January 19, 2009

भारतीय संस्कृति के उपासक क्लेजिओ



ली क्लेजिओ ने उपन्यासकार के तौर पर 1980 में डेजर्ट के साथ सफलता के सोपान की शुरुआत की। उनकी इस कृति के बारे में अकादमी ने कहा कि इसमें उत्तर अमेरिकी रेगिस्तान में खो चुकी संस्कृति के जबर्दस्त बिंब हैं जिसमें यूरोप का निरूपण अवांछित प्रवासियों की आंखों के जरिए किया गया है। ली क्लेजिओ ने इसी कृति के लिए फ्रांसीसी अकादमी से पुरस्कार भी जीता था। स्वीडन की अकादमी के अनुसार ली क्लेजिओ शुरुआत से ही पारिस्थितिकी के पक्षधर लेखक के तौर पर सामने आते हैं जिनका झुकाव द बुक ऑफ लाइट और द जायंट में दिखाई देता है।
क्लेजिओ को भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है अत: वे उपनिषदों का खुल कर उपयोग करते हैं। क्लेजिओ दार्शनिक भी है और भारतीय दर्शन से बहुत प्रभावित हैं।
- प्रताप सिंह राठौर
स्वीडन की साहित्य अकादमी ने वर्ष 2008 के साहित्य का नोबेल पुरस्कार के लिए ज्यां-मरी गस्ताव ली क्लेजिओ को नामांकित करके विश्व के साहित्य जगत को चौंका दिया है। कारण है कि फ्रेंच साहित्य जगत के बाहर क्लेजिओ का नाम शायद ही किसी ने सुना हो और फ्रेंच साहित्य के पाठकों में से भी बहुत ही कम संख्या में इनके प्रशंसक रहे हैं।

लेकिन साहित्य के विद्यार्थी क्लेजिओ को वर्तमान में फ्रेंच साहित्य का सर्वोत्तम साहित्यकार मानते है। अब नोबेल पुरस्कार पाने के बाद क्लेजिओ की पुस्तकों की मांग बढ़ी है तो पाठकों को इस दार्शनिक उपन्यासकार की साहित्यक उत्कृष्टता को स्वीकार करना पड़ा है। नोबेल पुरस्कार देते हुए क्लेजिओ की प्रशस्ति में कहा गया है कि इन्होंने वर्तमान काल की सबसे प्रभावी सभ्यता (पाश्चात्य सभ्यता) से बाहर निकल कर अन्य सभ्यताओं में विकसित मानवता में शोध किया है।

पश्चिमी सभ्यता में जन्म लेने के बावजूद क्लेजिओ के वैश्विक दृष्टिकोण से समृद्ध होने का कारण उनके जीवनी से मिलता है। 68 वर्षीय क्लेजिओ एक अंग्रेज डाक्टर पिता और फ्रेंच मां की संतान हैं। उनका जन्म तो फ्रांस में हुआ परंतु 8 वर्ष की उम्र में अपने पिता के साथ आफ्रीका चले गए। क्लेजिओ की शिक्षा-दीक्षा इंग्लैंड में हुई। क्लेजिओ कई वर्षों तक पनामा (दक्षिणी अमरीका) में आदिवासियों के बीच रहकर उनकी सभ्यता और संस्कृति का अध्ययन करते रहे। इन दिनों क्लेजिओ अमरीका में निवास करते हैं परंतु वास्तव में क्लेजिओ प्रकृति से यायावर हैं अत: दुनियाभर के देशों में भ्रमण करते रहते हैं। इसी कारण से क्लेजिओ अपने को किसी एक देश का मानने के बजाय विश्व का नागरिक मानते हैं। स्वाभाविक है कि ऐसे में क्लेजिओ का दृष्टिकोण वैश्विक है। जब भी उनसे पूछा जाता है कि वह किस देश के नागरिक है तो वह किसी देश की सीमाओं में अपने अस्तित्व को बांधने से इन्कार करते हुए कहते हैं कि बस फ्रेंच भाषा ही एकमात्र ऐसी है जिसके प्रति वे पूर्णतया प्रतिबद्ध हैं। इंग्लैंड के विश्वविद्यालयों में पढऩे के कारण क्लेजिओ अंग्रेजी भाषा पर भी समान अधिकार रखते हैं। फिर भी क्लेजिओ अपनी साहित्य रचनाएं सिर्फ फ्रेंच भाषा में रचते हैं। वे कहते हैं, अंग्रेजी भाषा से, उन्हें साम्राज्यवाद की बू आती है।

क्लेजिओ को भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है अत: वे उपनिषदों का खुल कर उपयोग करते हैं। क्लेजिओ दार्शनिक भी हैं और भारतीय दर्शन से बहुत प्रभावित हैं। 1967 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'मैटीरियल एक्सटैसीÓ में क्लेजिओ ने मुन्डक उपनिषद और ऋगवेद इत्यादि से विस्तृत उद्धहरण दिए हैं। 1969 में प्रकाशित पुस्तक 'द बुक ऑफ लाइट्स' में क्लेजिओ लोभ, दोष की चर्चा करते हुए मोह को सब खराबियों की जड़ बताते हैं। 1985 में प्रकाशित उपन्यास 'द मिसर्फाच्युन स्ट्राइक्स एट नाइट' में क्लेजिओ ने दस्यु अंगुलीमाल के गौतम बुद्ध के शरण में आने के वृत्तांत का उल्लेख किया है। 1985 में ही प्रकाशित उपन्यास 'द प्रासपेक्टर' में शुक और सारिका के आख्यान के साथ-साथ भारतीय नारी की प्रशंसा में वे लिखते हैं 'परंपराओं से आभूषित और प्रकृति में रमी भारतीय नारी का सौन्दर्य और गरिमा झलकती है।' इस प्रकार के असंख्य उदाहरण क्लेजिओ की रचनाओं में बिखरे हुए हैं।

क्लेजिओ की भारतीय सभ्यता और संस्कृतिक से अतरंग प्रेम की जड़ें बहुत गहरी है। मां की शाखा से क्लेजिओ के एक पूर्वज 1789 की फ्रेंच क्रांति में गायब हो गए थे। उस समय तक फ्रांसीसी भारत में पांडिचेरी में पांव जमा चुके थे। अत: क्लेजिओ के पूर्वजों ने परिवार के उस सदस्य की खोज में भारत की यात्रा करने का निर्णय लिया और समुद्री जहाज से चल पड़े। लेकिन मारिशस पहुंचते तक उनका उत्साह काफूर हो चुका था और वे मारिशस में ही बस गए। मारिशस भारत से गिरमिटिया मजदूरों से भरा हुआ था। ये भारतीय अपने साथ अत्यंत समृद्ध भारतीय संस्कृति भी ले गये थे। क्लेजिओ को भारतीय संस्कृति से परिचय मारिशस में प्राप्त हुआ और एक स्थायी प्रेम संबंध में परिवर्तित हो गया। क्लेजिओ की रचनात्मक प्रतिभा और दर्शन मुख्यतया भारतीय दर्शन और संस्कृति से प्रेरित है परंतु उन्होंने अन्य संस्कृतियों में भी शोध किया है। अपने 1980 में प्रकाशित प्रसद्धि उपन्यास 'डेजर्टÓ में क्लेजिओ योरप के भौंडेपन और अज्ञान की तुलना सहारा की विलुप्त तुआरेग कबीले की संस्कृति की उत्कृष्टता से की है। ज्ञात हो कि फ्रांसीसी उपनिवेशवादियों ने तुआरेग संस्कृति नष्ट कर दी थी।


क्लेजिओ ने लगभग 30 उपन्यास लिखे हैं जिनमें से अभी तक 12 उपन्यास अंगे्रजी में अनुवादित किए जा चुके हैं। ऊपर उनकी जिन किताबों का उल्लेख किया गया है वे उनकी किताबों के अंग्रेजी नाम ही हैं। अब तो उनके सभी उपन्यासों के विभिन्न भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध हो जाएंगे जिससे बहुत बड़ी संख्या में लोगों को क्लेजिओ की विलक्षण प्रतिभा से परिचय प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। क्लेजिओ कहते हैं कि वह अपने लेखन में प्रत्येक दिन और प्रत्येक घटना से अपने संबंध का निरुपण करते हैं। उनके अनुसार हम ऐसे संकटपूर्ण युग में जी रहे हैं जिसमें नित्य विचारों और दृश्यों के शोर- शराबे की बमबारी होती रहती है। अत: क्लेजिओ के अनुसार आज साहित्य का उद्देश्य शायद इसी शोर- शराबे को प्रतिध्वनित करना है।

उनकी सबसे हालिया कृतियों में 2007 की बैलेसिनर शामिल है जिसे स्वीडन अकादमी ने उनके जीवन में फिल्म कला के इतिहास और फिल्म के महत्व के बारे में निजी आलेख करार दिया। उनकी पुस्तकों में बच्चों के लिए कई कहानियां भी शामिल हैं जिनमें 1980 की ललेबी और 1985 की बलाबिलोउ प्रमुख हैं। उम्मीद है कि क्लेजिओ की रचनाओं के हिन्दी अनुवाद भी शीघ्र ही उपलब्ध होंगे।
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