे वैश्विक तापमान में अत्यधिक वृद्धि हो जाएगी। बढ़ते वैश्विक तापमान यानि ग्लोबल वार्मिंग के लिए कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं है। परन्तु इसमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है, मानव की उपभोगवादी गतिविधियाँ।
बढ़ता शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, वाहनों की भीड़, क्लोरोफ्लोरो कार्बन का वातावरण में रिसाव, बढ़ती विमान यात्राएँ, प्रकृति के साथ किया जा रहा खिलवाड़ एवं सबसे बढ़कर हमारी विलासितापूर्ण जीवनशैली का असर पूरे विश्व पर पड़ रहा है। इससे सबसे ज्यादा प्रभावित वे देश हो रहे हैं जिनकी आबादी ज्यादा है और विकास की दृष्टि से पीछे हैं।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। दक्षिणी एशिया के चीन व भारत दो ऐसे विकासशील देश हैं, जहाँ प्राकृतिक संसाधनों के दोषपूर्ण विदोहन से अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। यहाँ वन क्षेत्र कम हुआ है, बीसवीं सदी में भारत भूमि लगभग 30 प्रतिशत वनाच्छादित थी जो घटकर मात्र 19.4 प्रतिशत ही रह गई है।
भारतीय अर्थव्यस्था मुख्यतः कृषि आधारित है, कृषि के लिए  जल का महत्त्व है। मानसून की अनिश्चितता के कारण भारतीय कृषि पहले से ही अनिश्चितता का शिकार रही है। इस कारण विभिन्न फसलों के उत्पादन एवं उसकी उत्पादकता पर प्रभाव पड़ा है। फसलों पर कीटों का प्रकोप बढ़ा है। कृषि उत्पादन में कमी के कारण कृषि पदार्थों की कीमतों में भारी वृद्धि देखी जा रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण मानव का स्वास्थ्य भी अछूता नहीं है।
विज्ञान लेखक प्रो. दिनेश मणि का कहना है भारत में वैज्ञानिक कृषि का शुभारम्भ16वीं शताब्दी में हुआ। जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि होने के कारण कृषि उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता पड़ी। नई नीतियों का जन्म हुआ जिनका सीधा प्रभाव कृषि पर पड़ा। नकदी खेती के लिए  गन्ना, कपास, तम्बाकू, चारा, पशु उत्पादन, ऊन और चमड़ा पैदा करने पर ध्यान दिया गया।
भारतीय कृषि में किसान और पर्यावरण का सीधा सम्बन्ध है तथा किसान कृषि और पर्यावरण के बीच की महत्त्वपूर्ण कड़ी है। इसलिए  किसानों को ऐसी खेती करनी चाहिए जिससे खेती में उन्नति के साथ-साथ पर्यावरण को भी शुद्ध बनाए रखा जा सके। जलवायु परिवर्तन के कारण फसलों की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में कमी आएगी तथा अनेक फसलों के उत्पादन क्षेत्रों में परिवर्तन होगा।
जलवायु परिवर्तन के सम्भावित दुष्प्रभावों से कृषि को बचाने के लिए  अनुकूलन हेतु अनेक कार्यनीतियाँ को मूर्तरूप देना होगा। फसलों एवं जीव-जन्तुओं में स्वाभाविक रूप से काफी हद तक अपने ढालने की क्षमता होती है जिसे प्राकृतिक अनुकूलन कहते हैं। हमें फसलों की ऐसी प्रजातियों विकसित करनी होंगी जो उच्च तापमान को सह सकें। वहीं दूसरी और कृषि प्रबन्ध तकनीकों में सुधार करके हम जलवायु परिवर्तन के सम्भावित प्रभावों को काफी हद तक कम कर सकते हैं। 
हमें टिकाऊ खेती के सिद्धान्तों को समझने व उनके अनुसरण पर जोर देना होगा। पारम्परिक खेती के साथ-साथ कृषि वानिकी, जैविक खेती, न्यूनतम जोत, समन्वित पोषक तत्व प्रबन्धन तथा समन्वित नाशी जीव प्रबन्धन को अपनाने की आवश्यकता है तभी हम कृषि को सुरक्षित रख पाएँगे तथा पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचा सकेंगे।
सम्पूर्ण कृषि विकास के लिए  समेकित जल प्रबन्धन द्वारा जल की प्रत्येक बूँद का इस्तेमाल कृषि में करने की आवश्यकता है। उन्नत कृषि तकनीकी के प्रचार-प्रसार के लिए  कृषि शिक्षा के पाठ्यक्रम को नया रूप देना होगा ताकि कृषि शिक्षा, अनुसन्धान विस्तार और भारतीय कृषि में आवश्यकताओं के अनुरूप जनशक्ति तैयार की जा सके। इससे हमारी कृषि और कृषकों को मजबूती मिलेगी। मानव जीवन में तीन बुनियादी आधार शुद्ध हवा, ताजा पानी और उपजाऊ मिट्टी मुख्य रूप से वनों पर ही आधारित हैं।
इसके साथ ही पेड़ से कई अप्रत्यक्ष लाभ भी हैं। जिनमें खाद्य पदार्थ, औषधियों, फल-फूल, ईंधन, पशु आहार, इमारती लकड़ी, वर्षा सन्तुलन, भूजल संरक्षण और मिट्टी की उर्वरता आदि प्रमुख हैं। पेड़ और पर्यावरण की रक्षा आवश्यक है और यह महान विरासत हमारी राष्ट्रीय धरोहर हैं।
पेड़ लगाने और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए  हमारे देश में प्राचीनकाल से ही प्रयास होते रहे हैं जिसमें सरकार और समाज दोनों ही समान रूप से भागीदार होते थे। राजा व साहूकार सड़क किनारे छायादार पेड़ लगवाते थे तो जनसामान्य इनके संरक्षण की जिम्मेदारी निभाता था। इस प्रकार राज और समाज के परस्पर सहकार से देश में एक हरित संस्कृति का विकास हुआ जिसने वर्षों तक देश को हरा-भरा रखा। वर्तमान विषम परिस्थिति में इसी विचार से हरियाली का विकास होगा जिसकी आज सर्वाधिक आवश्यकता है। (सर्वोदय प्रेस सर्विस)

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