May 10, 2016

मौसम

         सूखे के प्रकोप में भारत
देश गंभीर सूखे की चपेट में है। लगातार दो मानसून कमज़ोर रहे हैं और भीषण गर्मी ने हालात को और बिगाड़ दिया है। बताते हैं कि देश के जल भंडार अपनी क्षमता से 20 प्रतिशत ही भरे हैं।
उम्मीद यह की जा रही है कि इस वर्ष का अच्छा मानसून हालात को बेहतर बनाएगा। मगर कई लोग मानते हैं कि बात सिर्फ मानसून की नहीं है बल्कि विकास की प्राथमिकताओं की भी है। भारत की अर्थव्यवस्था आज भी काफी हद तक बरसात पर निर्भर है। आज भी करीब दो-तिहाई खेती बरसात के पानी पर टिकी है। कुछ हिस्सों में ज़रूर सिंचाई का विकास हुआ है मगर इसकी वजह से देश में भूजल भंडारों का अति दोहन हो रहा है, भूजल भंडार खाली होते जा रहे हैं।
खेती को सूखे से सुरक्षित करने के प्रयासों में गंभीरता नजऱ नहीं आती। विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि सरकार को चाहिए कि वह किसानों को कम पानी से उगने वाली फसलों को अपनाने के लिए प्रोत्साहन दे, मगर सरकार गन्ने जैसी पानी डकारने वाली फसलों को सबसिडी दे-देकर पानी के दुरुपयोग को बढ़ावा दे रही है।
नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर साइन्स, टेक्नॉलॉजी एंड डेवलपमेंट स्टडीज़ की राजेकारी रैना का मत है कि सघन सिंचाई पर आश्रित खेती से परहेज़ करने की दिशा में कोई गंभीर प्रयास नहीं किए गए हैं जबकि ज़रूरत इस बात की है कि हम स्थानीय फसली विविधता का लाभ उठाएँ।
बरसाती पानी को सहेजने के प्रयासों में भी कोई संजीदगी नज़र नहीं आती। खाली होते भूजल भंडारों के पुनर्भरण या उनके तर्कसंगत उपयोग की दिशा में हम ज़्यादा आगे नहीं बढ़े हैं। हालांकि अब यह सर्वमान्य है कि रूफ वॉटर हार्वेस्टिंग जैसे उपाय युद्ध स्तर पर करने की ज़रूरत है किंतु धरातल पर बहुत कम काम देखने को मिलता है।
विकास बैंक ने 2013 के एक अध्ययन में बताया था कि भारत में ग्लोबल वार्मिंग के असर दिखने भी लगे हैं। यदि धरती का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है तो तीक्ष्ण गर्मी की अवधियाँ बढ़ेंगी और मानसून का पूर्वानुमान भी मुश्किल होता जाएगा। मानसून के बेतरतीब होने की संभावना भी ज़ाहिर की गई है, और कुछ हद तक इसके प्रमाण मिलने भी लगे हैं। विकास बैंक की रिपोर्ट के अनुसार तापमान बढऩे की वजह से 2040 तक फसलों के उत्पादन में उल्लेखनीय कमी आ सकती है। (स्रोत फीचर्स)

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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