उदंती.com को आपका सहयोग निरंतर मिल रहा है। कृपया उदंती की रचनाओँ पर अपनी टिप्पणी पोस्ट करके हमें प्रोत्साहित करें। आपकी मौलिक रचनाओं का स्वागत है। धन्यवाद।

Jun 5, 2021

जीवन दर्शन- मानस में नारी महिमा और तुलसीदास

-विजय जोशी
 (पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल, भोपाल) 

    राम मर्यादा पुरुषोत्तम थे और उन्हें जनमानस तक पहुँचाने का काम किया गोस्वामी तुलसीदास ने। रामचरित मानस मूलत: धार्मिक ग्रंथ न होकर जन जन से जुड़ी जीवन संहिता का संविधान है जिसमें हर एक के कर्तव्य तथा आदर्श कार्यकलाप का विषद वर्णन किया गया है। पर जैसा कि अमूमन होता है नकारात्मक मानसिकता से ग्रस्त छिद्रान्वेषी लोग अच्छे में भी बुराई को प्रस्थापित कर प्रचारित कर देते हैं। तो आइये आज चर्चा करें एक ऐसे ही प्रसंग की।

  संत तुलसी की एक चौपाई को बहुत प्रसारित कर सामाजिक विभाजन को सुनिश्चित किया गया है जिसे नारी और शूद्र का अपमान बता कर समाज पर थोप दिया गया है जो सर्वथा असत्य है। सकारात्मकता का पहला प्रसंग तो केवट का ही है जिसे राम ने गले लगाया तथा जिसने राम को सरयू पार करवाया था। वह वर्णन कितना भावुक है भक्त और भगवान या फिर राजा एवं प्रजा के बीच। केवट कुछ लेना नहीं चाहते और राम देना चाहते हैं उतराई के एवज में आभार स्वरूप। अंतत: सीता प्रयास करतीं हैं अपनी मुद्रिका केवट सम्मान के प्रति समर्पण करलेकिन उसे भी वह स्वीकारता नहीं कर्तव्य परायणता के परिप्रेक्ष्य में।

  दूसरा प्रसंग है वनवासिनी शबरी का जिसके जूठे बेरों का राम ने प्रेमपूर्वक रसास्वादन किया वर्णवर्ग भेद त्यागकर। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि जो लाभ ऋषि मतंग को सुलभ नहीं हो पाया वह शबरी को सहज ही मिल गया। भावुक बात यह भी कि राम अपने पैरों चलकर लक्ष्मणसीता सहित स्वयं उसके द्वार पधारे।

 यहीं एक बात और बड़ी मार्मिक है तथा वह यह कि जब शबरी ने राम से कहा कि यदि रावण का संहार न करना होता तो आप यहाँ कैसे आते और मैं असहाय भीलनी कैसे आपसे मिल पाती। तब राम ने जो कहा वह भारत को एकता में समाहित करने का सबसे सुंदर सूत्र है। राम ने कहा रावण से संग्राम तो मात्र एक बहाना है। यह काम तो वीर हनुमान एक पल में कर सकने में समर्थ हैं। उसे धराशायी करने में उन्हें एक पल भी नहीं लगेगा। मेरा उद्देश्य तो तुम और अपने अन्य बंधु बाँधवों से मिलना था। यदि ऐसा न होता तो भला मैं क्यों अपने पैरों चलकर अपनी भारत एकता यात्रा पर निकलता।

   सो कुल मिलाकर बात का मन्तव्य स्पष्ट है। सुंदर कांड में वर्णित है कि तीन दिन की प्रतीक्षा एवं विनय के बाद भी जब समुद्र ने राम को लंका अभियान हेतु जल मार्ग की सुविधा नहीं प्रदान की तब राम को कहना ही पड़ा :

विनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति

बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति

  और तब भावी संकट के परिप्रेक्ष्य में समुद्र ने जो उद्गार व्यक्त किये उन्हीं की व्याख्या मनमाने ढंग से करके पावन प्रसंग को कलुषित करने का प्रयोजन किया गया। समुद्र द्वारा उल्लेखित शब्दों को शूद्र एवं नारी बताकर इतिहास के साथ अपराध किया गया। एक पल के लिये उनकी बात को सत्य की कसौटी पर परखा जाए तो सोचिये तुलसी स्वरचित 10,902 चौपाइयों में कहीं भी नहीं और सिर्फ एक चौपाई में ही ऐसा क्यों लिखते। इस विषय में प्रकांड विद्वान रामानुरागी राम भद्राचार्यजी ने स्थिति को स्पष्ट करते हुए जो मूल चौपाई प्रस्तुत की है वह इस प्रकार है 

ढोल गँवार क्षुब्ध पशुरारी

सकल ताड़ना के अधिकारी

इसका अर्थ है बेसुरा ढोलगँवार व्यक्तिक्षुब्ध या आवारा पशु जो लोगों को कष्ट देते हैं तथा रारी अर्थात कलह करने वाले लोग जिस तरह दंड के अधिकारी हैं उसी तरह मैं भी आपका मार्ग रोकने के कारण दंड दिये जाने के योग्य हूँ। कालांतर में उसी क्षुब्ध को शूद्र तथा रारी को नारी में परिवर्तित कर समाज में विद्वेष फैलाने एवं निहित स्वार्थों के लिए बाँटने का उपक्रम किया गया।

 संदर्भ का समापन यह है कि तुलसी यदि दुर्भावना या पूर्वाग्रह से ग्रस्त होते तो वह गलत बात  रामायण में एक से अधिक बार झलकतीकेवल एक ही बार क्यों। यह विचारणीय सत्य है जो स्वीकारने योग्य है और उसी परिप्रेक्ष्य में इसे देखा जाना चाहिये। अवांछित भूल के सुधार स्वरूप। तो आइये आज हम नकारात्मकता के दलदल से बाहर निकल सदाशयता व सद्भाव के साथ रामचरित मानस का पठन पाठन करें एवं वास्तविक अर्थ का आनंद लें।

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023, मो. 09826042641, E-mail- v.joshi415@gmail.com

20 comments:

Hemant Borkar said...

अति सुंदर वर्णन ।

विजय जोशी said...

हेमंत भाई, जय हो. आप बहुत गंभीर तथा त्वरित पाठक हैं. सदा मान बढ़ाते हैं. सस्नेह

प्रेम चंद गुप्ता said...

यह विशेषण बहुत सटीक है"छिद्रान्वेषी " ऐसे लोगों के लिए गोस्वामीजी ने एक सटीक चौपाई लिखी है " जे परदोष लखहिं सहसाखी, परहित घृत जिनके मन माखी।" ऐसे दुष्टों की वंदना के पश्चात वे बड़े विश्वास के साथ कहते हैं " मैं अपनी दिशि कीन्ह निहोरा, ते निज ओर न लाउब भोरा।" सत्य उन्होंने अपनी ओर से कोई चूक नहीं की और अपनी विद्वेष पूर्ण कार्य में जुटे रहे। वे तो ऐसा करेंगें ही यह उनकी प्रकृति है। वास्तविक स्वरूप और भाव को सामने लाना ही सज्जन पुरुष का काम है, जो आपने पूरी निष्ठा और उत्तरदायित्व के साथ किया है। बहुत साधुवाद। बहुत बधाई। सादर प्रणाम।

Amulya Deota said...

अति सुन्दर रचना, अभी भी हमारे देश में बहुत सारे लोग नारी शक्ति का सम्मान नही करते आपने तुलसी दास जी के दोहे की सही विवेचना की है.

देवेन्द्र जोशी said...

इस संदर्भ में मेरा मानना है कि तुलसी दास जी केवल यह संदेश देना चाहते थे कि यदि कोई कईं बार निवेदन करने के बाद भी जिद पर अड़ा रह तो उसे प्रताड़ित करने में कोई हानि नहीं है। नारी अपमान का तो उनके मन मे्ंं ख्याल आना भी असंभव है।

samaranand's take said...

While reading your take and mention of Kewat and Sabari reminded me discourses of Late

samaranand's take said...

Rajeswaranandji,also would articulate same way. A very well argued article.,बधाई

विजय जोशी said...

