February 02, 2014

कहानी

नीली तितली
- भावना सक्सैना
 कॉटेज से बाहर निकल अलसाई सुबह में पाँव आप ही जंगल की ओर बढ़ गए, कुछ दूर पर ही वह खुला मैदान था; जहाँ से झील के पार उगता सूरज बहुत सुन्दर दिखलाई पड़ता था। ईहा उस ओर चल पड़ी।वहाँ पहुँची तो देखा- आकाश अभी सलेटी ही था, झील पर धुंध गहरी थी; लेकिन पक्षियों की चहचाहट, पत्तियों के बीच से गुज़रती हवा की सरसराहट, पेड़ों से हवा के साथ नीचे उतरती धुंध एक अद्भुत अहसास दे रही थीं। नम हवा अनावरित बाजुओं को सहला रही थी; पर शीतलता ह्रदय मे उतर रही थी। कितना कोमल एहसास है प्रकृति की हर वस्तु में! अनंत सुख का एहसास, जिंदगी की भाग दौड़ से दूर, टेलीफोन की घंटी से परे। न रेडियो का शोर, न टीवी के बदलते सुर, न वाहनों की चें-पें, न दफ्तर पहुँचने की मारामारी और न देरी की खिसियाहट। बस एक अनमोल शांति। समय तो यहाँ भी चलता है, बँधा हुआ ही चलता है, वही चौबीस घंटे तो मिलते हैं इन्हें भी, फिर भी कोई टकराहट नहीं, शायद इसलिए की हर जीव व हर वस्तु एक दूसरे के प्रति सहनशील है। विशेषकर पेड़ जो शायद धैर्य के सबसे बड़े प्रतिमान हैं, जो मानव का हर वार सहकर भी अपनी ओर से सर्वश्रेष्ठ प्रदान करते हैं। घास जो दिन भर रौंदी जाकर भी सर उठाए रहती है, डटे रहने का उससे अच्छा उदाहरण हो ही नहीं सकता... ईहा जब भी मायूस होती है आकाश की ओर नहीं घास की ओर देखती है, सुबह सैर पर जाती है और उसका नम स्पर्श अनुभव करती है;जो उसे एक नवीन ऊर्जा प्रदान करता है। उसकी पुरानी आदत है। वह जब भी परेशान होती है तो एक लंबी सैर पर निकल जाती है, रास्ते के पेड़ों, पक्षियों, गुनगुनाती हवा का स्पर्श एक अजीब सी शांति प्रदान करता है, यह समझाता हुआ सा कि जीवन परेशानियों से ऊपर है। प्रकृति की सहनशीलता उसे सदैव प्रेरित करती रही है।
चलत-चलते उसने महसूस किया कि सूखे पत्तों पर पड़ता हर कदम चरमराने की ध्वनि उत्पन्न कर रहा था, वह रुक गई... रुकने पर अपनी साँसों का स्वर भी सुन पा रही थी वह और जंगल के सरोकार में कोई व्यवधान न हो इस विचार से वहीं पर एक गिरे हुए पेड़ पर बैठ गई, असीम शाँति के बीच उस पल ईहा का मन उस निर्जीव पेड़ का अंश हो जाना चाह रहा था। विचारों में डूबती उतरती, धीर-धीरे आसमान के सलेटी रंग को हल्का होते देख रही थी और जैसे- जैसे थोड़ा उजाला फैल रहा था ;जंगल में नीचे की ओर उतरता रास्ता साफ़ हो रहा था। वह नीचे उतरती पगडण्डी को देखती रही जो कुछ आगे जाकर दो रास्तों में बंट रही थी... उसे लगा यह पगडण्डी उसके वैवाहिक जीवन की तरह है; जहाँ वे दो प्राणी प्रतिबद्ध हो चले तो साथ-साथ काफी दूर तक परम समर्पित रहे, किन्तु रास्ते में न जाने क्या-क्या अनावश्यक उग आया, जिसे वह समय रहते साफ न कर सके और धीरे-धीरे इतना फैल गया कि एक ही सीमा में वे दो जंगलों में बंट गए और भटकते रहे। उसने समझा था चुप रहना हर समस्या का समाधान है पर वास्तविकता में ऐसा नहीं