February 02, 2014

प्रयास

साँझा प्रयास होने लगे हैं गुम
- संजय वर्मा
पहले के ज़माने में पापड़ बनानाहर घर मे जारी था। पापड़ के आटे में नमक आदि का मिश्रण अनुपात किसी बुज़ुर्ग महिला से पूछा जाता था। वहाँ उनकी सलाह को सम्मान भी दिया जाता था। पापड़ के आटे को तेल लगाकर घन (लोहे के हथोड़े ) से पीटा जाता था। आस-पड़ोस की महिलाएँ अपने-अपने घर से बेलन-पाटले लेकर आतीं व एक दूसरे को सहयोग करने की भावना से हाथ बँटातीं। पापड़ बेलते समय दु:ख -सुख की बातें आपस मे बाँटा करतीं, इसमें मन की भावना व सहयोग को अच्छी तरह से समझा जाता था। पापड़ के लोए भी चखने हेतु बाँटे जाते थे, बाद में पापड़ भी खाने हेतु दिए जाते थे, किन्तु आजकल तो हर घर में पापड़ का बनना कम होता जा रहा है। कौन मगज़मारी करे? घर में पापड़ बनाने की, लोग-बाग टी.वी. से ही चिपके रहते हैं। आस-पड़ोस में कौन रहता है ,ये भी लोग ठीक तरीके से नहीं जानते। भागदौड़ की व्यस्त ज़िन्दगी मे घरों मे साँझा प्रयासों के श्रम से निर्मित पाक कलाएँ  भी अपना अस्तित्व धीरे-धीरे खोती जा रही हैं। रोजगार हेतु आज ‘अच्छों-अच्छों को पापड़ बेलने पड़ रहे हैं’ की कहावत भी काफी मायने रख रही है; क्योंकि ‘पापड़ बेलना’ मेहनत का कार्य है।
अंधश्रद्धा निर्मूलन संस्थाएँ अन्धविश्वास के उन्मूलन में लगी हुई उनका मानना है की अन्धविश्वास के बल पर भोले-भाले लोगों को ठगने वाले यदि एक पापड़ भी अपनी अपनी अन्धविश्वास की शक्ति से तोड़ के दिखला दें तो वे मान जाएँगे।
पहले गाँव-देहातों मे टूरिंग टाकिज हुआ करते थे; जिनमें मध्यांतर के दौरान खाने-पीने की चीजों में पापड़ भी बिकते थे। ड्राई पापड़फ्राईपापड़ का भी उन लोगों में शौकिया तौर पर अच्छा खासा चलन है; जो पेग पीते वक्त चखने में इसका इस्तमाल करते हैं। पापड़ों के भी अपने तेवर व स्वाद होते हैं। चरका पापड़, मीठा पापड़, चने, मूँग, उड़द ,मक्का, चावल, आम के रस को सुखाकर पापड़, आदि कई पापड़ों की बिरादरी है। अमिताभ बच्चन ने तो कच्चा पापड़ -पक्का पापड़ के तेज़ी से बोलने के नुस्खे को काफी चर्चा में ला दिया था। लोग इसे सही उच्चारण से तेजी से बोलने में आज भी गड़बड़ा जाते हैं। शादी ब्याह के पहले घरों में पापड़ बनाये जाने का भी चलन था। शायद ये शादी ब्याह में सहयोग हेतु आस-पड़ोस से सहयोग लेने हेतु चर्चा एक प्रयोग रहा हो। महँगाई के बढऩे से जायकेदार पापड़ों की दूरियाँ भोजन में नहीं परोसे जाने से घट से गई हैं। पापड़ में औषधीय गुण भी होते हैं जो स्वास्थ्य के लिए गुणकारी होते हैं। कुछ महिलाएँ सब्जियाँ महँगी होने पर पापड़ की सब्जी बनाकर पति महोदय को पाक कला के स्वाद चखा जाती हैं। उलेखनीय है की बेलन भी महिलाओं का अपनी बात मनवाने का अचूक शस्त्र संकेत स्वरूप शुरू से ही रहा है।
भ्रष्टाचार, महँगाई को रोकने के लिए कई वर्षो से लोगों को पापड़ बेलने पड़ रहे है। पापड़ को भी उम्मीद है कि कभी न कभी तो ये महँगाई रुकेगी ही, भय है कहीं पापड़ आन्दोलन का हिस्सा न बन जाए। लोग-बाग टी.वी पर सभी वस्तुएँ अपने-अपने हिसाब से विज्ञापनों के सहारे बेच ही रहे हैं। बेचारा पापड़ अब न जाने कैसे वंचित हो गया टी .वी .से। पापड़ बनाने की नीति किसी चाणक्य-नीति से कम नहीं है, किन्तु वास्तव में देखा जाए तो गाँव -शहरों के घरों में पहले साँझा प्रयास से पापड़ बनाने का चलन कम सा हो गया है। महिला सशक्तीकरण में भी साँझा प्रयास के कार्य काफी मायने रखते हैं। इसमें सशक्तीकरण को बल मिलता है। आपस में विचारों के मिलने से समस्याओं के समाधान हेतु सहयोगात्मक भावनाएँ प्रबल हो उठती हैं। हर घर में सहयोगात्मक भावनाएँ पुन: जाग्रत हों यही पापड़ से भी हमारी विनती है। तो क्यों न शुरू करें पापड़ बनाना और खाना और दूसरों को भी खिलाना। पापड़ जिंदाबाद।
सम्पर्क: दृष्टि 125, शहीद भगत सिंह मार्ग मनावर जिला धार (म.प्र.) 454446 Email-antriksh.sanjay@gmail.com

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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