हार्दिक आभार. कहा गया है दुष्ट की दुष्टता से अधिक कष्टकारी है सज्जन की निष्क्रियता. यही हुआ हमारे धर्म ग्रंथों के साथ. कम से कम एक कोशिश तो की जाए. स्नेह के आभार. सादर

विजय जोशी said...

सही कहा और यह भी तब जब वर्ष में दो बार नव रात्रि पर नारी पूजी जाती है. सरस्वती विद्या की देवी है. यह हमारी दोहरी मानसिकता ही है जिसने हमारा नुकसान किया. हार्दिक धन्यवाद.

विजय जोशी said...

सही कहा आपने और संभवतया लोगों ने अर्थ का अनर्थ कर दिया. किसी दिन तो सब ठीक होगा. बीच में जब आपका मोबाइल खराब था एक शून्य सा उभर आया था. हार्दिक आभार सहित. सादर

विजय जोशी said...

Yes Sir we all miss RajeshwaranandJi. I had met Him in manas bhavan just a week before His MahaPrayan. We were the first to invite Him in Bhopal. Late Swami AtmabholanandJi did a lot for everyone in BHEL. Kind Regards

Dil se Dilo tak said...

कई मित्रों ने भी इस चौपाई के लिए रार भी किया। सच में विद्वेष घर कर गया दोस्ती में। इस ज्ञानवर्धक लेख के लिए धन्यवाद सर। बहुत ही सरल एवं स्पष्ट शब्दों से उदाहरण दिया आपने। सही विश्लेषण। विशेषतः शबरी प्रसंग। धन्यवाद सर।
--
रजनीकांत चौबे

Unknown said...

पुरुषोत्तम तिवारी 'साहित्यार्थी' भोपाल
सर, पूज्यपाद श्री रामभद्राचार्य जी विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न और मूर्धन्य विद्वान हैं. शूद्र और नारी शब्द इस चौपाई में अकारण त्रुटिवश टंकित हो गए होंगे. भारतीय सन्त समाज को इधर देखकर एकमत से इसका संशोधन करना चाहिए. सुन्दर व्याख्या को आपने देश के समक्ष रखा है.इस हेतु आप को प्रणाम.

विजय जोशी said...

प्रिय रजनी, शबरी और केवट प्रसंग ही हमारी संस्कृति है भारत एकात्मकता अभियान. तुम्हारा मनोयोग से पढ़ना मुझे शक्ति व संबल प्रदान करता है. सस्नेह

विजय जोशी said...

प्रिय पुरुषोत्तम भाई, इतिहास संवारने और सुधारने का समय आ गया है. अभी नहीं तो कभी नहीं. अगली पीढ़ी को क्या मुंह दिखाएंगे. हार्दिक आभार. सादर

samaranand's take said...

Yes, both were noble souls. Thanks to your initiative that we could know them.

प्रेम चंद गुप्ता said...

बहुत ही सार्थक और सशक्त प्रयास। जिस प्रकार से टिप्पड़ियां आईं हैं। उसे देखकर एक नई आशा का संचार होता है।
सार्थक और सकारात्मक परिवर्तन के लिए सभी तैयार है। पहल भी हो गई है। क्रमशः समाजविरोधी अनावृत हो ही जायेंगे।

Unknown said...

सर, सर्वथा उचित.

Sk Agrawal said...

प्रिय मित्र,
बहुत-बहुत बधाई। परम पुज्य padma भूषण, अनंत bibhushit श्री राम bhadracharya जी ने लगभग 1 हज़ार corrections किये हैं
भगवान की महिमा का वर्णन हम जैसे लोग पूरी तरह से नहीं कर सकते
उनके चरित्र के एक अंश को याद करके आपने बहुत अच्छा किया। गलत लोगों की बेतुकी बातों को importance देने की जरूरत नहीं है। आधे अधूरे ज्ञानी so called intelectuals ने धर्म का मर्म न जानकर बहुत हानि की है। आपका प्रयास सराहनीय है। साधुवाद
आपका मित्र:श्रीकृष्ण अग्रवाल, Gwalior

Jayesh J said...

Dear Sir, A very depthful and useful article..... excellent reference guide for intellectuals....��