May 10, 2011

बाघों की अनोखी शरणस्थली टाइगर टेम्पल

- अशोक सिंघई
5 फरवरी 2011 को साहित्यिक गतिविधि- स्वरूप थाईलैण्ड प्रवास हुआ। यह देश से बाहर जाने का मेरा पहला अवसर था। थाईलैण्ड के विभिन्न शहरों में जाना हुआ, प्रवासी भारतीयों से परिचय हुआ। बैंकाक में राजभवन भी जाना हुआ जहाँ हर बड़े शहर की तरह म्यूजियम भी हम लोगों ने विस्तार से देखा। मुझे लगा कि हथियारों के विकास की भी एक समानान्तर गाथा है। आखिरकार मनुष्य ने साथ- साथ जीने के साथ, साथ- साथ मरने के भी पुख्ता इंतजाम कर रखे हैं।
पत्थरों को नोंकीला बनाने वाले हाथों ने ही मिसाइल तक बना लिये हैं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का निबंध 'नाखून क्यों बढ़ते हैं' मुझे झकझोरता रहता है। बैंकाक से लगभग 200 किलोमीटर दूरी पर 'टाइगर टेम्पल' के बारे में थोड़ा बहुत सुन- पढ़ रखा था। थाईलैण्ड के 'कंचनबुरी' प्रदेश के 'साइयोक' जिले में यह अद्भुत जगह है। यह स्थान म्याँमार की सीमा से मात्र 24 किलोमीटर दूर है। 'टाइगर टेम्पल' (वैट फॉ लुआँग ताबुआ) दरअसल एक वन्य प्राणी संरक्षण क्षेत्र है जिसे वहाँ के लोग 'फॉरेस्ट टेम्पल' कहते हैं। अन्य वन्य प्राणियों की अपेक्षा वहाँ टाइगर संरक्षित किये गये हैं इसलिये जनता इसे 'टाइगर टेम्पल' के नाम से जानती है। सन् 1994 में इसकी शुरूआत हुई थी।
मैंने वहाँ के वरिष्ठ बौद्ध लामा से बातें की। उन्होंने कहा कि आप जैन धर्म के हैं और हम बौद्ध धर्मानुआयी हैं। हमारे पुराणों में यह वर्णन आता है कि भिक्षु जंगलों में शेर, चीते आदि हिंसक जानवरों को लकड़ी से वैसे ही हकालते थे जैसे कि बकरियाँ चराई जाती हैं। यह भी जिक्रआता है कि बुद्ध, महावीर आदि को सुनने के लिये जंगल के सभी जीव- जन्तु आते थे, आपके भारत में तो शेर और हिरण के एक ही घाट पर पानी पीने की धार्मिक चर्चायें सुनी- सुनाई जाती हैं। 'टाइगर टेम्पल' आज के अत्याधुनिक समय में इस बात को सिद्ध करने का एक आस्था जन्य प्रयोग है। एक बात और शेर आदि वन्य प्राणियों का अवैध शिकार करने वाले यह नहीं सोचते कि इनके नाजुक और नादान बच्चे भी हो सकते हैं। ऐसे निरीह शिशु- जीवों की प्राणरक्षा भी तो अहिंसा है, मनुष्य की हिंसा के अहिंसक प्रतिकार में यह भी एक कदम है। मैंने टोकते हुये कहा कि मेरे शहर भिलाई में भी एक 'मैत्री बाग' है जिसका चिडिय़ाघर मध्य भारत में मशहूर है। वहाँ हम लोगों को भी 'व्हाइट टाइगर' प्राप्त हुआ था, फिर जोड़ा जुटाया गया और इस अति दुर्लभ प्रजाति के 'व्हाइट टाइगरों' की 'केप्टिविटी' में वंशवृद्धि सम्भव हुई। इस विलुप्तप्राय प्रजाति के सफेद शेर हमारे यहां दर्जन भर हैं जो स्वस्थ व हृष्टपुष्ट भी हैं। उन बौद्ध लामा ने अपना नाम नहीं बताया, पूछने पर वे मुस्कुरा दिये।