है, चुप रहना विवाद को टाल सकता है ;लेकिन मन के अंदर एक गुबार भर देता है, आपस में बातचीत कर अपने मन की कह लेना, इसका बेहतर विकल्प होता है। वे दोनों ही ऐसा न कर सके; जिसके कारण अनजाने ही कितने काँटे उग आए और तरुण के व्यावसायिक और उसके कार्यालयी व घरेलू दोहरे दायित्वों ने उन्हें इतना उलझा दिया कि कभी इन अनावश्यक खरपतवारों की सफाई को न तो आवश्यक समझा और न ही प्रयास किया कि एक दूसरे के प्रति उठ रहे गिलों को गलाया जाए। जीवन चलता रहा, जीने की उत्कंठा मरती रही। कोई खास परेशानी भी न थी, उसने भी सोचा शायद सबकी जिंदगी ऐसी ही होती होगी, वक्त के साथ फूलों के रंग भी तो फीके हो जाते हैं, विवाह में तो अपेक्षाएँ जुड़ी रहती हैं जो निरंतर बढ़ती हैं और ऊष्मा को सोखती रहती हैं, फिर उसका तो विवाह भी ... इस युग में पश्चिमी देशों में माता-पिता की पसंद और मर्जी से विवाह आम नहीं है; किन्तु उसने अपनी माँ के सुझाव पर तरुण से विवाह किया, वह चाहती तो माँ को मना कर सकती थी पर न तो तरुण में कोई कमी नज़र आई और न ही तब तक किसी और ने उसके जीवन में स्थान बनाया था। वह एक हिन्दुस्तानी है, हिन्दुस्तानियों के लिए परिवार आज भी महत्त्वपूर्ण होता है, ईहा के लिए तो विशेष रूप से है; क्योंकि उसने बिखरे परिवार का दर्द सहा है। जो बचा रहा है ,उसे संजोने को प्रयासरत रही है। उसने वक्त की बेरहमी को जिया है और मरुस्थल में पडऩे वाली वर्षा के समान एक-एक बूँद प्यार को सोखा है, बचपन से।
 बचपन के दर्द भुलाये नहीं भूलते हैं ...
उसे याद है वह करीब सात वर्ष की रही होगी जब अचानक एक रोज़ उनकी दुनिया बदल गयी, पिता अपने कुछ मित्रों के साथ आमोद- प्रमोद के लिए नौका पर निकले थे, यूँ कम ही उनके बिना जाते थे; किन्तु मित्र का जन्मदिन होने के कारण  उनके आठ मित्रों ने मिलकर यह कार्यक्रम बनाया था और माँ ने ही कहा था कि उन्हें अपने मित्रों का मन रखना चाहिए। वह साथ जाने की जिद करने लगी तो पिता ने वादा किया था कि अगले सप्ताहांत पर वह उसे और माँ को भी नौका विहार के लिए ले जाएँगे; किन्तु वह कभी उस वादे को पूरा न कर पाए वह यात्रा उनकी अंतिम यात्रा बन गई थी। संध्या समय वापसी के दौरान क्या हुआ यह ठीक-ठीक बताने वाला तो कोई बचा ही न था, हाँ अनुमान और सरकारी रिपोर्टों के अनुसार उनकी तेज गति से चलती नौका सूरीनाम नदी के मध्य स्थित एक सोना छानने वाली बड़ी नौका से टकरा गयी थी। टक्कर इतनी तेज़ थी कि नौका में सवार आठों व्यक्ति काल के गाल में समा गए। देश की सबसे बड़ी खबर उनके जीवन की सबसे बुरी खबर बन गई थी। वह माँ और अपने छह माह के छोटे से भाई के साथ बड़ी- सी दुनिया में अकेली रह गई थी। माँ सिर्फ रोती थी, सारा आंटी, उसकी माँ की बचपन की मित्र, नन्हे शरन को अपने घर ले गई थी।  पिता के कॉफ़िन को जब घर लाया गया, कितने सारे लोग आए थे ! सब उसके सर पर हाथ फेरते थे और कहते थे - बेटा माँ का ध्यान रखना...
उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह माँ का ध्यान कैसे रखेगी? अब तक तो माँ ही उन सबका ध्यान रखती थी। कुछ समय के लिए वक्त जैसे रुक गया था...सूने-सूने वीरान दिन थे, गुमसुम। और वही दिन थे जब उसने पौधों से बातें करना सीखा था, सारा आंटी ने उसे एक छोटे से गमले में चार पँखुडिय़ों के फूलों वाला फायलोबी का पौधा लाकर दिया था। उनका कहना था कि यदि ईहा फायलोबी का ध्यान रखेगी तो वह बहुत बड़ा हो जाएगा और खूब सुन्दर फूलों के बड़े बड़े गुच्छों से भर जाएगा। उन गुच्छों में पाँच पँखुडिय़ों के फूल भी होंगे, और जब उसकी फायलोबी में पाँच पँखुडिय़ों वाले फूल खिलेंगे ,तो उन पर सुन्दर-सुन्दर तितलियाँ आएँगी, उनकी बातों ने उसे विस्मय से भर दिया था और उसने पूछा- क्या नीली तितली भी? सारा आंटी ने कहा- ऑफ कोर्स डार्लिंग। लेकिन यह कहते हुए उनकी आँखों में एक अजीब सा खालीपन दिखा था ईहा को, जैसे उन्हें खुद अपनी ही बात पर भरोसा न हो। बालमन शीघ्र उस उदासी से परे नीली तितली को खोजने लगा था। धीरे-धीरे पौधा पनपने लगा था। कुछ बड़ा हुआ तो सारा आंटी ने कहा उसे बाहर आहाते में लगा दो...  शायद वह समझाना चाहती थीं कि बड़े होने  का एक अर्थ  बाहर जाना भी है। ईहा बहुत नहीं समझी थी, तब भी नहीं जब उसके दसवें जन्मदिन पर सारा आंटी ने कहा- अब तुम बड़ी हो गई हो ईहा। इन शब्दों का अर्थ बाद में समझी थी वह। सुन्दर से कॉटेजनुमा घर के चारों ओर भाँति- भाँति के सदाबहार पौधे थे, उन्हीं के बीच उसने फायलॉबी रोप दिया था।
शायद सारा आंटी ने एक नीली तितली ईहा की माँ की आँखों में भी छाप दी थी, माँ अब फिर से अपना ध्यान रखने लगी थी और खुश रहने लगी थी, माँ खुश रहती तो उन्हें घुमाने ले जाती और कभी-कभी सारा आंटी और उनके भाई  राजेश भी मॉल में मिलते... दिन कुछ हलके होने लगे थे। राजेश अंकल घर आते तो अच्छा लगता शरन उनसे बहुत हिल गया था, वह नन्हा बच्चा शायद उनमें पिता तलाश रहा था; किन्तु ईहा जानती थी कि पिता कभी नहीं आएँगे और हल्के होते -होते दिन अचानक उसके जीवन में कालिमा भर गए। एक दिन शरन ने राजेश अंकल को पापा कह दिया... ईहा जोर से चीखी- शरन! पापा नहीं अंकल, राजेश अंकल!
माँ ने उसे प्यार से बुलाया और समझाने लगी, बेटा शरन छोटा है, उसे पापा चाहिए, ईहा सुबक उठी थी- माँ पापा तो मुझे भी चाहिए, मिल सकते हैं क्या?
बेटा तुम चाहो तो राजेश के रूप में तुम्हें पापा मिल सकते हैं।
और मैं न चाहूँ तो!
