November 27, 2010

मार्गदर्शी दीपकों की दिव्य ज्योति

पिछले कुछ महीनों से देश पर भ्रष्टाचार के घोटालों के काले घने बादल छाये थे। देश का आम नागरिक दिन प्रति दिन खुलते इन हजारों करोड़ रूपयों के घोटालों जैसे जी-2 टेलीकाम घोटाला, कामनवेल्थ गेम्स घोटाला, मुम्बई की आदर्श सोसायटी घोटाला इत्यादि से घोर अवसाद में डूब गया था। ऐसे में स्वाभाविक था कि भ्रष्ट सरकारों की अंतरराष्ट्रीय लिस्ट में हमारे देश का नाम और नीचे गिरकर 87वें स्थान पर गया। भ्रष्टाचार की इस अमावस्या के बीच अचानक हमारे समाज से मानवता की उत्कृष्टता के दो दीप जगमगा उठे और उनके प्रकाश से मन के अवसाद का अंधियारा दीपावली के अनुरूप छंट गया और आशा एवं विश्वास की किरणें फूट पड़ीं।

मानवता की पहली मार्गदर्शी दीप है महाराष्ट्र के करजत तहसील की एक साहसी महिला जिसने अपने रिश्वतखोर पति की पोल खोलकर एक मिसाल कायम की है। उसका भ्रष्ट पति गणेश विष्णु कमांकर जो इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टैक्नालॉजी में पढ़ाता था और कालेज के छात्रों से पैसे लेकर अपने घर पर ही परीक्षा कॉपियां लिखवाने का धंधा चलाता था। गणेश और अपर्णा की शादी इसी वर्ष 14 जुलाई को हुई थी। शादी के कुछ दिन बाद ही अपर्णा को उस समय झटका लगा जब गणेश घर पर नोटों की गड्डियां लेकर आने लगा। अपर्णा के पूछने पर उसने बताने से इंकार कर दिया। लेकिन एक दिन अपर्णा को अपने सवालों का जवाब तब मिल गया जब कुछ छात्र उसके घर पहुंचे और परीक्षा की खाली कॉपियां भरने लगे। अपर्णा ने गणेश को समझाने की कोशिश भी कि वह यह सब छोड़ दे और कहा कि उसका जितना भी वेतन है वह उससे ही घर का खर्च चला लेगी। लेकिन गणेश नहीं माना।
इस तरह एक दिन जब वह 2 लाख रुपए लेकर घर पहुंचा तो अपर्णा का धैर्य जवाब दे गया। उसने अपने पति को सबक सिखाने की ठान ली। अपर्णा ने घर में वे पैसे रखने से मना कर दिया और चेतावनी दी कि वह अपना रास्ता बदल ले। इस पर गणेश ने अपर्णा को पीटा और उसे घर से निकाल दिया। इस मार- पीट से अपर्णा का गर्भपात भी हो गया। घर से निकलने से पहले अपर्णा ने कुछ खाली परीक्षा कॉपियां, मुंबई यूनिवर्सिटी की सप्लीमैंट कापियां, दो कॉलेजों की परीक्षा सील तथा परीक्षा से संबंधित कुछ अन्य दस्तावेज अपने साथ रख लिए और कल्याण पुलिस के पास सभी दस्तावेज लेकर पहुंच गई। अपर्णा की इस शिकायत पर पुलिस ने 24 वर्षीय टीचर गणेश विष्णु कमांकर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया।
मानवता के दूसरे जगमगाते दीप एक ऐसे माता- पिता हंै जिन्होंने शैतान बने अपने जिगर के टुकड़े के खिलाफ अदालत में गवाही दी और उनकी इस गवाही के आधार पर पत्नीहंता उनके पुत्र को दस साल कैद की सजा मिली।
