June 05, 2010

पानी बचाने के लिए बिल

- सुजाता साहा
पानी बचाने के लिए अब तक सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर वैसे ठोस प्रयास नहीं किए गए जो पानी की कमी को देखते हुए करना चाहिए था। लेकिन जब मामला बहुत ही गंभीर हो गया तो अब जाकर पानी की बर्बादी को रोकने के लिए सरकार ने पानी पर भी बिजली की तरह मीटर लगाने का प्रावधान रखने के बारे में गंभीरता से सोचना शुरु कर दिया है।
लोग बिजली के बिल के रूप में जब मोटी रकम चुकाते हैं तब कहीं जा कर वे बिजली के महत्व को समझ पाते हैं और बिजली का खर्च सोच समझकर आवश्यकता के अनुसार करते हैं, लेकिन पानी के मामले में ऐसा नहीं है। इसी मामले को सुलझाने के लिए तथा अनावश्यक बहते पानी पर अंकुश लगाने के लिए बिजली की तरह ही पानी के लिए भी मीटर लगाए जाने पर विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा विचार किया गया है और कहीं- कहीं तो यह लागू भी हो गया है। छत्तीसगढ़ सरकार ने भी इस बात को गंभीरता से लिया है।
केंद्र सरकार द्वारा उपयोग के आधार पर बिल भुगतान करने की पेयजल व्यवस्था को लेकर दी गई गाइड लाइन के अनुसार भिलाई नगर निगम ने कार्य भी शुरु कर दिया है।
लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या केंद्र के मापदंड के मुताबिक बेहतर पेयजल व्यवस्था लागू हो पाएगी। मापदंड के अनुसार उस क्षेत्र में नल कनेक्शन सौ फीसदी रहना चाहिए। वाटर सप्लाई लीकेज रहित होना चाहिए। पानी की क्वालिटी निर्धारित मापदंडों के अनुरूप होनी चाहिए। नान रेवेन्यु वाटर कम से कम अर्थात 10 फीसदी से कम होनी चाहिए। निगम 24 घंटे पानी सप्लाई करने में सक्षम हो।
यह सोचना कि इन मापदंडों पर राज्य सरकारें खरी उतरेंगी या नहीं यह दूर की बात है फिलहाल तो खुश होना चाहिए कि इस योजना के लागू होने से पानी की महत्ता के प्रति लोग जागरूक हों।
क्योंकि अब यहीं एकमात्र सबसे कारगर तरीका बच गया है ताकि लोग पानी की मितव्ययता को समझ सकें। अब तक होता यही था कि घरों में पानी के उपयोग पर किसी प्रकार का अंकुश नहीं था। कितना भी पानी का उपयोग करे या फिर पीने के पानी से अपनी गाडिय़ां धोएं, घर का आंगन धोएं या फिर नल चालू है तो चालू ही रहने दें, उन्हें तो साल में पानी के लिए एक निर्धारित रकम ही नगर निगम को देनी पड़ती है।
लेकिन अब बिजली की तरह जब पानी का बिल भी उनके घर हर माह आयेगा तब तो वे पानी के महत्व को समझेंगे। इस प्रकार से लोग सोच समझकर बिल के भय से जरूरत के मुताबिक पानी का उपयोग कर सकेंगे।
अब सोचने वाली बात यह है कि पानी जैसी जीवनदायी आवश्यकता को लेकर पक्ष- विपक्ष राजनीति करेगा या इस विषय पर गंभीरता से विचार करते हुए पानी बचाने की मुहिम में अपनी अह्म भूमिका निभाएगा। आप सब भी इस विषय पर जरा सोचें? कहीं ऐसा न हो कि राजनीतिक लाभ- हानि के फेर में पड़कर एक अच्छी सोच ठंडे बस्ते में चली जाए।

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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