December 13, 2008

व्यापक स्वरूप

व्यापक स्वरूप
उदंती का अक्टूबर अंक पढ़ा। अनकही- तमसो मां ज्योतिर्गमय से पत्रिका की मूल विचारधारा से अवगत हुआ। सबसे बड़ी बात इस पत्रिका के संबंध में यह है कि एक मासिक पत्रिका को इतना व्यापक स्वरूप रायपुर जैसे शहर से प्राप्त हुआ। अभी भी कई साहित्यिक पत्रिकाएं इंटरनेट पर उपलब्ध हैं लेकिन उनमें ज्यादातर विदेशों में रहने वाले भारतीयों के भागीदारी की हैं। ऐसे में उदंती का प्रकाशन वेब पर उपलब्ध होना हिन्दी भाषा और साहित्य की नि:स्वार्थ सेवा है जिसके लिए हिन्दी जगत सदैव ऋणी रहेगा। संपादक और समस्त टीम को शुभकामनाएं।

-अंजीव पांडे, रायपुर से

आधुनिकता का यथार्थ
नवंबर अंक में सूरज प्रकाश की कविता आधुनिकता के यथार्थ की सार्थक प्रस्तुति है। लेखक को बधाई।

-दीपक शर्मा, कुवैत से

उम्दा रचनाएँ
अक्टूबर के अंक में सूरज प्रकाश जी की दिल को छू लेने वाली कविता अब दीप नहीं जलाते और नीरज मनजीत जी का आलेख किताबों की बदलती दुनिया इस अंक की उम्दा रचनाएं हैं। दोनों ही रचनाओं में हमारे आधुनिक से अत्याधुनिक (?) होते चले जाने की पीड़ा पूरी तरह अभिव्यक्त होती है। इन दोनों रचनाओं के लिए रचनाकारों को साधुवाद।

- हरिहर वैष्णव, कोण्डागांव, बस्तर से


आकर्षित करता है
रंग बिरंगी साज- सज्जा के साथ उदंती का नया अंक आकर्षित करता है। समाज के ज्वलंत मुद्दों के साथ कला संस्कृति और साहित्य का समावेश पत्रिका को गरिमा प्रदान करता है। हाथा लोक चित्र हमारी परंपरा से परिचित कराती है तो झीनी झीना बीनी चदरिया कबीर पंथ का विस्तार से विश्लेषण। रंग- बिरंगी दुनिया और क्या खूब कही जैसे स्तंभ रोचकता लिए हुए हैं। पत्रिका पठनीय और खूबसूरत है।

-मनीष गुप्ता, नई दिल्ली से

सुखद अनुभूति
आज के दौर में उदंती.ष्शद्व जैसी पत्रिका को देखना और पढऩा एक सुखद अनुभूति है। कथा साहित्य का भी समावेश हो जाए तो पत्रिका पूर्ण लगेगी।

- रचना सक्सेना, रायपुर से

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