June 18, 2012

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भारत की प्राचीनतम पांडुलिपि

ऊपर प्रकाशति चित्र भारत में प्राप्त प्राचीनतम पांडुलिपि के एक पृष्ठ का है। यह पांडुलिपि भोजपत्र पर लिखी बौद्ध धर्म के कमल सूत्र की है। यह पांडुलिपि 1931 में एक चरवाहे को उत्तरी कश्मीर के गिलगित में एक बौद्ध स्तूप में मिली थी। ब्राम्ही लिपि में भोजपत्र पर हस्तलिखित यह पांडुलिपि गिलगित के तत्कालीन वजीर द्वारा कश्मीर के महाराजा को पहुंचाई गई थी। उस समय यह पांडुलिपि अत्यंत जर्जर हालत में थी। महाराजा कश्मीर ने जब इस पांडुलिपि को तत्कालीन पुरातत्वविद और बौद्ध स्तूपों, शिलालेखों और साहित्य के शोधकर्ता सर आरील स्टीन को दिखाया तो उन्होंने इस बेशकीमती कृति को पांचवी शताब्दी का बताया। ध्यान देने की बात यह है कि 1500 वर्ष बीतने के बाद भी पांडुलिपि बची रही तो इसका कारण है कि यह भोजपत्र पर लिखी है। यदि कागज पर होती तो इतने लंबे समय के पहले ही गल कर धूल में परिवर्तित हो गई होती।
जापान की इंस्टीटयूट ऑफ ओरियंटल फिलासाफी की तकनीकी सहायता से इस जर्जर पांडुलिपि के भोजपत्रों को मजबूत बना दिया गया है। इतना ही नहीं इस अत्यंत दुर्लभ ग्रंथ की 250 प्रतिलिपियां भी बना दी गई हैं जिससे कि अध्ययनकर्ताओं और शोधकों को भी उपलब्ध हो सके । जहां तक मूल पांडुलिपि की बात है तो अमूल्य राष्ट्रीय निधि होने के कारण वह राष्ट्रीय अभिलेखागार की मजबूत तिजोरी में सुरक्षित है।

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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