June 19, 2012

5 जून पर्यावरण दिवस

अगली अचल संपत्ति पानी

- एस. अनंतनारायणन

कृषि क्षेत्र फिलहाल पानी का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है और इसकी प्राथमिकता बरकरार रहेगी। मगर इसमें इस्तेमाल होने वाले तरीकों को बदलना होगा। पारंपरिक खेती में पानी की बहुत फिजूलखर्ची होती है।
पानी की समस्या हमारे सिर पर खड़ी है और हम इसके लिए मात्र ग्लोबल वार्मिंग को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। पृथ्वी के दो तिहाई हिस्से पर पानी है और यह सबसे प्रचुर संसाधन है। सामान्यत: ऐसा नहीं लगता कि यह समाप्त होने वाला है। मगर समस्या यह है कि यह सारा पानी हमारे उपयोग के काबिल नहीं है। ज्यादातर तो समुद्र का नमकीन पानी है। पूरे पानी का महज 3.5 प्रतिशत हिस्सा ही ताजा और पीने योग्य है और इस 3.5 प्रतिशत का बड़ा भाग ध्रुवों पर बर्फ के रूप में जमा है। केवल 0.01 प्रतिशत, यानी दस हजार में एक हिस्सा ही ऐसा है जिसका उपयोग हम पीने के लिए कर सकते हैं। यह जल धाराओं, नदियों, झीलों और जमीन के नीचे जमा पानी है। इसमें से भी आधा हमारी पहुंच से परे है या बाढ़ की भेंट चढ़ जाता है। ग्लोबल वार्मिंग की काली छाया बर्फ के रूप में जमे पानी के खजाने पर है। डर है कि गर्मी से ये ग्लेशियर पिघलकर बर्फ- पोषित नदियों में विनाशकारी बाढ़ों के जरिए समुद्र में पहुंच जाएंगे। कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि तापमान में यह इजाफा हम तक सीधे पहुंचने वाले पानी को तो नुकसान नहीं पहुंचा रहा है, इसकी चपेट में तो पानी का वह हिस्सा आ रहा है जिस तक हमारी पहुंच ही नहीं है। पर यह तर्क सही नहीं है। ग्लेशियरों के पिघलने से दो तरह से नुकसान होगा। एक तो इसके चलते देर- सबेर बर्फ- पोषित नदियां सूख जाएंगी और दूसरा, इन नदियों के सूखने से जमीन के नीचे के  जल के स्रोतों विलोप का खतरा उत्पन्न हो जाएगा।

भूजल स्तर की समस्या

लगातार बढ़ता औद्योगिकीकरण और जनसंख्या वृद्धि भूजल के बेतहाशा दोहन का कारण है। सतह पर चाहे जितना पानी हो, उससे भूजल की भरपाई की एक सीमा है। वह भूजल स्रोत जो हजारों वर्षों में तैयार हुआ था पिछले कुछ दशकों में ही खाली कर दिया गया। भूजल स्रोतों के खाली होने के असर स्थानीय भी हैं और वैश्विक भी क्योंकि भूजल स्तर सारे विश्व में घट रहा है। आमजन को पानी की आपूर्ति के स्रोत कुएं और झील- तालाब हैं जो भूजल से ही पोषित होते हैं। नदियों ने आमजन और व्यापारियों के लिए आवागमन का साधन मुहैया कराया और मनुष्यों की बसाहट भी नदी तटों से शुरू हुई। वैसे भूजल संसाधन की बदौलत मानव बसाहट नदी से दूर भी सम्भव हो सकी। यह भूजल संसाधन दूर- दूर तक अदृश्य किन्तु व्यापक भूजल धाराओं की मदद से पहुंचता है। यही भूजल आज अत्यधिक दोहन के कारण दुर्लभ हो चला है और जल्द ही राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित करेगा।

देख- रेख की जरूरत

भूजल नजर नहीं आता, और इसी वजह से समाज ने इसे मुफ्त और सुगम वस्तु मान लिया। इसके समाप्त हो जाने की संभावना को लेकर समाज की आंखें हाल ही में खुली हैं। नदी जल के बहाव, तथा झीलों व अन्य जलाशयों के स्तर को लेकर बड़े- बड़े विवाद हुए हैं। सतह पर मौजूद पानी का नियमन करने के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर वैधानिक ढांचे भी हैं। मगर भूजल के सम्बंध में न किसी नियम की कभी जरूरत महसूस की गई और न ही इसकी संभावना है। इस मामले में कानूनी समझ यह रही है कि 'किसी जमीन पर, उसके ऊपर उगने वाली हर चीज पर और उस जमीन की सीमा में पाई गई हर चीज पर अधिकार जमीन के मालिक का होगा'। इंग्लिश कॉमन लॉ (कब्जे का कानून) के तहत संसाधन उसे मिलेंगे जिसने उन्हें पहले हथिया लिया। इस कानून को तेल और पानी जैसे संसाधनों पर भी लागू किया गया। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि जिन संसाधनों का इस्तेमाल आप कर रहे हैं वे आप पड़ोसी की जमीन के नीचे से उलीच रहे हैं, क्योंकि पड़ोसी तभी उस संसाधन का हकदार हो सकता है, जब वह उसे पंप करके जमीन से बाहर निकाले। ऐसे उद्योगों से निपटने के लिए कोई स्पष्ट कानून नहीं है जो अपने आसपास की खेती की जमीन का पानी बेतहाशा खर्च करते रहते हैं और खेती सूखती जाती है। इस तरह की गतिविधि की वजह से पर्यावरण को होने वाले नुकसान से निपटने के लिए कानून बनना शुरू ही हुए हैं।
पर एक बात तो सच है कि इस क्षेत्र में कानूनी और प्रशासनिक नियम बनाने की सख्त जरुरत है क्योंकि यह जल्द ही दुनिया की पहली रणभूमि का रूप ले लेगा।

तेल से लें सबक

इस समस्या को लेकर एक पर्चा ओरगॉन स्टेट युनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने टोक्यो, जापान में हुए एक सम्मेलन में प्रस्तुत किया था। ओरेगॉन स्टेट युनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट फॉर वॉटर एंड वॉटरशेड के सह निदेशक टॉड जार्विस ने बताया कि ऐसे भूजल स्रोत तेजी से खत्म हो रहे हैं, जिन्हें जमा होने में 20,000 साल लगे हैं। कई स्थानों पर जलस्तर 50-60 वर्षों में 500 फीट तक नीचे गिर गया है। जार्विस का मानना है कि भूजल का ह्रास भी तेल स्रोतों के ह्रास के समान स्थायी हो सकता है। चट्टानों के बीच पाए जाने वाले छोटे- छोटे स्थान होते हैं जिनमें पानी इकट्ठा होता है पर कई बार तेजी से होने वाले दोहन से वे स्थान टूट जाते हैं और ऐसा होने पर उन जगहों पर पुनर्भरण की संभावना सदा के लिए खत्म हो जाती है क्योंकि अब वे स्थान ही खत्म हो चुके होते हैं। ओरेगॉन स्टेट युनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित पर्चे में विश्व भर में व्याप्त समस्याओं का लेखा- जोखा प्रस्तुत किया गया है। इसमें उन्होंने एक कानूनी ढाचां भी प्रस्तावित किया है जो तेल उद्योग ने बहुत मुश्किल से विकसित किया था और पानी के लिए यह एक शुरुआती चरण हो सकता है।

एकीकरण

जार्विस ने सम्मेलन में जो अवधारणा प्रस्तुत की थी उसका मूल मंत्र एकीकरण था। यह लोगों के अधिकारों और उद्देश्यों को एक करने पर आधारित है जिसके अंतर्गत हमें मिल- जुलकर सहयोग से काम करना होगा ताकि संसाधनों का लंबे समय तक उपयोग कर सकें और उसे कोई नुकसान न पहुंचे। जार्विस कहते हैं कि बाकी कुछ हो न हो, लेकिन भूजल स्रोतों का उपयोग कर रहे लोगों को वह बात हमेशा याद रखनी होगी जो तेल उद्योगों ने बरसों पहले ही समझ ली थी कि 'अधिकतम निकासी की होड़' किसी के हित में नहीं है- सरोकार चाहे संसाधन के समाप्त होने का हो, निकासी की बढ़ती कीमतों का हो या भूजल भंडारों के विनाश का हो।
ऐसे सारे संसाधन जो दुर्लभ की श्रेणी में है उनका उपयोग उस कार्य के लिए आरक्षित कर दिया जाए जो आर्थिक रूप से सबसे मूल्यवान है। इस बात को पानी के लिए अपनाने के लिए चीजों को सर्वथा नए नजरिए से देखना होगा- फिर चाहे नागरिक अधिकार हों या संपत्ति के अधिकार या सहयोग की बात। इनकी अनुपस्थिति के चलते ही पानी पर युगों से विवाद चले आ रहे हैं।
कृषि क्षेत्र फिलहाल पानी का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है और इसकी प्राथमिकता बरकरार रहेगी। मगर इसमें इस्तेमाल होने वाले तरीकों को बदलना होगा। पारंपरिक खेती में पानी की बहुत फिजूलखर्ची होती है। खेती के इलाके भी बदलेंगे और वे इलाके प्रमुख हो जाएंगे जो भूजल सुगमता से प्राप्त कर सकते हैं। इसके साथ ही पानी उपयोग का एक नया उद्योग सामने आएगा। नदियों के सिकुडऩे या सूख जाने से वे स्थान नए कृषि क्षेत्र बनेंगे जहां भूजल एकत्रित होता है। (स्रोत)

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