स्वामीजी ने बताया कि, 'टाइगर टेम्पल' के लिये 1999 में हमें पहला शावक प्राप्त हुआ था जो कि ग्रामीणों को मिला था। शायद उसकी माँ शिकारियों की शिकार हो गई हो। हम उसे नहीं बचा सके। यह शेरों के संरक्षण की पहल थी। ऐसे शावकों के लिये एक 'शरणस्थल' 'टाइगर टेम्पल' के रूप में चर्चा में आने लगा था। कुछेक ऐसे भी मामले हैं जिसमें लोग शावकों को शौकिया घर में पालते हैं पर उनके बड़े होने पर वे उन्हें बवाल और जी का जंजाल लगने लगते हैं। बच्चों की तरह पाले इन 'पेट्स' को मारा भी तो नहीं जा सकता। ऐसे शावक भी हमें मिलने लगे।
2007 में इनके घर में रखने पर कानूनी पाबंदी लगभग समूचे विश्व में एकसाथ लागू की गई। इस तरह 'टाइगर टेम्पल' भरने लगा। 2007 तक 21 शावक 'केप्टिविटी' में जन्मे। दिसम्बर 2009 तक हमारे पास लगभग 50 टाइगर हो गये थे। बड़े- छोटे सब मिलाकर दिसम्बर 2010 में इनकी संख्या 84 हो चुकी है। डी.एन.ए. परीक्षण के नतीजे जगजाहिर नहीं हैं पर ये टाइगर इंडो-चाइनीज तथा बेंगाल टाइगर ही हैं। ये टाइगर बौद्ध भिक्षुओं के साथ रहते हैं। 'एक्सरसाइज' (अभ्यास) करते हैं, इन्हें प्रेम, दुलार, विश्वास और संरक्षण मिलता है जो इनकी हिंसक प्रवृत्तियों को शान्त रखता है।
यहाँ रोज सैकड़ों- हजारों लोग विश्व के हर कोने से आते हैं, इन्हें छूते हैं, दुलारते हैं, इनके साथ चित्र खिंचवाते हैं। प्रेम की ताकत का मनुष्य को इससे बड़ा और कौन सा सबूत चाहिये। 'हमारी आलोचना भी कम नहीं हो रही है। पर हम तो 'टेम्पल' की विशिष्टता के विश्वासी हैं, होंगे आप माक्र्सवादी, पर यह विश्वास तो आपमें भी होगा ही, यदि आप भारतीय हैं। प्रेम और अहिंसा भारतीयता के सिर- पैर हैं।'
आलोचना के संदर्भ में गौरतलब है कि थाई सरकार ने निरीक्षण के बाद यह पाया कि 'टाइगर टेम्पल' में इनकी समुचित देख रेख हो रही है। अब तो केप्टिविटी में ब्रीडिंग की शासकीय अनुमति भी मिल चुकी है। इन सबसे परे हटकर मुझे लगता है कि जब हम पेड़- पौधों को सींचते हैं तो दरअसल स्वयं को सींचते हैं। जब हम वन्य प्राणियों की चिन्ता में दुबले होते हैं तो वास्तव में हम स्वयं के अस्तित्व की चिन्ता में होते हैं। हमें खबर हो गई है कि समय के साथ इस वसुन्धरा पर हम अकेले स्वीकार नहीं होंगे। प्रकृति का सबसे बड़ा शोषक मनुष्य सबसे जिम्मेदार पोषक होने की मजबूरी में गिरफ्तार हो चुका है।
पता: 7 बी, सड़क 20, सेक्टर 5, भिलाई नगर (छ.ग.)
मोबाइल 09907182061, ईमेल- ashoksinghai@ymail.com

0 Comments:

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष