January 19, 2009

आओ तुम्हें चांद पे ले जाएं


- प्रवीण कुमार

चांद पर कोई वायुमंडल नहीं है, मगर क्लिमेंटाइन अंतरिक्ष यान (1994) से प्राप्त सूचनाओं से पता चलता है कि वहां पानी हो सकता है। यह पानी चांद के दक्षिण ध्रुव के पास मौजूद गर्तों में बर्फ के रूप में हो सकता है। संभवत: भविष्य में अंतरिक्ष यात्री इस पानी का उपयोग पीने के लिए और ऑक्सीजन प्राप्त करने हेतु कर सकेंगे।

नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने 20 जुलाई 1969 के दिन चांद पर पहला कदम रखने के साथ कहा था कि ये 'मानव जाति के लिए एक बड़ी छलांग' है। यह संभवत: एक विनम्र वक्तव्य साबित हो।



22 अक्टूबर को प्रक्षेपित भारत का अपना चांद मिशन चंद्रयान-1 बढिय़ा काम कर रहा है। 8 नवंबर को यान चांद की कक्षा में प्रवेश कर चुका है।

बताते हैं कि जब एडमंड हिलेरी से पूछा गया था कि 'एवरेस्ट पर क्यों चढ़ेंÓ तो उनका जवाब था, 'क्योंकि वह है।Ó मगर चांद के बारे में बात इससे कुछ अधिक है क्योंकि हमारा यह निकटतम पड़ोसी इससे कहीं ज़्यादा का वायदा करता है। चांद अक्सर लोक कथाओं और मायथॉलॉजी में प्रमुखता से नजऱ आता है। एच.जी. वेल्स और आर्थर सी. क्लार्क जैसे विज्ञान कथा लेखकों ने अपनी कहानियों में ऐसी कल्पनाएं की हैं कि लोग चांद पर बस्तियां बनाकर रहने लगे हैं। कई संस्कृतियों में चांद की कलाओं के आधार पर कैलेंडर बनाए जाते हैं जिन्हें चंद्र कैलेंडर कहते हैं। दरअसल माह या महीना शब्द की उत्पत्ति ही चांद के लिए फारसी शब्द माहताब से हुई मानी जाती है। चांद हमसे औसतन 3,84,000 किलोमीटर की दूरी पर है। हमारा यही उपग्रह जब पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाए, तो सूर्य के प्रकाश को रोक लेता है और सूर्य ग्रहण का कारण बनता है। हालांकि आमतौर पर माना जाता है कि चांद पृथ्वी के आसपास चक्कर काटता है, मगर हकीकत यह है कि ये दो पिण्ड (चांद और पृथ्वी) किसी एक साझा गुरुत्व केंद्र के इर्द -गिर्द चक्कर काट रहे हैं। चांद का गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी के दो तरफ के समुद्रों में दिन में दो बार ज्वार पैदा करता है। दूसरी ओर, करोड़ों वर्षों में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल की वजह से चांद की कक्षीय गति धीमी हो गई है।

चांद की उत्पत्ति के जिस सिद्धांत को आमतौर पर माना जाता है, वह कहता है कि किसी समय कोई बड़ा पिण्ड (पृथ्वी से लगभग आधे आकार का) पृथ्वी से टकराया था, उस समय पृथ्वी से ढेर सारा पदार्थ छिटककर एक वलय बना। उसी वलय से चांद का निर्माण हुआ है। यह सिद्धांत सबसे पहले डॉ. विलियम के. हार्टमैन और डोनाल्ड आर. डेविस ने आइकेरस नामक पत्रिका में 1975 में प्रस्तुत किया था।

चांद पर उतरने वाले प्रथम मनुष्य (जुलाई 1969) नासा द्वारा भेजे गए अपोलो यान के अंतरिक्ष यात्री थे। 1960 के मध्य दशक से 1970 के मध्य दशक के बीच चांद पर 65 लैण्डिंग हुए थे। मगर 1976 में ल्यूना-24 के बाद इन्हें अचानक रोक दिया गया था। सोवियत संघ ने शुक्र ग्रह पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया था और यू.एस. ने मंगल और उससे दूर के ग्रहों पर। नासा की योजना वर्ष 2020 में एक बार फिर चांद पर इन्सानों को भेजने की है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) 2015 में दो यात्रियों को एक सप्ताह के लिए अंतरिक्ष में भेजने की योजना पर काम कर रहा है। इसके बाद 2020 तक देश का पहला इन्सानी चंद्रमा मिशन हाथ में लिया जाएगा।

चांद पर मनुष्यों को भेजने का काम चांद की चुंबकीय पूंछ की वजह से रुक सकता है। चुंबकीय पूंछ दरअसल सूर्य से निकलने वाले आवेशित कणों की बौछार को कहते हैं, जो सूर्य से आकर पृथ्वी के पार जाते हैं। ये कण पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के साथ घुल-मिल जाते हैं। इसकी वजह से एक लंबी सी पूंछ निर्मित हो जाती है जो चांद की कक्षा तक पहुंचती है। प्रति माह चांद छ: दिन के लिए चुंबकीय पूंछ में रहता है।

करेंगे क्या चांद पर?

