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Jun 18, 2012

कालजयी लघुकथा

- सआदत हसन मंटो 
उर्दू अदब में मंटो सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले और बेहद विवादास्पद रचनाकार रहे जिन्होंने विभाजन से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से लिखा और अदब को ठंडा गोश्त, खोल दो, टोबा टेक सिंह, काली सलवार और बू जैसी चर्चित कहानियों के रूप में कई नायाब तोहफे दिये। उन्होंने उर्दू कहानी को एक नयी शैली और बिल्कुल नया मिजाज दिया। उनकी कहानियां मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख देती हैं। सआदत हसन मंटो की कहानियों की जितनी चर्चा बीते दशक में हुई है उतनी उर्दू और हिंदी और दुनिया के दूसरी भाषाओं के कहानीकारों की कम ही हुई है। अपनी कहानियों में विभाजन, दंगों और सांप्रदायिकता पर जितने तीखे कटाक्ष मंटो ने किए उसे देखकर एक ओर तो आश्चर्य होता है कि कोई कहानीकार इतना साहसी और सच को सामने लाने के लिए इतना निर्मम भी हो सकता है लेकिन दूसरी ओर यह तथ्य भी चकित करता है कि अपनी इस कोशिश में मानवीय संवेदनाओं का सूत्र लेखक के हाथों से एक क्षण के लिए भी नहीं छूटता। प्रस्तुत है उनकी  लघु कहानियाँ -

बेखबरी का फायदा

लबलबी दबी-पिस्तौल से झुँझलाकर गोली बाहर निकली।
खिड़की में से बाहर झाँकनेवाला आदमी उसी जगह दोहरा हो गया।
लबलबी थोड़ी देर बाद फिर दबी– दूसरी गोली भिनभिनाती हुई बाहर निकली।
सड़क पर माशकी की मश्क फटी, वह औंधे मुँह गिरा और उसका लहू मश्क के पानी में हल होकर बहने लगा।
लबलबी तीसरी बार दबी- निशाना चूक गया, गोली एक गीली दीवार में जज़्ब हो गई।
चौथी गोली एक बूढ़ी औरत की पीठ में लगी, वह चीख भी न सकी और वहीं ढेर हो गई।
पाँचवी और छठी गोली बेकार गई, न कोई हलाक हुआ और न  कोई जख्मी।
गोलियाँ चलाने वाला भिन्ना गया।
दफ्तन सड़क पर एक छोटा- सा बच्चा दौड़ता हुआ दिखाई दिया।
गोलियाँ चलाने वाले ने पिस्तौल का मुहँ उसकी तरफ मोड़ा।
उसके साथी ने कहा- यह क्या करते हो?
गोलियां चलाने वाले ने पूछा- क्यों?
गोलियां तो खत्म हो चुकी हैं!
तुम खामोश रहो... इतने- से बच्चे को क्या मालूम?

करामात

लूटा हुआ माल बरामद करने के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरु किए।
लोग डर के मारे लूटा हुआ माल रात के अंधेरे में बाहर फेंकने लगे, कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपना माल भी मौका पाकर अपने से अलहदा कर दिया, ताकि कानूनी गिरफ्त से बचे रहें।
एक आदमी को बहुत दिक्कत पेश आई। उसके पास शक्कर की दो बोरियाँ थी जो उसने पंसारी की दुकान से लूटी थीं। एक तो वह जूँ-तूँ रात के अंधेरे में पास वाले कुएँ में फेंक आया, लेकिन जब दूसरी उसमें डालने लगा खुद भी साथ चला गया।
शोर सुनकर लोग इकट्ठे हो गये। कुएँ में रस्सियाँ डाली गईं।
जवान नीचे उतरे और उस आदमी को बाहर निकाल लिया गया।
लेकिन वह चंद घंटों के बाद मर गया।
दूसरे दिन जब लोगों ने इस्तेमाल के लिए उस कुएँ में से पानी निकाला तो वह मीठा था।
उसी रात उस आदमी की कब्र पर दीए जल रहे थे।

खबरदार

बलवाई मालिक मकान को बड़ी मुश्किलों से घसीटकर बाहर लाए। कपड़े झाड़कर वह उठ खड़ा हुआ और बलवाइयों से कहने लगा- तुम मुझे मार डालो, लेकिन खबरदार, जो मेरे रुपए- पैसे को हाथ लगाया...!
हलाल और झटका
मैंने उसकी शहरग पर छुरी रखी, हौले- हौले फेरी और उसको हलाल कर दिया।
यह तुमने क्या किया?
क्यों?
इसको हलाल क्यों किया?
मजा आता है इस तरह।
मजा आता है के बच्चे...तुझे झटका करना चाहिए था... इस तरह।
और हलाल करने वाले की गर्दन का झटका हो गया।
(शहरग- शरीर का सबसे बड़ा शिरा जो हृदय में मिलता है)

