April 16, 2018

प्रश्न चिह्न

अधिक नम्बर लाने की होड़ में
 दम तोड़ती रचनात्मकता 
- कमला निखुर्पा
शिक्षा व्यवस्था पर चर्चा करने से पहले आइए चलें गाँव की ओर, जर्जर से कमरों में चलती पाठशाला जिसमें सभी कक्षाओं के विद्यार्थियों को एक ही गुरुजी पढ़ा रहे हैं। एक ओर भोजनमाता खाना बना रही है। बच्चे पढऩे के लिए कम और मध्याह्न भोजन के लिए अधिक उत्सुक दिखाई देते हैं। यहाँ अक्सर छुट्टी हो जाती है। कभी बारिश हो गई तो छुट्टी, क्योंकि पाठशाला की  छत जो टपकती है। कभी गुरुजी की जनगणना या पल्स पोलियो अभियान में ड्यूटी लग गई, तो छुट्टी। आज घर में काम है ,तो अम्मा ने करवा दी छुट्टी। विद्यालय में भी गुरुजी का अधिकांश समय मध्याह्न भोजन के बही खाते का हिसाब लिखने या पशुगणना, मतगणना आदि के प्रपत्र भरने में निकल जाता है। जिसके लिए वह विद्यालय खोला गया था, वही यहाँ सबसे उपेक्षित प्राणी है अर्थात विद्यार्थी।
   दूसरी ओर शहर के पब्लिक स्कूल, चमकती बिल्डिंग, सजा-सँवरा फूलों से महकता लॉन, चिल्ड्रन पार्क, गेट पर वर्दी में सजे गार्ड, प्रोजेक्टर, सी सीटीवी कैमरे से लैस ये स्कूल कम पंचसितारा होटल ज्यादा मालूम होते हैं। जहाँ अभिभावकों की भी परीक्षा ली जाती है। ऊँची फीस भी चुकानी पड़ती है ,यही नहीं, हिन्दी में बोलने पर फाइन भी भरना पड़ता है।
भौतिक विकास की नई ऊँचाइयों को छू लेने की होड़ में दौड़ता आज हमारा समाज जिस दिशा की ओर जा रहा है वहाँ विकास की दौड़ में हमारी शिक्षा प्रणाली पर लगातार प्रश्न चिह्न लग रहे हैं। कोई शिक्षा पद्यति को दोष देता है, कोई सरकार को कोसता है। कहीं शिक्षकों को शिक्षा की दुर्दशा का जिम्मेदार ठहराया जाता है तो कहीं नई पीढ़ी के विद्यार्थियों पर ही दोषारोपण कर कर्तव्य की  इतिश्री कर ली जाती है।
वास्तव में शिक्षा, व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास करने वाली होनी चाहिए। शिक्षा, प्रकाश के उस स्रोत की तरह हो जो व्यक्ति के चिंतन एवं मनन पर बल दे। मानवीय गुणों का विकास कर समाज का उन्नयन कर सके। दुर्भाग्य से आज चिंतन-मनन के स्थान पर प्रश्नों के उत्तर रटने पर जोर दिया जाता है, अधिक नंबर लाने की होड़ में बालक की सृजनशीलता, कल्पना और रचनात्मकता दम तोड़ती नजर आती है।
हमारी शिक्षा ऐसी हो जो सबके लिए सुलभ हो, जो बालकों को शारीरिक रूप से शक्तिशाली बनाए, मानसिक रूप  से जागरूक, सृजनशील बनाए। चारित्रिक रूप से नैतिक व शिष्ट तथा भावनात्मक रूप से संवेदनशील बनाकर देश का जिम्मेदार नागरिक बनाए, शिक्षा ऐसी हो जो उसे जीवन में आने वाली हर चुनौतियों का सामना करने के लिए सक्षम बनाए।
हमारे शिक्षक कैसे हों
जून एडम्स के अनुसार- “शिक्षा एक द्विमुखी प्रक्रिया है यह क्रिया शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों के सहयोग द्वारा ही संपन्न होती है।” शिक्षक और शिक्षार्थी मिलकर ही शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को सफल बनाते हैं। आज के बदलते परिवेश में शिक्षक की भूमिका भी बदल रही है। नई-नई तकनीकों ने कक्षा-शिक्षण को नए आयाम प्रदान किए हैं। अब छात्र केन्द्रित शिक्षण पर बल दिया जा रहा है। अब कक्षाएं स्मार्ट बोर्ड, प्रोजेक्टर और इन्टरनेट से सुसज्जित है  कहीं-कहीं तो बच्चों के हाथों में प्री लोडेड कंटेंट के साथ टेबलेट भी थमाए गए हैं। इन सब गैजेट्स के बीच भी शिक्षक की भूमिका और शिक्षण- अधिगम प्रक्रिया में शिक्षक के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता।
