June 18, 2012

मिसाल: चंडीगढ़ के अन्नदाता

चंडीगढ़ में 79 वर्षीय जगदीश लाल आहूजा जिन्हें सब प्यार से बाबा कहते हैं एक आदर्श परमार्थी सज्जन हैं। आहूजाजी नित्य हजारों दीन दुखियों को नि:शुल्क भरपेट भोजन कराते हैं।
हमारी सांस्कृतिक परंपरा में परमार्थ को मानवीय गुणों में सर्वोच्च स्थान दिया गया है। 'दोऊ हाथ उलीचिये यही सयानो काम' आज जबकि हमारे देश में भ्रष्टाचार के काले बादल दिन प्रतिदिन गहराते जा रहे हैं परमार्थ की मशाल के प्रकाश में नि:स्वार्थ जनकल्याण करने वाले मनुष्यों की बहुत जरूरत है।
चंडीगढ़ में 79 वर्षीय जगदीश लाल आहूजा जिन्हें सब प्यार से बाबा कहते हैं एक आदर्श परमार्थी सज्जन हैं। आहूजा जी नित्य हजारों दीन दुखियों को नि:शुल्क भरपेट भोजन कराते हैं। चंडीगढ़ में दो बड़े चिकित्सालय हैं एक है राष्ट्रीय महत्व की पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल इंस्टीट्यूट जिसमें देशभर से मरीज आते हैं। दूसरा है गवर्नमेंट मेडिकल कालेज। इन दोनों ही चिकित्सा संस्थान में अधिकांश मरीज सीमित आर्थिक साधनों वाले होते हैं। अत: मरीजों के साथ आए उनके परिवार वाले होटलों का खर्चा नहीं उठा सकते इसलिए इन दोनों चिकित्सालयों के आसपास की सड़कों की पटरियों पर भूखे प्यासे दिन- रात बिताते है।
इस परिप्रेक्ष्य में रोज दोपहर आहूजा बाबा अपनी गाडिय़ों में भोजन भरकर सहायकों के साथ मेडिकल कालेज पहुंचते हैं और मरीजों के संबंधियों की विशाल संख्या को नि:शुल्क स्वच्छ पौष्टिक भोजन स्नेहपूर्वक करवाते हैं। उसी प्रकार शाम को वे पीजीआई में भोजन वितरण करते हैं। ऐसा वे पिछले 11 वर्षों से लगातार कर रहे हैं। प्रत्येक व्यक्ति को तीन चपाती, आलू चना की सब्जी, हलवा, एक केला और एक पैकेट मिठाई या एक पैकेट बिस्कुट देते हैं। इस अन्नदाता ने इस पुनीत कार्य के लिए 12 कर्मचारी नियुक्त किए हैं जो रोज एक क्विंटल आटे से 5000 चपातियां तथा अन्य सामग्री तैयार करते हैं। इस कार्य का पूरा खर्चा आहूजा बाबा स्वयं उठाते हैं। इस कार्य के लिए किसी अन्य से वे किसी तरह की सहायता नहीं लेते।
जगदीश लाल आहूजा जी का जन्म पेशावर में हुआ था और विभाजन के समय इनका परिवार रिफ्यूजी के रूप में 1947 में पटियाला पहुंचा। तब आहूजा जी की उम्र 14 वर्ष की थी और इनकी जेब में सिर्फ 12 रुपए थे। 1950 में जब पंजाब की नई राजधानी के रूप में चंडीगढ़ का निर्माण हुआ तो उनका परिवार पटियाला से चंडीगढ़ आ गया। ठेलों में घूम घूमकर फल और सब्जी बेचना प्रारंभ करके 10 वर्षों में ही वे सब्जी और फल के थोक व्यापारी बन गए। 40 साल तक सफलता पूर्वक व्यापार करने के बाद व्यापार अपने पुत्रों को सौंप कर अब वे तन- मन- धन से गरीब रोगियों के संबंधियों के लिए अन्नदाता बने हुए हैं।
जहां तक इस कार्य में लगने वाले धन का प्रश्न है तो आहूजा जी बताते हैं कि 1950 से 1960 के बीच उन्होंने चंडीगढ़ में कई हजार रुपए जमीन के कुछ प्लाट खरीद लिए थे। आज उनकी कीमत करोड़ों में है। बस उन्हीं  को बेच-बेच कर यह जन- कल्याण करते रहते हैं। आहूजा जी कहते हैं कि उन्हें नहीं मालूम कि इसमें कितना पैसा खर्च होता है। ना ही वे इस ओर कभी ध्यान देते हैं।
बीच में आहूजा जी की आंतों में कैंसर हो गया। इसके लिए लंबे समय तक उनकी केमोथैरेपी होती रही। परंतु इस बीच भी यह मुफ्त भोजन सेवा निरंतर चलता रहा। आहूजा जी वास्तव में अन्नदाता है और समाज के लिए आदर्श है। आहूजा जी को हमारा शत् शत् नमन।

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