November 27, 2010

कानून बनाने का समय आ गया

महिला खिलाडिय़ों का यौन शोषण
- तृप्ति नाथ
भारतीय महिला खिलाडिय़ों द्वारा यौनिक दुव्र्यवहार झेलने की तकलीफ अभी भी असंबोधित है और आमतौर पर जितना बताया जाता है यह उससे कहीं अधिक फैली हुई है।
भारतीय खेल सभी गलत कारणों से सुर्खियों में रहा है। जैसे राष्ट्र मंडल खेलों से जुड़े कुकर्म मीडिया में आने शुरु हुए, अग्रणी भारतीय महिला खिलाडिय़ों द्वारा यौनिक उत्पीडऩ और दुव्र्यवहार की बात सामने आई। महिला हॉकी से जुड़े कुकर्म अचानक सामने आ गए। भारतीय महिला हॉकी टीम की सदस्य, रंजीता ने कड़वाहट के साथ मुख्य कोच, एम.के. कौशिक के खिलाफ शिकायत की। चार पृष्ठों के पत्र में रंजीता ने कौशिक पर यौनिक और अपमानजनक टिप्पणियों का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कौशिक ने उनसे कहा कि वो बहुत खूबसूरत हैं और उसके दरवाजे उनके लिए हमेशा खुले हैं और वो कभी भी उनके कमरे में आ सकती है। रंजीता की किस्मत अच्छी थी उसे साथियों ने उसका साथ दिया बल्कि हाल ही में मध्य प्रदेश भोपाल में राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर में उपस्थित सभी 31 महिला हॉकी खिलाडिय़ों ने कौशिक के व्यवहार पर नाराजगी व्यक्त की। फिर मानो ऐसे दुव्र्यवहार की व्यापक प्रकृति को जताने के लिए सिडनी ओलम्पिक कांस्य पदक विजेता कर्णम मालेश्वरी जो इत्तफाक से ओलम्पिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला हैं ने भारतीय खेल प्राधिकरण के भारोत्तोलक कोच, रमेश मल्होत्रा पर जूनियर भारोत्तोलकों को यौनिक रूप से उत्पीडि़त करने का आरोप लगाया।
कुछ कार्यवाही तो हुई। जहां भारतीय भारोत्तोलन संघ ने मल्होत्रा को निलंबित कर दिया, भारत हॉकी पैनल ने रंजीता की शिकायत की जांच के बाद कौशिक को प्रत्यक्षत: दोषी पाया और निलंबित कर दिया। अपनी छवि को बचाने और खिलाडिय़ों का विश्वास दोबारा हासिल करने के लिए, भारत के संघ खेल मंत्रालय ने भारतीय पुरुष हॉकी टीम के पूर्व खिलाड़ी, संदीप सोमेश को महिला हॉकी का कोच बनाया। भारतीय खेल प्राधिकरण ने भी महिला टीम की पूर्व कप्तान, प्रीतम रानी सिवाच और पूर्व खिलाड़ी, संदीप कौर- जिन्होंने विश्व कप और एशियाई खेलों में खेला था उन्हें अतिरिक्त कोच के रूप में नियुक्त किया। दोबारा बनी टीम में अब मधु यादव जो टीम मैनेजर थीं उनके स्थान पर महिला हॉकी के लिए पूर्व सरकारी निरीक्षण रूपा सैनी हैं।
परंतु बदलाव कमोबेश केवल प्रबंधकीय स्तर पर हैं। महिला समाजकर्मी और खेल कॉमेन्टेटरों का मानना है कि भारतीय महिला खिलाडिय़ों द्वारा यौनिक दुव्र्यवहार झेलने की तकलीफ अभी भी असंबोधित है और आमतौर पर जितना बताया जाता है यह उससे कहीं अधिक फैली हुई है। दिल्ली स्थित वरिष्ठ खेल पत्रकार एम.एस. उन्नीकृष्णन के अनुसार व्यक्तिगत और टीम खेल, दोनों में कास्टिंग काउच एक वास्तविकता है। आंध्रप्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन की महिला क्रिकेट खिलाडिय़ों द्वारा की गई शिकायत की ओर ध्यान खींचते हुए उन्नीकृष्णन कहते हैं, 'मैंने दूर के और आदिवासी इलाकों में कोच और अधिकारियों द्वारा महिला खिलाडिय़ों सी शोषण के बहुत से मामलों के बारे में सुना है। पिछले साल ही, एक महिला गोल रक्षक द्वारा दुव्र्यवहार कीशिकायत के बाद, महिला हॉकी टीम के गोल रक्षक कोच, एडवर्ड एलोसिअस को हटा दिया गया था। तैराकी और टेनिस जैसे खेल यौनिक शोषण की न सामने आने वाली कहानियों से भरा पड़ा है। बास्केटबॉल, वॉलीबॉल, एथलेटिक्स और भारोत्तोलन का यौन कुकर्मों में अपना अलग योगदान है। महिला क्रिकेट में भी यौन शोषण बेतहाशा फैला हुआ है।' कुछ महीनों पहले, दो महिला क्रिकेट खिलाडिय़ों ने आंध्र प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव, वी. चामुण्डेश्वर पर उन्हें तंग करने का इल्जाम लगाया था।