जो केवल पाठ्यक्रम को पूरा कर अपने विषय में अच्छा परिणाम लाकर संतुष्ट हो जाते हैं ,वे शिक्षक बालक का सर्वांगीण विकास नहीं कर पाते। अध्यापक ऐसे हों, जो बालक के अंतर्मन में झाँककर उसकी चेतना को जगाकर ,उसमें निहित कौशलों का विकास करने में सहायक हों। अपने ज्ञान, गुण और व्यक्तित्व से विद्यार्थियों को प्रभावित कर उनका उत्थान कर सके।
योग्य शिक्षक में अपने विषय का गहरा ज्ञान होने के साथ दूसरे विषयों के साथ अंत:सम्बन्ध जोडऩे की अनूठी कला होती है।
अच्छा शिक्षक सम्प्रेषण कौशल में भी पारंगत होता है। वह रोचक तरीके सेअपने ज्ञान को दूसरों तक पहुँचाता है।
शिक्षकों को मनोविज्ञान की जानकारी भी होनी चाहिए ताकि वह हर उम्र के विद्यार्थियों की प्रकृति को पहचान कर उनके भावनात्मक और संवेगात्मक समस्याओं का समाधान कर सके।
शिक्षा जगत में सुधार
आज शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक बदलाव की आवश्यकता महसूस की जा रही है। जिस तरह समाज के हर क्षेत्र में नित नए अनुसन्धान हो रहे हैं ऐसे ही शिक्षा के क्षेत्र में नई खोज होनी चाहिए –क्या पढ़ाया जाना चाहिए्,किसके द्वारा पढ़ाया जाना चाहिए्, किस विधि से पढ़ाया जाना चाहिए्, पढ़ाने के बाद क्या परिवर्तन दृष्टिगोचर होना चाहिए् इसका व्यापक मूल्यांकन होना चाहिए इसके लिए शिक्षा जगत की महत्त्वपूर्ण धुरी है शिक्षक, जिनके बारे में अक्सर ये कहा जाता है कि हमारे देश में जिन लोगों को कहीं और नौकरी नहीं मिलती वे अंतत: शिक्षण व्यवसाय से जुड़ते हैं, कुछ हद तक यह बात सही प्रतीत होती है क्योंकि जिस तरह की घटनाएँ आज समाज में घटित हो रही उसने शिक्षण-संस्थाओं और शिक्षकों की छवि को धूमिल किया है जिससे शिक्षक-चयन प्रक्रिया पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, ताकि कुंठाग्रत, संवेदनहीन और अयोग्य लोग इस पेशे में ना आने पाएँ। चयन-प्रक्रिया उच्च स्तर की, लोकसेवा आयोग की परीक्षाओं के समकक्ष हों। आकर्षक वेतन-भत्तों और सुविधाओं से शिक्षण को सम्मानजनक व्यवसाय का दर्जा दिया जाए ,ताकि विद्वान और योग्य अभ्यर्थी शिक्षण व्यवसाय को अपनाएँ। यदि गुणी लोग शिक्षा जगत से जुड़ेंगे तो स्वयमेव ही शिक्षा का स्तर ऊँचा उठेगा।
पाठ्यक्रम कैसा हो
आज शिक्षा जगत के समक्ष पाठ्यक्रम का निर्धारण एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। दशकों पुराने पाठ्यक्रम का अधिकांश भाग आज के दौर में अप्रासंगिक सिद्ध हो रहा है। आज विद्यार्थी निर्धारित पाठ्यक्रम को केवल रट रहा है उसे बस अंक चाहिए जिससे वह किसी व्यावसायिक संस्थान में प्रवेश पा सके, नौकरी पा सके। आज अपने देश में अनुसंधान के क्षेत्र में भारतीयों की संख्या कम हो रही है।
पाठ्यक्रम ऐसा हो, जो बदलते समय के अनुरूप विद्यार्थी की आवश्यकताओं और अभिरुचियों को ध्यान में रखकर बनाया जाए। करके सीखने की प्रवृत्ति पर बल दे। पाठ्यक्रम ऐसा हो, जो विभिन्न विषयों में सहसम्बन्ध स्थापित कर सके। कुल मिलाकर पाठ्यक्रम केवल परीक्षा को ध्यान में रखकर ही ना बनाया जाए बल्कि पाठ्यक्रम ऐसा हो जीवन के उद्देश्यों और मानवीय मूल्यों को भी प्रभावित कर सकें,  प्रेरित कर सके तभी वह शिक्षक और शिक्षार्थी का अभिन्न अंग बन शिक्षा को पूर्णता प्रदान कर पायेगा।
सम्पर्क: प्राचार्या, केन्द्रीय विद्यालय, पिथौरा गढ़ (उत्तराखण्ड)

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