March 16, 2010

घोसले में अंडेदेती है किंग कोबरा

दुनिया के सबसे बड़े सापों में किंग कोबरा के नाम का शुमार है, जिसे नागराज के नाम से जाना जाता है। साथ ही यह भी कि दुनिया में केवल यही सांप है जो घोसला बनाता है!
जी हां मादा कोबरा ही एक मात्र ऐसा सांप है जो अपने अंडों के लिए घोंसला बनाती है। यही नहीं, वह अपने घोंसले की कड़ी पहरेदारी भी करती है। वह अपने शरीर से जंगल में पड़ी सड़ी पत्तियों, तिनकों और सूखी घास के सहारे 30 सेमी ऊंचा शंक्वाकार घोसला बनाती है। जब यह घोसला बनाने में तन्मय होती हैं तो बड़ी ही शांत होती है -यहां तक कि पास खड़े व्यक्ति को भी अनदेखा कर सकती है! घोंसला बनाने के बाद वह अंडों के ऊपर या घोंसले के ऊपरी हिस्से में कुंडली मार कर बैठ जाती है और अण्डों से बच्चों को निकलने तक समर्पित भाव से सेती है। वह जून माह में अंडे देती है। आमतौर पर मादा कोबरा एक बार में 20 से 40 अंडे देती है जिन्हें तैयार होने में 60 से 85 दिन लगते हैं। इन दिनों वह निराहार ही रहती है। लेकिन आश्चर्य की बात ये है कि जब अंडों से बच्चे निकलने का समय आता है तो वह उन्हें छोड़कर चली जाती है।
किंग कोबरा तीन से छह मीटर तक लंबा हो सकता है। वैसे तो यह भारत में दुर्लभ है मगर पश्चिमी घाट के घने जंगलों और उत्तर भारत के पहाड़ी भागों में यदा कदा दिख जाता है -यह नीलगिरी की पहाडिय़ों, गोआ, हिमालय के 2000 मीटर की ऊंचाई तक लाहौर से असम तक के विशाल भू भाग के साथ ही बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल से अंडमान तक पाया जाता है।
प्रसिद्ध सर्प विज्ञानी रोम्युलस व्हिटकर इसे आम लोगों की धारणाओं के विपरीत एक शांत स्वभाव और डरपोक सांप मानते हैं -उनसे कई बार इनकी मुठभेड़ हुई है उनके अनुसार हर बार यह डर कर भाग गया है! यह मुख्य रूप से केवल धामिन और पनिहां जाति के सांपो को ही खाता है! पिछले दिनों मद्रास के मशहूर स्नेक पार्क में एक चार मीटर के किंग कोबरा ने चार महीनों में डेढ़- डेढ़ मीटर के पन्द्रह धामन सापों को उदरस्थ कर लिया था।
इसका विष वैसे तो साधारण नाग- कोबरा से कम विषैला होता हैं मगर एक पूरे दंश में यह 6 सीसी तक विष निकाल सकता है जो एक हाथी को भी मार सकता हा, इसलिए सर्परोधी एंटीवेनम इस पर कारगर नहीं है, मगर यह भी सही है कि इस सांप के काटने की घटनाएं बहुत ही कम सुनाई देती हैं!
मूंछें हों तो रामनाथ जैसी...
चाकसू जयपुर, गांव बड़ा पदमपुरा, के निवासी 70 वर्षीय रामनाथ बचपन और जवानी में बकरियां पालते थे अब अमरीका, जापान, इंग्लैण्ड की सैर करते हंै। बड़ी-बड़ी होटलें इनकी उपस्थिति से सजा करती हैं। हंै तो वे अंगूठा छाप साधारण जाट चौधरी, चरवाहा और किसान, पर सबस अलग और निराले। कहते हैं मूंछ है तो मर्द है लेकिन उस मर्द की मूंछों को क्या कहेंगे जिसकी पूरी 10 फीट की मूंछें हों। भई रामनाथ की मूंछें तो ऐसी ही हैं तभी तो वे जिधर से गुजरते हंै लोगों की निगाहें उधर ही ठहर जाती हैं।
32-33 वर्ष पहले की बात है वे इन मूंछों को लेकर उदयपुर आए और यहीं से उनकी नई पहचान बनी। रामनाथ को उसकी मूंछों ने खूब पैसा दिलाया। देश में जगह-जगह जाने के मौके आये, विदेश के कई न्यौते मिले। मेले, प्रदर्शनियां, सरकारी, गैरसरकारी कार्यक्रमों के जरिए इन मूंछो की बदौलत जीवन में उत्साह उमडऩे लगा। अब तक रामनाथ अमरीका, इंग्लैण्ड, जर्मन, जापान, सउदी अरब जैसे कई देशों की सैर कर आएं हैं, कईयों के तो उन्हें नाम भी याद नहीं। इस तरह उन्हें ढेरों प्रशस्ति और पैसा मिला। जयपुर के एक होटल से 8 हजार माहवार मिलता है। जहां वे हर रोज अपनी मूंछो पर ताव देते हैं, प्रदर्शन करते हैं। जयपुर सीटी पैलेस, रामबाग, महारानीजी होटल, आमेर, ओबेराय, होलीडे सहित कई होटलों में जाना-आना लगा रहता है।
जितना भी पैसा मिला है रामनाथ ने उससे गांव में कुआं खुदवाया है, जमीन खरीदे हैं और अपनी पत्नी के लिए ढेर सारे गहने बनवाए हैं उन्हें बड़ा गर्व है कि उन्होंने अपने परिवार के साथ चार धाम की यात्रा कर ली। तो भई मूंछें हों तो रामनाथ जैसी...

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