उत्तर प्रदेश के जिला रामपुर शहर कोतवाली क्षेत्र के मुहल्ला खारी कुआं, धोबियों वाली गली में रहने वाला अच्छन खां नशे का आदी था। वह अक्सर पत्नी फहमीदा से मारपीट करता था। 31 दिसंबर 2008 को दोपहर 12 बजे अच्छन ने अपनी पत्नी को बेरहमी से पीटा। उसके पैर पकड़कर घसीटते हुए पहले छत पर ले गया और घसीटते हुए ही नीचे लाया। अच्छन के पिता बच्छन और मां हमीदन ने बहू को बचाने की कोशिश की तो उसने मां- बाप को भी पीटा। अच्छन ने अपनी मां और पिता के सामने ही जूतों समेत पत्नी के सीने पर चढ़कर पहले पिटाई की और बाद में गला दबाकर उसकी हत्या कर डाली। घटना की रिपोर्ट उसके पिता बच्छन खां ने ही दर्ज कराई।
बेहद गरीब बच्छन खां और उनकी पत्नी हमीदन 70 की उम्र पार कर चुके हैं। माता- पिता ने बिगड़ैल बेटे अच्छन की शादी फहमीदा से यह सोच कर की थी कि वह सुधर जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कातिल बेटे को सजा दिलाकर बूढ़े मां- बाप बोले कि वे अदालत में झूठ बोलकर बेटे को बचा तो लेते पर एक दिन परवरदिगार के पास सभी को जाना है, वहां अपनी बेटी जैसी बहू फहमीदा को क्या जवाब देते? इसलिए अदालत में सिर्फ वही बोला, जो आंखों से देखा और सच था। उन्हें अपनी एकमात्र संतान को सजा होने का कोई मलाल नहीं है उसे फांसी भी हो जाती तो भी गम नहीं था।
वर्तमान परिस्थितियों में वास्तविकता तो ये है कि ये दोनों ही घटनाएं हमारी युवा पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक हैं। अतएव इन दोनों वृत्तांतों को स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली किताबों में स्थान दिया जाना चाहिए। ये ऐसे उदाहरण हैं जिन्हें हमारे बालक- बालिकाओं को पढ़ाया जाना चाहिए जिनसेे सबक लेकर वे भारत के लिए आदर्श नागरिक बनें। देश के लिए अच्छा काम करने वालों को पुरस्कार और मेडल देकर उनके कार्यों को सराहा जाता है, लेकिन ऊपर मानवीय चरित्र के जो दो उदाहण दिए गए हैं उन्हें हासिएं पर रख दिया जाता है। जबकि वास्तव में पद्मश्री इत्यादि जो तमाम अलंकरण बांटे जाते हैं उनमें सर्वोच्च अलंकरण पाने के असली हकदार अपर्णा, हमीदन और बच्छन जैसे लोग ही हैं ।
भ्रष्टाचारियों ने तो देश का दीवाला निकाल दिया जबकि इन तीन आम नागरिकों ने हमारी राष्ट्रीय अस्मिता को दीपावली के प्रकाश में जगमगा दिया। अत: आइए रोशनी के इस त्यौहार पर इन दोनों घटनाओं से प्रेरणा लेते हुए हम भी कोशिश करें कि मरती जा रही मानवीयता के इस दौर में समाज और देश में फैल रहे भ्रष्टाचार, अपराध और कुरीतियों के विरूद्ध आवाज उठाएं और सबके दिलों को रोशन करें।

उदंती के सुधी पाठकों को दीपावली की शुभकामनाएं।

- रत्ना वर्मा

2 Comments:

सुरेश यादव said...

'उदंती ' के इस नए अंक में अनकही के लिए रत्ना वर्मा को बधाई देना चाहता हूँ कि मूल्यहीनता के इस युग में आप की खोज -मूल्य रक्षा की है .आज हमारे समाज का दुर्भाग्य है कि मीडिया इन महानताओं को महत्व नहीं दे रहा है .ये घटनाएँ यदि ओरों के लिए उदाहारण बन सकें तो अँधेरे के खिलाफ ये रोशनी के दिए आशा जागते हैं .धन्यवाद .

lokendra singh rajput said...

जाग्रत समाज के बूते ही ये समस्याएँ दूर हो पायेंगी....

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