उस समय माँ चुप हो गई थी, बाद में कईं बार सारा आँटी नें उसे प्यार से बहुत समझाने का प्रयास किया; किन्तु वह राजेश अंकल को पिता मानने के लिए तैयार न हुई और उसे किंदरहुइस में जाना पड़ा। किंदरहुइस! डच भाषा में बालघर, एक ऐसा स्थान जहाँ वे बालक रहते हैं जिनके रहने का कोई और आश्रय नहींसभी धार्मिक संस्थाओं के संरक्षण में एक किंदरहुइस रहता है, इस देश में विभिन्न जातियों का ऐसा मेल है कि अलग होते हुए भी एक सामासिक संस्कृति विकसित हो गई है, जिसमें कईं अच्छाइयाँ हैं, तो अत्यधिक उन्मुक्तता का एक ऐसा खोट है; जिसके कारण न जाने कितने बालक अपने होने का उत्सव नहीं मना पाते। जाति धर्म से हटकर कितनी ही सूरीनामी युवतियों की जीवन शैली बिंदास है, शराब, सिगरेट तथा मुक्त सम्बन्धों के लिए यहाँ के समाज में समान स्वतंत्रता है । पहनावे की यूरोपीय शैली से सम्पन्न इस देश में रहन- सहन यूरोपीय और अमेरिकन है । जीवन -यापन की स्वतंत्र पद्धति के कारण मुक्त सम्बन्धों का चलन है और इसीलिए लगभग पाँच लाख की आबादी वाले इस देश में कई अनाथालय हैं ,जहाँ वे बालक रहते हैं ; जिनके माता-पिता व्यक्तिगत, सामाजिक अथवा आर्थिक कारणों से उनके भरण पोषण का उत्तरदायित्व नहीं सँभालना चाहते। आर्य समाज के उस किंदरहुइस में रहने से एक अच्छी बात यह हुई कि उसने हिन्दी सीख ली और पाँचवा स्तर पार करते ही गुरुजी ने अपनी हिन्दी कक्षा की जिम्मेदारी उसे सौंप दी। माँ नियमित मिलने आती... पहले उसे माँ पर बहुत गुस्सा आता था, उम्र जैसे-जैसे बढ़ी परिपक्वता भी बढ़ी और उसने माँ को माफ़ कर दिया ,पर उनके साथ रहने न जा सकी। माँ को माँ के रूप में न देख वह एक स्त्री के रूप में देखने लगी थी, ऐसी स्त्री जो अपने जीवन के तीसरे  दशक में अकेली रह गई थी, जिसे जीने के लिए सहारे की आवश्यकता थी, निर्मम नियति ने जो खेल उसके साथ खेला था, वह उसके साथ कदम मिलाकर जीवन भर रो तो नहीं सकती थी।
स्कूल समाप्त होते ही ईहा ने एक छोटी सी नौकरी कर ली और एक अपार्टमेंट किराए पर लेकर रहने लगी। शरन का सोलहवाँ जन्मदिन था और माँ ने उसे बुलाया था। वह इंकार न कर सकी थी।वहीं तरुण से मुलाकात हुई, वह व्यवसाय में अपने मामा का हाथ बटाने सूरीनाम आया था। माँ तरुण को पसंद करती थी, ईहा को भी कोई आपत्ति न थी और वे दोनों सादा सी औपचारिकताओं के साथ अटूट बँधन में बँध गए थे। स्थापित व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए तरुण को अक्सर हॉलैंड व मियामी जाना पड़ता था सो अकेलेपन से बचने के लिए उसने अपनी नौकरी नहीं छोड़ी थी। आरंभिक सुनहरे पलों के बाद धीरे-धीरे जिम्मेदारियाँ और थकान उन्हें एक दूसरे से दूर करने लगे थे।
इन्हीं विचारों में खोई थी कि बालों पर हल्का सा स्पर्श पा पीछे देखा तो तरुण खड़े मुस्कुरा रहे थे, कितना खोई थी वहकि सूखे पत्तों पर गुज़र कर आए तरुण की पदचाप भी न सुनी। कुछ कहने की अपेक्षा स्वभाव के प्रतिकूल तरुण धीरे से उसके साथ वहीं टूटे तने पर बैठ गए और तभी कोई चिडिय़ा ज़ोर से से कूक गई, मानो इस परिस्थिति से हैरान हो। बहुत देर यूँ ही बैठे रहे दोनों, दोनों अपने अपने विचारों में खोए, एक दूसरे के पास लेकिन कितने दूर, फिर भी एक लय में, पिछले चार दिन से वे इसी लय में चल रहे हैं।
