April 13, 2013

जीव विज्ञान



क्या प्रजातंत्र  अन्य प्राणियों में भी होता है?
-डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन
देश और दुनिया में चुनाव होते ही रहते हैं। इन चुनाओं ने दुनिया को और खुद हमारे राजनीतिज्ञों को दिखा दिया है कि हम प्रजातंत्र को गंभीरता से लेते हैं। और हम सबको इस बात से भी प्रसन्नता है कि अब विश्व के कई देशों और म्याँमार में लोगों को प्रजातंत्र का एहसास करने का मौका मिला है।
क्या प्रजातंत्र इंसानों का आविष्कार है जिसका विचार होमो सेपिएन्स ने ही किया है और क्या सिर्फ हम ही इसका अभ्यास करते हैं? क्या अन्य प्राणी समाजों में भी ऐसी प्रथाएँ पाई जाती हैं और क्या इस तरह के व्यवहार का जैव विकास में कोई प्रमाण मिलता है? इस मामले में सामाजिक जीव विज्ञान न सिर्फ कई अजूबे पेश करता है बल्कि हमें कई सबक भी सिखाता है। मधुमक्खियों और कॉकरोचों में इस तरह के व्यवहार को देखकर लगता है कि हमें थोड़ा विनम्र होकर इन्हें सराहने की जरूरत है।
बैंगलोर के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के प्रोफेसर राघवेंद्र गडग्कर मशहूर 'यूसोश्यॉलॉजिस्टहैं और ततैयों और मधुमक्खियों के अध्ययन के लिए जाने जाते हैं। यूसोश्यॉलॉजिस्ट उन वैज्ञानिकों को कहते हैं, जो ऐसे जंतुओं का अध्ययन करते हैं जिनमें सामाजिक संगठन पाया जाता है। उन्होंने हाल ही हमें बताया कि ततैयों और मधुमक्खियों की बस्ती कैसे खुद को संगठित करती हैं और अपने संसाधनों का यथेष्ट उपयोग करती हैं। वे बताते हैं कि हालाँकि इन बस्तियों में एक रानी होती है और मजदूर होते हैं मगर इनमें एकछत्र राज्य जैसी कोई बात नहीं होती। रानी यह फतवा जारी नहीं करती कि बस्ती को क्या करना चाहिए। दरअसल, उसे रानी कहना एक मानवकेंद्रित नजरिया है क्योंकि पूरे जीवन भर वह सिर्फ अंडे देती है और शेष सदस्य उसके नखरे उठाते हैं।
वास्तव में वह भी एक मजदूर ही होती है जिसका काम है अंडे देते जाना। बस्ती में महलों की तरह कोई साजिशें नहीं होतीं और रानी को कोई अन्य अंडे देने वाली मशीन (नई रानी) विस्थापित कर सकती है। जब बस्ती दो भागों में बँटती है तो जो भाग रानी- विहीन होता है वह अपनी नई रानी चुन लेता है।
यह सही है कि रानी अन्य मजदूर ततैयों से अधिक महत्त्वपूर्ण होती है मगर वह कोई तानाशाह नहीं होती जिसके आदेशों का पालन बस्ती के शेष सदस्यों को करना ही पड़े। बस्ती सामूहिक गतिविधियों के आधार पर चलती है, जिसमें हर सदस्य अपनी-अपनी भूमिका निभाता है।
कॉकरोच यानी तिलचट्टा भी आम सहमति पर आधारित समाज का निर्माण करता है। ब्रसेल्स की फ्री यूनिवर्सिटी के जोस हेलोय और उनके साथी कॉकरोच की बस्तियों का अध्ययन करते रहे हैं। उनका निष्कर्ष है कि कॉकरोच एक सरल किस्म के प्रजातंत्र का पालन करते हैं। इनके समाज में हर एक जीव को समान अधिकार हैं और पूरे समूह का निर्णय एक- एक जीव पर लागू होता है।
सवाल यह है कि आप इसे समझने के लिए प्रयोग कैसे करेंगे? हेलोय ने इसके लिए एक आसान- सा प्रयोग किया। उन्होंने कॉकरोच के एक समूह को एक बड़ी- सी तश्तरी में रखा जिसमें तीन छिपने की जगहें थीं। कॉकरोचों ने आपस में एक- दूसरे को छूकर, एंटीना को टकराकर काफी सलाह- मशविरा किया और फिर समूहों में बँट गए। ये समूह अलग-अलग छिपने की जगहों पर पहुँचे।