चौसर

-पीयूष कुमार मिश्रा
अनगिनत मोहरों के बीच
मैं खड़ा हूँ -
एक मोहरा
किसी ने चाल चल दी है
और अब एक मोहरा खड़ा है सामने मेरे
अब मुझे चलना है
और मैं सोच में हूँ ...
अगर हम हार गए
तो हमारे ये जो खाने हैं ...
सफेद और काले
क्या उनके हो जायेंगे?
उन अजनबियों के, रकीबों के?
और अगर हम जीत गए
तो ये जो अजनबी मोहरे हैं
क्या गुलाम हो जायेंगे हमारे?
मगर ,
मैं तो सिर्फ एक मोहरा हूँ
मेरी तो सिर्फ एक जमीन है...
सिर्फ एक खाना और ,
कोई मोहरे का गुलाम कैसे हो सकता है
तो ये तो यकीन है
ये जंग नहीं!
शायद ये खेल है कोई
मगर इस खेल में ऐसा क्यूँ है
कि कोई प्यादा अगर बढ़ गया आगे
तो फिर पीछे नहीं आ सकता...
और वजीर की जिधर मर्जी उधर जा सकता है?
प्यादा एक मर गया कभी तो
आंसू भी नहीं आते, गम भी नहीं होता
मगर बादशाह पर किसी ने
नजर भी की तिरछी
तो बाकी के सारे मोहरे
टूट पड़ते हैं उस पर ?
खेल में तो सबका हक
बराबरी का होता है...
ये शायद खेल भी नहीं!
ये जंग भी नहीं
ना जीत अहम है इसमें
न हार से कोई फर्क पड़ता है
ये खेल भी नहीं
यहाँ कोई बराबर भी नहीं!
मैं सोच में हूँ...
मैं कौन सी चाल चलूँ
एक मोहरा मेरे सामने खड़ा है
कि मैं अगर
उसके सीने पर पाँव रखकर आगे ना बढ़ गया
तो कुछ ही देर में
वो मुझे चीरता हुआ आगे निकल जायेगा!

Address-
Matri Chhaya, East Ashok Nagar, Road No 14,
Near Vijay Market, Kankerbagh Colony,
Patna - 800020,
http://mera-panna.blogspot.in

ग़ज़ल: क्या करें

- गिरिजा कुलश्रेष्ठ
1.
मौसम बदल रहा है हर शाम क्या करें।
उपवन उजड़ रहा है सरेआम क्या करें।
है कौन किसके आगे यह जंग सी छिड़ी है।
हरसूँ सुनाई देता कोहराम क्या करें।
बैठे रहे वो अब तक हाथों पे हाथ रख कर।
अब रोपते हथेली पे आम क्या करें।
कारण कोई न समझे तह तक कोई न जाए।
सब देखते हैं केवल अंजाम क्या करें।
वोटों की भीख माँगी कितने करार करके
भूले वो जीत कर जो आवाम क्या करें।
निर्माण में भवन के बस एक ईंट रख कर   
अखबार में छपाते वो नाम क्या करें।
काँधों पे जिनके सदियों से यह जमीं टिकी है।   
वे ही सदा रहे हैं गुमनाम क्या करें।

2.
खबरों के लिये जुर्म कुछ संगीन चाहिये।
टीवी सभी को अपना रंगीन चाहिये।
यह भेद और विभाजन हम में रहा सदा से
हाँ एकता को पाक या फिर चीन चाहिये।
चलते रहे हैं लेकर वो साथ में हमें भी
मीठे के साथ कुछ तो नमकीन चाहिये।
सुख कर रहे हैं अपनों को आदमी से दूर
लाने करीब माहौल गमगीन चाहिये।
तिकड़म से कामयाबी मिलती है चन्द दिन ही   
कुछ कर दिखाने ईमानो -दीन चाहिये।

मेरे बारे में- 

जीवन के पाँच दशक पार करने के बाद भी खुद को पहली कक्षा में पाती हूँ । अनुभूतियों को आज तक सही अभिव्यक्ति न मिल पाने की व्यग्रता है। दिमाग की बजाय दिल से सोचने व करने की आदत के कारण प्राय: हाशिये पर ही रहती आई हूँ। फिर भी अपनी सार्थकता की तलाश जारी है।
संपर्क:  मोहल्ला- कोटा वाला, खारे कुएँ के पास,
ग्वालियर(मप्र) girija.kulshreshth@gmail.com