भारत के महानतम एथलीट माने जाने वाले मिल्खा सिंह ऐसे दोषी पाए जाने वाले कोचों को कालीसूची में दर्ज करने के पक्ष में हैं। 'कोच एक गुरू होता है। ऐसे गलत काम निंदनीय हैं और देश में सभी कोचों के नाम को गंदा करते हैं। मैंने इसी तरह के केस एथलेटिक्स में भी सुने हैं। ऐसे परिदृश्य में क्या मां-बाप अपनी बेटियों को कोचिंग के लिए भेजेंगें? यदि महिला हॉकी खिलाडिय़ों द्वारा लगाए गए आरोप सही हैं तो सरकार और भारतीय महिला हॉकी संघ को इन आरोपियों को छोडऩा नहीं चाहिए।' स्वयं एक महिला खिलाड़ी और 1982 एशियाड के दौरान भारतीय महिला हॉकी संघ की पूर्व सचिव उनकी पत्नी निर्मल मिल्खा सिंह कहती हैं, 'खेलों में यौनिक उत्पीडऩ उतना ही सच है जितना कि प्रदर्शन बेहतर करने के लिए निषेध दवाएं लेना!'
दुर्भाग्य से इतने वर्षों में परिदृश्य बदला नहीं है। पूर्व अंतरराष्ट्रीय वालीबॉल खिलाड़ी और भीम पुरस्कार विजेता, डॉ. जगमती सांगवान कहती हैं 'भारतीय महिला खिलाड़ी कम से कम पिछले 3 दशकों से यौनिक उत्पीडऩ का सामना कर रही हैं। बल्कि, भारतीय महिला खिलाडिय़ों की दुर्दशा का जिक्र 'खेलों में महिलाओं की भागीदारी- हरियाणा के विशेष संदर्भ के साथ अंतरराष्ट्रीय महिला खिलाड़ी एक केस स्टडी' शीर्षक से उनकी डॉक्टोरल थीसिस में था'। सांगवान, जो आज महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक के शारीरिक शिक्षा विभाग में सह-प्रोफेसर हैं, उन दिनों को याद करती हैं जब 1974 से 1986 तक वे एक सक्रिय खिलाड़ी थीं। उन्होंने अक्सर कोचों को महिला खिलाडिय़ों पर बिना मतलब भद्दी टिप्पणियां देते हुए देखा। वो बताती हैं 'वे कामुकतापूर्ण थे और उनके इशारे अश्लील थे। लेकिन उस समय की महिला खिलाडिय़ों ने व्यापक हित को ध्यान में रखते हुए इसे चुपचाप झेला।' सांगवान, जो अखिल भारतीय लोकतांत्रिक महिला संघ (एडवा) की रोहतक स्थित सहायक सचिव हैं, हाल ही में संघ खेल मंत्री एम.एस. गिल से महिला खेलों में बदलाव लाने की आवश्यकता पर जोर देने के लिए मिलने गईं।
एडवा उन संस्थाओं में से है, जिनका मानना है कि यौनिक उत्पीडऩ और विशेषकर महिला खिलाडिय़ों के शोषण जैसे व्यापक मुद्दों पर बहुत देर से और बहुत कम काम किया गया। एडवा चाहती है कि सरकार कौशिक के खिलाफ न केवल आपराधिक कार्यवाही करे, उनके द्वारा गिल को दिए गए ज्ञापन में उन्होंने जेंडर संवेदशील खेल नीति और सभी क्षेत्रों में यौनिक उत्पीडऩ शिकायत समितियों के गठन की मांग भी की है। एडवा की कानूनी कनवीनर कीर्ति सिंह ने देखा है, 'खेल के क्षेत्र में इतने व्यापक यौनिक उत्पीडऩ प्रचलन के बावजूद, खेल निकायों के पास ऐसे मामलों से निपटने के लिए शिकायत समितियां नहीं हैं। यह सर्वोच्च न्यायालय के कार्यस्थल पर यौनिक उत्पीडऩ रोकथाम पर मार्गदर्शक सिद्धांतों का पालन न करने के बराबर है।'
उन्नीकृष्णन का तर्क है कि दण्ड अपराध की गंभीरता पर निर्भर होना चाहिए। वे कहते हैं, 'वैसे भी, कोई भी कोच या अधिकारी जिसके नाम पर यौनिक उत्पीडऩ का आरोप है, वो आसानी से बच नहीं सकता। वो कोचिंग का काम तभी कर सकता है जब उसे सारे आरोपों से बरी कर दिया जाए।'
महिला समाजकर्मी महिलाओं के लिए चयन समितियों, खेल समुदायों और संघों में भी 33 प्रतिशत आरक्षण चाहती हैं। उनका मानना है कि जब तब खेल मंत्रालय महिलाओं को चयन समितियों और खेलों की निर्णय समितियों में शामिल करने के लिए अग्रसक्रिय उपाय नहीं करेगा, तब तक यौनिक शोषण चलता रहेगा। एडवा का विचार है कि यौनिक उत्पीडऩ से उदाहरण योग्य तरीके और वांछित तत्परता से निपटने के लिए उचित कानून बनाने का समय आ गया है। संघ खेल मंत्री जेंडर संवेदनशील नीति की मांग को स्वीकार करते हैं परंतु महिला संस्थाओं, जानी-मानी महिला खिलाडिय़ों (वर्तमान और भूतपूर्व) और राष्ट्रीय महिला आयोग के साथ परामर्श करना चाहेगें। उन्होंने एडवा से सभी राज्य सरकारों को खेल निकायों में यौनिक उत्पीडऩ विरोधी समितियां स्थापित करने के लिए सरकुलर भेजने का वादा भी किया है।
दण्ड से छुटकारे की संस्कृति रातों- रात नहीं बदलने वाली। चुनौती है मुद्दे पर फोकस बनाए रखना और सुनिश्चित करना कि सरकार और खेल प्रशासन दोनों संस्थागत बदलाव लाएं ताकि महिला एथलीट कामुकतापूर्ण कोचों और उदासीन प्रशासन से निपटने के बजाय अपने खेल कौशल पर ध्यान केंद्रित कर सकें। (विमेन्स फीचर सर्विस)

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
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