October 29, 2011

प्रेरक

मिरेकल वूमेन

मेक्सिको में कार्ला फ्लोर्स को 'मिरेकल वूमेन' कहकर पुकारा जाता है और इनकी तस्वीर देखकर आप भी अंदाजा लगा सकते हैं कि क्यों इन्हें 'मिरेकल वूमेन' कहा जाता है।
इनके साथ घटित हुआ हादसा बेहद दर्दनाक था। तीन बच्चों की मां कार्ला सिनोलोआ के कलिआकन में सड़क पर स्ट्रीटफूड बेच रही थी। अचानक एक तेज धमाका हुआ और उनके मुंह से कुछ चीज काफी तेजी से टकराया। कार्ला को उस जगह काफी तेज जलन और दर्द महसूस हुआ। कुछ ही देर में कार्ला बेहोश हो गई। जब कार्ला को होश आया तो उन्होंने खुद को कलिआकन के एक अस्पताल में पाया। डॉक्टरों ने जब उसके चेहरे का एक्स- रे किया तो वे चकित रह गए कि चेहरे में एक जिंदा ग्रेनेड धंसा हुआ था, जो किसी भी वक्त फट सकता था। बमुश्किल सांस ले पा रही कार्ला के जबड़े के बीच फंसे हुए ग्रेनेड को निष्क्रिय किया गया। कई घण्टों की अथक मेहनत और सूझबूझ के बाद डॉक्टर कार्ला को बचाने में कामयाब हो गए। कार्ला ने अपने आधे से अधिक दांतों को खो दिया है, लेकिन उसे खुशी है कि वह जिंदा बच गई।

शांति का नोबेल तीन महिलाओं के नाम

प्रसन्नता की बात है कि इस बार शांति का नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से तीन महिलाओं के नाम घोषित किया गया है। तीनों महिलाओं को यह पुरस्कार महिलाओं की सुरक्षा और महिला अधिकारों के लिए उनके अहिंसक संघर्ष के लिए दिया जाएगा। इन तीनों महिलाओं में पहली हैं लाइबेरिया की राष्ट्रपति एलेन जॉन्सन सरलीफ जो लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित अफ्रीका की पहली महिला राष्ट्रपति हैं। उन्होंने लाइबेरिया में शांति स्थापना में, आर्थिक एवं सामाजिक विकास को बढ़ावा देने में, और महिलाओं की स्थिति मजबूत करने में योगदान दिया है।
दूसरी महिला हैं अफ्रीकी सामाजिक कार्यकर्ता लेमाह जीबोवी जिन्होंने लाइबेरिया में लम्बे समय से जारी लड़ाई के अंत के लिए तथा चुनावों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित कराने के लिए सभी जाति एवं धर्म की महिलाओं को संगठित एवं एकजुट किया।
और तीसरी हैं यमन की तवाक्कु ल करमान जिन्होंने यमन में लोकतंत्र एवं शांति तथा महिला अधिकारों के लिए संघर्ष में एक प्रमुख भूमिका निभाई है।
********
बाँस की तरह लचीला बनो

जेन गुरु जंगल की पथरीली ढलान पर अपने एक शिष्य के साथ कहीं जा रहे थे शिष्य का पैर फिसल गया और वह लुढ़कने लगा। वह ढलान के किनारे से खाई में गिर ही जाता लेकिन उसके हाथ में बाँस का एक छोटा वृक्ष आ गया और उसने उसे मजबूती से पकड़ लिया बाँस पूरी तरह से मुड़ गया लेकिन न तो जमीन से उखड़ा और न ही टूटा शिष्य ने उसे मजबूती से थाम रखा था और ढलान पर से गुरु ने भी मदद का हाथ बढ़ाया वह सकुशल पुन: मार्ग पर आ गया।
आगे बढ़ते समय गुरु ने शिष्य से पूछा 'तुमने देखा गिरते समय तुमने बाँस को पकड़ लिया था वह बांस पूरा मुड़ गया लेकिन फिर भी उसने तुम्हें सहारा दिया और तुम बच गए।'
'हाँ' शिष्य ने कहा।
गुरु ने बाँस के एक वृक्ष को पकड़कर उसे अपनी ओर खींचा और कहा 'बाँस की भांति बनो' फिर बाँस को छोड़ दिया और वह लचककर अपनी जगह लौट गया।
बलशाली हवाएं बाँसों के झुरमुट को पछाड़ती हैं लेकिन यह आगे- पीछे डोलता हुआ मजबूती से धरती में जमा रहता है और सूर्य की ओर बढ़ता है। वही इसका लक्ष्य है। वही इसकी गति है, इसमें ही उसकी मुक्ति है, तुम्हें भी जीवन में कई बार लगा होगा कि तुम अब टूटे तब टूटे ऐसे कई अवसर आये होंगे जब तुम्हें यह लगने लगा होगा कि अब तुम एक कदम भी आगे नहीं जा सकते अब जीना व्यर्थ है।
'जी ऐसा कई बार हुआ है।' शिष्य बोला
'ऐसा तुम्हें फिर कभी लगे तो इस बाँस की भांति पूरा झुक जाना, लेकिन टूटना नहीं। यह हर तनाव को झेल जाता है, बल्कि यह उसे स्वयं में अवशोषित कर लेता है और उसकी शक्ति का संचार करके पुन: अपनी मूल अवस्था पर लौट जाता है।'
जीवन को भी इतना ही लचीला होना चाहिए।
(www.hindizen.com से )

0 Comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष