August 10, 2019

प्रेरक


सफलता की रेसिपी

आज मैं आपको इतिहास की किताब के एक रोचक पन्ने पर लेकर चलता हूँ:
19वीं शताब्दी के अंत मेंया कह लें कि बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में (मतलब वर्ष 1900 के आसपास) सैमुएललैंग्ली बहुत प्रसिद्ध खगोलशास्त्री और भौतिकविद् था। इसके अलावा वह प्रतिष्ठित स्मिथसोनियनइंस्टीट्यूट में सैक्रेटरी तथा हार्वर्डऑब्ज़रवेटरी में एसिस्टेंटप्रोफेसर होने के साथ-साथ सं.रा. अमेरिका की नौसेना अकादमी में गणित भी पढ़ाता था।
इस सबसे यह ज़ाहिर होता है कि लैंगली निश्चित ही बहुत योग्यतासंपन्न बुद्धिमान व्यक्ति था।
वर्ष 1900 के आसपास हमारे इस बुद्धिमान वैज्ञानिक सैमुएललैंग्ली ने कुछ अनूठा करने की सोचीउसने किसी ऐसी वस्तु का आविष्कार करने का विचार किया, जिसमें किसी को भी सफलता न मिली हो। फिलहाल हम उसकी योजना को प्रोजेक्ट-एक्स का नाम दे देते हैं।
पूरा विश्व लैंग्ली की इस महत्वाकांक्षा के बारे में जानकर हैरान था। और उसकी इस योजना में उसका साथ देने वाले लोग भी बड़े वैज्ञानिक और उद्योगपति थे, जैसे एलेक्ज़ेंडरग्राहम बेल और एंड्र्यूकार्नेगी।
यहाँ तक कि सं.रा. अमेरिका के रक्षा मंत्रालय ने भी प्रोजेक्टएक्स के लिए 50,000 डॉलर की सहायता दी। पचास हज़ार डॉलर आज भी बहुत बड़ी रकम है, सोचिए आज से 100 साल से भी पहले यह कितनी बड़ी रकम रही होगी।
न्यूयॉर्कटाइम्स ने प्रोजेक्ट-एक्स की प्रगति पर हर समय निगाह बनाए रखी। सैमुएललैंग्नी का नाम बच्चे-बच्चे की जुबान पर था। सफलता पाने से पहले ही प्रसिद्धि उसके कदम चूम रही थी। उस दौर के सबसे मेधावी लोग इस प्रोजेक्ट से जुड़े हुए थे।
और लगभग इसी समय ओहियो राज्य के डेटोन शहर में दो भाई वीराने में शांति से उनके अपने प्रोजेक्ट-एक्स को सफलतापूर्वक पूरा करने में जुटे थे।
ये दोनों भाई कोई खास शिक्षित नहीं थे। दोनों कभी कॉलेज नहीं गए। वे वैज्ञानिक या गणितज्ञ तो कतई नहीं थे। उनकी एक साइकिल की दुकान थी , जिससे होनेवाली आय वे प्रोजेक्ट पर खर्च करते थे। उनके सम्पर्कों का दायरा बहुत सीमित था। उसके संसाधन बहुत सीमित थे। किसी को पता ही नहीं था कि वे किस काम में लगे हुए थे।
अब आप मुझे बताइए कि किसने प्रोजेक्ट-एक्स को पूरा करने में सफलता पाई?
A-सैमुएललैंग्लीप्रसिद्ध और धनी उच्चशिक्षित वैज्ञानिक व गणितज्ञ, जिसके पास सभी साधन, संसाधन, संपर्क और सहायता सुलभ थी।
या
B-दो भाई जिनके पास वास्तव में कुछ भी नहीं था।
यदि आपका उत्तर ‘A’है तोअफ़सोसग़लत ज़वाब।
और अब मैं आपको जो रोचक जानकारी देने जा रहा हूं वह यह है :
उन दोनों भाइयों को हम राइटब्रदर्स के नाम से जानते हैं। और प्रोजेक्ट-एक्स था पहले वायुयान का निर्माण।
सैमुएललैंग्ली के पास सफल होने के लिए ज़रूरी सारी सामग्री थी, जबकि राइटब्रदर्स के पास थे लगातार असफलता से मिलनेवाले सबक।
फिर भी वे सफल हुए और लैंग्ली असफल हुआ, ऐसा क्यों? इस प्रश्न का उत्तर बहुत महत्त्वपूर्ण है,
सैमुएललैंग्ली इस प्रोजेक्ट में सफल होकर इतिहास में अमर होने की मंशा रखता था। वह प्रसिद्ध तो था ही, लेकिन और भी अधिक प्रसिद्ध, बल्कि अपने दोस्त एलेक्ज़ेंडरग्राहम बेल से भी बड़ा वैज्ञानिक कहलाना चाहता था। इसके दूसरी ओर, राइटब्रदर्स का केवल एक ही मकसद थाः वे उड़नेवाली मशीन बनाकर मनुष्यों को पंख देना चाहते थे। वे मनुष्यता की मदद करना चाहते थे।
लेकिन जब कभी दोनों (लैंग्ली और राइटब्रदर्स) को असफलता का सामना करना पड़ा, तो लैंग्ली ने हार मान ली ;जबकि राइटब्रदर्स ने अपनी राह पर चलते जाना मुनासिब समझा। केवल इतना ही नहीं, राइटब्रदर्स ने मनुष्यता की सहायता करने के अपने शुभ संकल्प के माध्यम से अनगिनत लोगों को प्रेरित किया।
तो, इस सबसे आपने क्या सीखा?


सफल होने के लिए आपको किन्हीं आदर्श परिस्तिथियों की ज़रूरत नहीं होती। आपका उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए, आपमें भरपूर लगन और हौसला होना चाहिए, ताकि आप बार-बार घटने वाली असफलताओं से हार न मानकर अपने कार्य को पूरा करने में जुटे रहें। यही सफलता की रेसिपी है।(हिन्दी ज़ेन)

0 Comments:

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

-0-

लेखकों सेः उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष