February 28, 2011

पं. भीमसेन जोशी

- प्रताप सिंह राठौर

पंडित जी जिस तन्मयता से गाते थे उसमें उनके हाथों और चेहरे की मुद्राएं देखकर स्पष्ट हो जाता था कि वे उन स्वरों को अपनी आत्मा की गहराइयों से                                                                                              निकाल कर ला रहे हैं।
पं. भीमसेन जोशी का शायद सबसे प्रिय भजन है 'जो भजे हरि को सदा, वो ही परमपद पाएगा'। पंडित जी के असंख्य भक्तों को भी यह भजन उनके बेमिसाल कंठ से निकला पावन प्रसाद लगता है। 4 फरवरी 1922 को धारवाड़, कर्नाटक में जन्में सुर सम्राट पं. भीमसेन जोशी 24 जनवरी 2011 को शास्त्रीय संगीत जगत में परमपद प्राप्त करके प्रात: 8.05 पर पुणे में चिरनिद्रा में सो गए।
एक संस्कृत शिक्षक की 16 संतानों में से एक पं. भीमसेन जोशी के शैशव या बाल्यकाल में ऐसा कुछ भी नहीं था जो उन्हें संगीत की ओर आकर्षित करता। वास्तव में तो घरेलू वातावरण संगीत में रूचि होने के विरुद्ध था। घर से स्कूल के रास्ते में ग्रामोफोन की दुकान पर बजते रेकार्ड से किराना घराना के उस्ताद करीम खां का गायन सुनकर बालक भीमसेन ने वैसा ही गायक बनने की ठान ली। और 11 वर्षीय बालक भीमसेन घर छोड़कर गुरु की खोज में निकल पड़े। तन पर सिर्फ दो कपड़े- नेकर और कमीज। जेब खाली।
ग्वालियर, कलकत्ता, लखनऊ, रामपुर वगैरह होते हुए वे संगीत गुरु की तलाश में वर्षों भटकते रहे। अमृतसर की वार्षिक म्यूजिक कान्फ्रेंस में बालक भीमसेन जोशी को अपनी तपस्या का मनोवांछित प्रसाद मिला। वहां इन्हें पता चला कि इनके मन की मुराद तो पुणे में किराना घराने के सवाई गंधर्व की शागिर्दी में पूरी होगी। बस फिर क्या था भीमसेन तनमन से सवाई गंधर्व के चरणों में बैठकर संगीत साधना में जुट गए।
उस्ताद करीम खाँ के शिष्य सवाई गंधर्व ने भीमसेन के अंदर भरी जन्मजात प्रतिभा को पहचाना और उसे निखारने हेतु उचित मार्गदर्शन किया। जिससे पं. भीमसेन जोशी संगीत जगत में संगीत मार्तण्ड बनकर चमके।
छह दशकों तक देश विदेश में अपने असंख्य प्रशंसकों को अपने गायन से मंत्रमुग्ध करने वाले पं. भीमसेन जोशी विलक्षण एवं अद्वितीय प्रतिभा के धनी थे। उन्हें मंच पर गायन करते देखना एक अविस्मीरणीय लोमहर्षक अनुभव होता था। पंडित जी जिस तन्मयता से गाते थे उसमें उनके हाथों और चेहरे की मुद्राएं देखकर स्पष्ट हो जाता था कि वे उन स्वरों को अपनी आत्मा की गहराइयों से निकाल कर ला रहे हैं। निस्संदेह पं. भीमसेन जोशी भारतीय शास्त्रीय संगीत के ऐसे अनुपम रत्न थे कि जिनके नाम के साथ जुड़कर भारतरत्न की पदवी सम्मानित होती है। पं. भीमसेन जोशी के असंख्य प्रशंसकों का (मेरा भी) यह विश्वास है कि वे देवी सरस्वती के ऐसे प्रिय पुत्र थे कि देवी स्वयं ही पं. भीमसेन जोशी के कंठ में निवास करती थीं।
पं. भीमसेन जोशी जैसी प्रतिभा के व्यक्तित्व और उपलब्धियों पर जब हम ध्यान देते हैं तो मन में एक प्रश्न उठता है कि प्रतिभा क्या होती है। क्या प्रतिभा की कोई परिभाषा है या हो सकती है? क्या था वह जिसने एक 11 वर्ष के बच्चे के मन में शास्त्रीय संगीत का गायक बनने की ललक भर दी जबकि उसके गरीब घरेलू माहौल में कुछ भी ऐसा नहीं था जो संगीत से दूर का भी रिश्ता रखता हो। शिक्षक पिता के नेतृत्व में घरेलू माहौल तो पूर्णतया जल्दी से जल्दी मैट्रिक तक पढ़कर रोजी- रोटी के जुगाड़ में जुट जाने को प्रेरित करने वाला था। परंतु भीमसेन जी के अंतकरण में कुछ ऐसी प्रतिभा थी जिसके साथ उनका जन्म हुआ था। असलियत तो ये है कि प्रतिभा कुछ ऐसी अवर्णनीय सक्षमता होती है जो किसी- किसी व्यक्ति में जन्मजात होती है। इसे परिभाषित नहीं किया जा सकता। लेकिन हां इसकी पहचान बताई जा सकती है। प्रतिभावान मनुष्य असाधारण व्यक्तित्व के धनी होते हैं और जाने पहचाने रास्तों पर न चलकर नई राह बनाते हैं। प्रतिभावान जिस कला को अपनाते हैं उस पर अपनी अमिट छाप छोड़ते है। पं. भीमसेन जोशी के व्यक्तित्व और जीवन में उपरोक्त सभी विशिष्टताएं जगमगाती हैं।
शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में पं. भीमसेन जोशी जैसी लोकप्रियता शायद ही किसी अन्य कलाकार ने पाई हो। पं. भीमसेन जोशी के असंख्य प्रशंसकों में अधिकांश ऐसे साधारण स्त्री- पुरुष हंै जो शास्त्रीय संगीत के व्याकरण से पूर्णतया अपरिचित है। पं. भीमसेन जोशी अपनी प्रतिभा के चमत्कार से $खयाल हो, अभंग हो, भजन हो या ठुमरी हो- आम श्रोताओं को भी मंत्रमुग्ध कर देते थे। जितने लोकप्रिय पंडितजी भारत में थे उतने ही लोकप्रिय वे विदेशों में भी थे। यही कारण है कि इंग्लैंड की विश्वप्रसिद्ध साप्ताहिक मैगजीन 'दि इकॉनामिस्ट' ने अपने पांच फरवरी 2011 के अंक में पं. भीमसेन जोशी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है।
पंडितजी वास्तव में 'भारतीय शास्त्रीय संगीत' की तरह
अमर हैं।
पता: बी-403, सुमधुर-2 अपार्टमेंट्स, आजाद सोसायटी के पास,
अहमदाबाद- 380015, फोन: 079- 26760367

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