पिछले माह की बात है... यह संयोग ही था कि एक रोज़ मेले में घूम रहे थे और प्रवेश के लिए ली गई टिकटों के लकी ड्रॉ में सूरीनाम के केंद्र में संरक्षित प्रकृति पार्क में सप्ताह भर ठहरने का अवसर मिल गया। ब्लॉमन्स्टीन झील के किनारे स्थित ब्रौन्ज़बर्ग नेशनल पार्क दुनिया का प्रसिद्ध और सशक्त वन है और सूरीनाम का प्रिय पर्यटन स्थल भी। संरक्षित पौधों, पेड़ों और वन्यजीवों से भरा यह वन दुनिया भर में तितलियों के लिए प्रसिद्ध है। नीली तितलियाँ यहाँ का विशेष आकर्षण है। वन्य-जीवन प्रेमी ईहा के लिए यह स्थान धरती पर स्वर्ग था। ब्रौन्ज़बर्ग नेशनल पार्क में कुछ समय बिताने की उसकी बहुत दिन से इच्छा थी, तरुण जानते थे; लेकिन दोनों कभी एक साथ समय न निकाल पाए थे। दोनों ने इस अवसर का लाभ उठाने का निश्चय किया और पहुँच गए ब्रौन्ज़बर्ग। लंबी पहाड़ी ड्राइव अपने आप में किसी रोमांच से कम न थी। एक छोटी बस और चार दम्पती। सभी उत्सुक, पहली बार इस यात्रा पर आए। कईं जगह तो सड़क इतनी सँकरी थी कि लगा जाने गंतव्य पर पहुँचेंगे भी या नहीं। कहीं इतना सघन वन कि फोन-वोन सब बंद... सभी को डर था यदि गाड़ी बंद हो गई तो! किन्तु गाड़ी बंद नहीं हुई, हाँ उसकी खिड़की के पास से एक नीली तितली जरूर उड़कर गई और इससे पहले कि वह उसे देख पाती वह जंगल में समा गई। इन्हीं सब रोमांचों से घिरे गंतव्य पर पहुँचे। बेहद तरतीब से जंगल में पगडंडियाँ साफ की गईं थी, आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित छोटे-छोटे सुन्दर कॉटेज ऐसे बने थे कि पास होते हुए भी ऐसा लगता मानो हर कॉटेज बस अकेला ही है।
अगले दिन लंबी पैदल यात्रा कर आइरीन फॉल पहुँचना एक अलग ही रोमांचकारी अनुभव रहा, ऊँचा नीचा, टेढ़ा-मेढ़ा, धरती को चीरती सघन वृक्षों की जड़ों से बनी प्राकृतिक सीढिय़ाँ। और अंत में ऊपर से गिरता शीतल जल प्रपात... लगा जीवन की सारी कलौंच साफ हो गई है। कितनी बार शब्दों के आदान प्रदान के बिना बहुत कुछ कह समझ लिया जाता है, ईहा व तरुण इसका प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे थे। कितने सुंदर पल सिमट आए थे उनकी झोली में, पर नीली तितली दोबारा न दिखी थी।
....धीरे से उसने तरुण के काँधे पर अपना सर टिका दिया और बहुत धीमे से बोली- तरुण क्या हम सदैव इस जंगल में नहीं रह सकते?
नहीं ईहा यहाँ तो हम अपने-अपने अन्दर के जानवरों को छोडऩे आए थे। चलो अब वापस चलें। तरुण के हाथ का सहारा ले वह खड़ी हुई, तरुण यूँ ही उसका हाथ थामे आगे बढ़ चले।
एक नीली तितली उसकी मुट्ठी में आ गई थी और एक उनके पीछे-पीछे आ रही थी।

 ईहा समझ गई थी कि जिंदगी वैसी नहीं जैसी हम समझते हैं! जिंदगी न वैसी है जैसी हम इसे बनाना चाहते हैं। एक सफ़र है, और सफ़र ही जीवन है.... कि खुशी एक नीली तितली है जो छोटे-छोटे लम्हों में आ बसती है।

सम्पर्कः 64, प्रथम तल, इन्द्रप्रस्थ कॉलोनी, सेक्टर 30-33, फरीदाबाद, हरियाणा- 121 003
Email- bhawnavsaxena@gmail.com

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