चांद पर एक काम तो यह करना है कि वहां हीलियम-3 नामक तत्व की खोज करना है। यह हीलियम का एक अपेक्षाकृत हल्का, गैर-रेडियोसक्रिय आइसोटोप है। इसमें दो प्रोटॉन व एक न्यूट्रॉन होते हैं जबकि साधारण हीलियम में दो न्यूट्रॉन होते हैं। हीलियम का यह हल्का आइसोटोप पृथ्वी पर दुर्लभ है और इसकी ज़रूरत नाभिकीय संलयन रिएक्टर के लिए होती है। यह एक स्वच्छ, कार्यक्षम व सस्ता नाभिकीय र्इंधन है। पृथ्वी पर स्वच्छ र्इंधन के बढ़ते अभाव को देखते हुए यह एक महत्वपूर्ण चीज़ हो सकती है। ऐसा माना जाता है कि हीलियम-3 चांद पर प्रचुरता में उपलब्ध है। यह वहां की ऊपरी चट्टानों में सौर पवन के अरबों वर्षों के प्रभाव से बनी है। बताते हैं कि चीन के चांद कार्यक्रम में भी हीलियम-3 की खोज शामिल है।

चांद की पथरीली, उबड़-खाबड़ सतह पर यात्रा करना शायद एक समस्या साबित हो। दूसरी समस्या वायुमंडल का अभाव होगी क्योंकि आपको एयर-टाइट वाहन में ही यात्रा करनी होगी। नासा ने इस तरह के एक वाहन का परीक्षण भी किया है मगर वह अधिकतम 1000 किलोमीटर तक ही ले जा सकता है। लंबी यात्राओं के लिए चुंबकीय उत्थान या मेग्नेटिक लेविटेशन (मेग-लेव) की बात सोची जा रही है। इसमें पटरियों पर एक डिब्बा चुंबकीय शक्ति से ऊपर उठा रहता है। इस तरह के तंत्र जापान व जर्मनी में कार्यरत हैं। फिर पहाड़ों को पार करने के लिए सुरंगें या बोगदे बनाने होंगे, जैसे पृथ्वी पर बनाए जाते हैं। चूंकि चांद पर तापमान में बहुत परिवर्तन होता है इसलिए वहां 10-10 फीट की पटरियों के बीच 1-1 इंच की जगह छोडऩा होगी ताकि गर्म होकर पटरियां फैलें तो काफी जगह मिले।

चांद रेडियो खगोल शास्त्रीय अध्ययनों के लिए भी बढिय़ा जगह हो सकती है। चांद के दूरस्थ हिस्से (जिसे हम कभी नहीं देख पाते) पर रेडियो दूरबीनें लगाई जाएं तो वे पृथ्वी पर पैदा होने वाले भारी रेडियो तरंग शोर से बची रहेंगी। ऐसे शांत वातावरण में वे ब्राहृांड का अवलोकन ऐसी न्यून आवृत्तियों पर कर सकेंगे, जिन्हें पृथ्वी का वायुमंडल रोक देता है। इस न्यून आवृत्ति का झरोखा खुलने से कई रोमांचक खोजें होने की उम्मीद की जा सकती है।

चूंकि चांद पर कोई वायुमंडल नहीं है, इसलिए वहां अपरदन नहीं होता। लिहाज़ा यहां का रेगोलिथ (बाहरी चट्टानी व धूलभरी परत) सूरज से आने वाले कणों का अच्छा रिकॉर्ड प्रस्तुत करता है। इससे हमें सूरज पर होने वाली प्रक्रियाओं के अलावा ब्राहांड के दूरस्थ हिस्सों से आने वाले कॉस्मिक विकिरण का अध्ययन करने में भी मदद मिलेगी। इस तरह के अध्ययन से हम समझ पाएंगे कि सूर्य पर अतीत में घटी घटनाओं ने हमारी पृथ्वी के कैसे प्रभावित किया है और जब हम तारों की ओर कदम बढ़ाएंगे तो शायद चांद हमारे लिए पहले पड़ाव का काम करेगा।
(स्रोत फीचर्स)

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