October 29, 2011

मंगल पर गाँधी

- लोकेन्द्र सिंह कोट

हम पुण्यतिथि और जन्मतिथि के दो दिन में गाँधी को निपटा देते हैं और फिर साल भर वही सब कुछ करते है जो इन दो दिनों में नहीं करने की कसमें खाते हैं। परिणाम देखिये कि शराब, तम्बाकू जैसी चीजों से हमें सबसे ज्यादा राजस्व प्राप्त होता है। यहां भी हम एक तरीके से अप्रत्यक्ष रूप से गांधी को सरेआम बेच ही रहे होते हैं।

जो नहीं होना था आखिर वह हो गया। पिछले दिनों खबर थी कि गाँधी जी की समदृष्य तस्वीर मंगल ग्रह पर मिली और अखबारों में कई फोटो भी प्रकाशित हुए। वास्तव में यह अंदर की बात है कि जिस व्यक्ति को हरेक बात में पृथ्वी ग्रह पर भुनाया जाता हो वह आखिर बचने के लिए कहीं न कहीं तो जाएगा।
गाँधीजी कहां नहीं है, सरकारी दफ्तर में, सेमिनार में, सिम्पोजियम में, नेताओं की जुबान में, चौराहों में, फेंसी ड्रेस प्रतियोगिता में, कागजों में, फाईलों में, बिल्लोंं में, नोट में, डाक टिकट में, संसद में, विधानसभा आदि सभी जगहों पर हैं। गाँधी अगर कहीं नहीं है तो घरों में, दिलों में, विचारों में, हकीकत में, सिस्टम में, और अपनी आत्माओं में। फिर क्यों न जाएंगे गाँधी जी मंगल पर?
इससे पहले महात्मा गाँधी से जुड़ी कुछ वस्तुएं मसलन ऐनक, एक जोड़ी चप्पल, एक घड़ी और एक पीतल का कटोरा व तश्तरी सरेआम अमेरिका में नीलाम किया गया। हमारे सारे अंतर्विरोध जाकर उस अहंकार से टकरा गए जो हमारे अंदर ठसा-ठस भरा है। हमें डूब मरने वाली शर्म भी पैदा नहीं हो पाई। अखबारों ने हेडिंग दिए भारत की विरासत भारत में लौट आई। इसे विडंबना ही कहेंगे कि गांधी की वस्तुओं को उस व्यक्ति ने खरीदा जो शराब का सबसे बड़ा व्यापारी है। गाँधीजी जीवन भर जिस मद्यपान का विरोध करते रहे उनकी वस्तुओं का तारणहार एक मद्यपान निर्माता निकला। फिर क्यों न जाएंगे गाँधी जी मंगल पर?
समय के साथ हम कितने लापरवाह होते गए यह इस बात से साबित हो गया। मेरा भारत महान के नारे लगाते हुए अतंत: गाँधी को बेचने का उपक्रम भी प्रारंभ हो गया। हमने गाँधी को कहीं तो ब्लैक में तो कहीं टके सेर बेचा है। वैसे भी पिछले साठ- सत्तर वर्षों में गांधी को हम लगातार खोते ही रहे। अब यदि गाँधी की वही वस्तुएं अ_ारह लाख डालर में बिकीं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि इससे ज्यादा तो हम अपने देश में गांधी को बेच चुके हैं। अभी हाल ही में फिर खबर आई है कि गाँधी जी का चश्मा पिछले नवम्बर से गायब है और किसी को कोई खबर नहीं है। फिर क्यों न जाएंगे गाँधी जी मंगल पर?
हम पुण्यतिथि और जन्मतिथि के दो दिन में गाँधी को निपटा देते हैं और फिर साल भर वही सब कुछ करते है जो इन दो दिनों में नहीं करने की कसमें खाते हैं। परिणाम देखिये कि शराब, तम्बाकू जैसी चीजों से हमें सबसे ज्यादा राजस्व प्राप्त होता है। यहां भी हम एक तरीके से अप्रत्यक्ष रूप से गाँधी को सरेआम बेच ही रहे होते हैं। आज आप सोच कर सिहर उठते हैं कि कोई भी सरकारी कार्य बगैर कुछ 'सेवा' के संभव ही नहीं है। इंतिहा तो तब हो गई जब किसी जिले के प्रत्येक सरकारी कार्यालय में गांधी की तस्वीर लगाने की बारी आई तो उसमें भी तथाकथित रूप से घोटाला हो गया। एक तस्वीर को ढेड़ सौ के स्थान पर साढ़े छ: सौ में खरीदा गया। फिर क्यों न जाएंगे गाँधी जी मंगल पर?
जब एक रूपए की गाँधी की फोटो वाली डाक टिकट पर डाक विभाग की मुहर लगती है तो खुद गाँधीजी को स्वयं पर ही दया आने लगती है और वे सोचते हैं कि कब तक वे यूं ही बिकते रहेंगे और उनके मुंह पर हम तारीखों की सील ठोकते रहेंगे। ऐसे में फिर क्यों न जाएंगे गाँधी जी मंगल पर?
संपर्क: नैवेद्ध, 208-ए, पार्क नं.- 3, फेज-1, पंचवटी कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल- 462032
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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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