छिपने की जगह इस तरह बनाई गई थी कि प्रत्येक में 50 कॉकरोच बन सकते थे। मगर देखा गया कि जब प्रयोग में कुल 50 कॉकरोच थे तब वे सब एक ही जगह पर नहीं गए। वे दो भागों में बँट गए, दोनों में 25-25 कॉकरोच थे। छिपने की तीसरी जगह खाली छूट गई। जब छिपने की जगह ऐसी थी कि उसमें 50 से कहीं ज्यादा कॉकरोच बन सकते थे तो वे समूहों में नहीं बँटे और सारे के सारे एक ही जगह में छिपे।
इस नतीजे को समझने के लिए हेलॉय ने व्याख्या की कि कॉकरोच संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा और सहयोग के बीच संतुलन बनाते हैं। वे कहते हैं, इससे प्रजनन के ज्यादा अवसर मिलते हैं, और भोजन व आश्रय जैसे संसाधनों के बँटवारे में मदद मिलती है।
यदि स्तनधारियों की बात करें, तो वहाँ भी प्रजातंत्र या सामूहिक निर्णय के दर्शन होते हैं। ससेक्स विश्वविद्यालय के प्रोफेसर लेरिसन कॉनरेट लाल हिरनों का अध्ययन करते रहे हैं। उन्होंने पाया है कि इनमें हरेक सदस्य को तब फायदा मिलता है; जब वह अपने क्रियाकलाप व गतियों को पूरे समूह के साथ सामंजस्य में करे। यहाँ भी यह दिखता है कि साथ रहकर प्रजनन के ज़्यादा अवसर मिलते हैं और संसाधनों का यथेष्ट उपयोग करने तथा शिकारियों से बचने में मदद मिलती है।
और हाल ही में यूएस के एमरी विश्वविद्यालय के यर्क्स प्राइमेट सेंटर के डॉ. फ्रांस डी वाल को चिंपैंजी समाजों में भी इसी प्रकार के सामूहिक निर्णय व कामकाज के प्रमाण मिले हैं। अपनी आगामी पुस्तक 'चिंपैंजी पोलिटिक्समें उन्होंने बताया कि है कि कैसे अल्फा नर (किसी समूह का प्रमुख नर) काफी समय अपने साथी नरों के साथ भोजन बाँटने और उनकी देखभाल करने में बिताता है। इस तरह से वह उन्हें अपने पक्ष में रखता है। इस तरह के आम सहमति जनक सदस्य एक टिकाऊ सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करते हैं। मैं सोचता हूँ, समूह राजनीति की शुरुआत यही हुई होगी।
कॉनरेट व रोपर ने अपने पर्चे 'डेमोक्रेसी इन एनिमल्स- दी इवॉल्यूशन ऑफ शेयर्ड ग्रुप डिसीजन्समें जंतु व्यवहार का गेम सिद्धांत प्रस्तुत किया है। उनका कहना है कि सामूहिक निर्णय तब होता है जब किसी समूह के सदस्य विभिन्न विकृपों में से किसी एक का चुनाव समूहिक रूप से करते हैं।
इस प्रक्रिया में 'आम सहमति की लागत लगती है। मगर बगैर साझेदारी के निर्णयों की अपेक्षा बराबरी की साझेदारी से किए गए सामूहिक निर्णयों की आम सहमति लागत कम होती है। यही तो प्रजातंत्र है। जब हम मछलियों, कीटों, और स्तनधारियों का अध्ययन करते हैं तो हमें ऐसे कई जंतुओं और उनकी बस्तियों में सहयोगी व्यवहार के विकास के दर्शन होते हैं जहाँ सदस्य कुछ लाभों की कुर्बानी देने और कुछ लागतें वहन करने को तैयार होते हैं ताकि सामंजस्य को बढ़ावा मिले और समूह- प्रजातंत्र चल सके। (स्रोत फीचर्स)
 




1 Comment:

Rashmi Swaroop said...

बड़ी दिलचस्प जानकारी… :)

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष