April 20, 2016

जल-संरक्षण विशेषांक

आओ करें
वर्षा जल
का संग्रहण
आज देश के विभिन्न शहरों में पानी का संकट खड़ा हो रहा है और यह संकट सतही ओर भूजल दोनों के अभाव से उपजा है। इस संकट से निपटने के लिए हमें गाँव के साथ-साथ शहरों में भी जल संग्रहण के विभिन्न तरीकों का उपयोग करना होगा। लेकिन अब सवाल उठता है कि शहरों में इसे कैसे क्रियान्वित किया जाए। दरअसल ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में वर्षा जल संग्रहण का समान अर्थ है। फर्क बस इतना है कि ग्रामीण इलाकों में जल पंढाल प्रबधंन कार्यक्रम के जरिए मिट्टी संरक्षण के साथ-साथ जल संग्रहण किया जाता है। वहीं दूसरी ओर शहरी इलाकों में जगह की कमी के कारण छत पर जल संग्रहण करना ज्यादा मुनासिब होता है।
शहरों में पहले से निर्मित भवनों में भी जल संग्रहण करना संभव है। बरसात के पानी का मुख्यत: दो उद्देश्यों से संग्रहण किया जाता हैः
पानी का तुरंत उपयोग करने के लिए जमीन पर अथवा जमीन के अंदर टंकी में पानी का भण्डारण किया जाता है। (इसके लिए चित्र-1 देखें)
बाद में उपयोग करने के लिए बारिश के पानी को जमीन के अंदर छोड़ा जाता है, जिससे भूजल भण्डारण का पुनर्भरण होता है।
जल संग्रहण के प्रमुख घटक
जल ग्रहण क्षेत्र वह क्षेत्र होता है, जिस पर वर्षा का पानी सीधे गिरता है। इस क्षेत्र की सतह पक्का बंधा हुआ अथवा फर्शयुक्त हो सकता है, जैसे : घर की छत, आंगन या खुला मैदान या बगीचा, वगैरह। इसमें तम्बूनुमा ढालू छत अथवा शेड की झुकी हुई छत जैसे अस्थायीढाँचों का भी जल ग्रहण क्षेत्र के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
पाइप द्वारा जल ग्रहण क्षेत्र या छत से बारिश का पानी टंकी तक पहुँचता है।
बारिश के पानी का संग्रहण करने के लिए आरसीसी, ईंट अथवा प्लास्टिक की टंकियों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
पुनर्भरण व्यवस्था के तहत कुओं, नलकूपों, खाइयों तथा पुनर्भरण गड्ढो के जरिए भूमिगत जल भंडारण का पुनर्भरण किया जा सकता है।
जल संग्रहण के तरीके
जैसा कि पहले बताया गया है कि पानी के सीधे उपयोग के लिए पाइपों के जरिए छत के पानी को खाली टंकी में पहुँचाया जाता है।
प्रत्येक टंकी के लिए ओवर फ्लो व्यवस्था का प्रावधान किया जाना चाहिए, जिससे टंकी का अतिरिक्त पानी बाहर निकलता रहे।
यद्यपि वर्षा जल का पानी फ्लोराइड तथा कैल्शियम जैसे खनिज प्रदूषकों से मुक्त होता है, लेकिन इसमें वायुमंडलीय प्रदूषक तथा सतही प्रदूषक तत्त्व (जैसे महीन रेत, घूल इत्यादि) मौजूद रहते हैं।
अत: वायुमंडलीय प्रदूषण से बचने के लिए पहले दस-बीस मिनट की वर्षा से प्राप्त पानी को संग्रहित करने की बजाय इसे कहीं और बहा दिया जाना चाहिए, क्योंकि इससे वायु मंडलीय प्रदूषण से बचने के साथ-साथ छत की गंदगी भी साफ हो जाएगी।
प्रबधंन और रखरखाव
प्रत्येक बारिश से पहले और बाद में सम्पूर्ण जल संग्रहण व्यवस्था के घटकों (छत, पाइप, जाली, पहले बारिश को अन्य स्थान पर ले जाने की व्यवस्था, वगैरह) का पूरा परीक्षण किया जाना चाहिए।
भूजल भंडारण का पुनर्भरण: बरसात के पानी को भूजल भण्डारण में भरने की कई संरचनाएँ होती हैं, जो वर्षा जल को अन्य स्थानों पर बहने से रोकती हैं, जैसे पुनर्भरण करने वाले गड्ढे, रिसने वाली सतह, इत्यादि। जबकि कई अन्य ढाँचे पानी को अधिक गहराई तक रिसने में मदद करती हैं, जिससे यह भूगर्भीय जल में मिल जाता है, जैसे सोख्ता कूप, पुनर्भरण के कुए वगैरह) इमारत के छत के पानी को सीधा उपयोग नलकूपों अथवा कुओं के पुनर्भरण करने में किया जा सकता है।
कुएँ का पुनर्भरण करने के लिए इसके अस्तर में समान दूरी पर छेद किए जाते हैं, जिससे इसमें बेहतर ढंग से पानी प्रवेश करे। मच्छरों के प्रकोप से बचने के लिए इसे ढककर रखना चाहिए इसी प्रकार इसमें रेत या तैरने वाली वस्तु को रोकने की भी व्यवस्था की जानी चाहिए, नहीं तो इस पुनर्भरणढाँचे के अवरुद्ध होने का खतरा उत्पन्न हो सकता है।
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें: आर के श्रीनिवासन / सुरेश बाबू एस वी प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन इकाई, सेंटर फॉर साइन्स एण्ड इन्वायरन्मेंट 41, तुगलकाबाद इंस्टीट्यूशनल एरिया, नई दिल्ली- 110062

0 Comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष