October 24, 2017

जीवन दर्शन:

कुछ अलग करें... 
- विजय जोशी
जीवन में कोई भी काम करते करते हम उसके इतने अभ्यस्त हो जाते हैं और वह हमें इतना आसान लगने लगता है कि हमारे आगे के सोच को अवरुद्ध कर देता है। जैसे ही उस काम में कुछ नवीनता या अलग हटकर कुछ घटित हुआ नहीं कि हम उलझन में पड़ जाते हैं। मात्र इसलिये कि हमने अपने सोच के द्वार बंद किए होते हैं। संसार में ऐसे लोग महान नहीं हुए जो अलग अलग कार्य करते रहें हैं ;बल्कि वे हुए जो कार्य को अलग- अलग ढंग से करने में प्रवीणता प्राप्त कर सके।
एक बार एक मालवाहक वाहन का ड्राइवर मानसिक चिकित्सालय को सामग्री प्रदान कर जब लौटने लगा तो पाया कि उसके वाहन का एक टायरपंक्चर था। उसने तुरंत जेक लगाया, लेकिन असावधानीवश उसके चारों बोल्ट एक खुली नाली में गहरे गिर गए,जिन्हें निकालना असंभव था।
वह चिंताग्रस्त हो गया। तभी वहाँ से एक रोगी गुजरा और उसकी चिंता का कारण पूछते हुए अपनी सहायता प्रस्तुत की।
ड्राइवर ने सोचा भला यह जोकर क्या सहायता करेगा, लेकिन उससे छुटकारा पाने हेतु संपूर्ण बात बता दी।
रोगी जोर से हँसा और आश्चर्यपूर्वक कहा - तुम्हारे पास इतनी छोटी सी समस्या का हल भी नहीं  है। तुम सारे जीवन एक ड्राइवर ही रहोगे। ड्राइवर पागल के इस कथन पर कौतूहल से भर गया।
रोगी ने आगे कहा - अरे भाई बचे तीन चक्कों में से एक एक बोल्ट निकाल कर अपनी स्टेपनी में लगा लो और किसी तरह नज़दीक की वर्कशाप पहुँच जाओ। क्या यह सरल हल नहीं है मित्र।
ड्राइवर ने चकित होकर पूछा - अरे इतने कुशाग्र होकर फिर भला तुम यहाँ इस पागलों के अस्पताल में क्यों हो।
वह इसलिए कि मैं सनकी (Crazy )  तो हूँ पर बेवकूफ (Stupid) नहीं - उस रोगी ने कहा।
आश्चर्य नहीं कि हम में से अधिकतर उस ड्राइवर के समान हैं और यह सोचते हैं कि दूसरे मूर्ख हैं। लेकिन रुको और देखो कि समस्या गहरी होने पर एक अलग सोच कितना प्रभावी हो सकता है, जो हमारी बुद्धि की धार को तेज़ बनाए रख सकता है। और उसके लिये किसी हद तक सनकी (Crazy ) भी होना पड़े तो कोई बुराई नहीं।
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