April 20, 2016

जल-संरक्षण विशेषांक

      कभी तालाबों की भूमि रहा है छत्तीसगढ़ 

                   - डॉ. रमेंद्र नाथ मिश्र

रायपुर छत्तीसगढ़ शुरू से ही तालाबों की भूमि रहा है। ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से ये महत्वपूर्ण रहे हैं। साथ ही यूरोपीय यात्रियों ब्लंट, बेगलर के अलावा साधु रामचरन दास जिन्होंने भारत भ्रमण पुस्तक लिखी और मुनि कांतिसागर ने इसके भव्यता को वैश्विक तौर पर प्रसिद्धि दिलाई है।
क्यों हैं ये प्रसिद्ध
भारत भ्रमण पुस्तक में इन तालाबों के बारे में बताया गया है कि पुराने समय से अब तक ये तालाब कभी भी सूखे नहीं हैं। 1977 में जब छत्तीसगढ़ में सूखा पढ़ा था तब भी ये तालाबों ने अपना अस्तित्व नहीं खोया था। इसलिए ये तालाब पूरे देश में चर्चित तालाब हैं, शहर में पानी की कमी होने से या कम बारिश होने की स्थिति बनने से इन तालाबों का सहारा लिया जाता है। ये तालाब पूरे छत्तीसगढ़ की खूबसूरती का नजारा पेश करते हैं।
1. प्राचीन काल में रतनपुर रियासत में 1400 तालाब होने के प्रमाण मिलते हैं। जबकि अकेले रायपुर में ही 300 से ज्यादा तालाब होना माना गया है। वर्तमान में 120 तालाब हैं, जिनके होने के पुख्ता सबूत हैं।
2. छत्तीसगढ़ की मौजूदा राजधानी रायपुर चारों ओर से तालाबों से घिरी हुई है। इसमें बूढ़ा तालाब, महाराजबंध, भइया, मलसाय, खोखो, बंधवा, प्रहलदवा, तुर्की, राजकुमार कालेज, महंत, चौबे कॉलोनी, आमापारा का आमा, रामकुंड, आमापारा बाजार के पास हाँडी, रामसागर, रजबंधा, जेल के अंदर, राजा, तेलीबांधा, कटोरा, नरहरेश्वर महादेव के पास के तालाब शहर को समेटे हुए हैं।
3. बाहरी इलाके के अलावा शहर के भीतर भी बहुत से तालाब प्राचीन समय से ही हैं, जिसका इस्तेमाल रहवासी दैनिक क्रियाओं के लिए करते रहे हैं। इसमें कंकाली, डबरीपारा, खदान, बूढ़ा तालाब के बाजू का तालाब जिसमें वर्तमान समय में स्टेडियम बना हुआ है, प्रसिद्ध हैं। कुशालपुर, चंगोराभाठा, रायपुरा, सरोना, टाटीबंध, गुढ़ियारी, कोटा, मठपारा, टिकरापारा में भी प्राचीन और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तालाब हैं।
4. तालाबों का यह शहर पहले हर तरफ से अमरइयाँ (आम के वृहद वृक्ष) से घिरा था। हर तालाब में कमल के फूल लगाए जाते थे। लेकिन समय और आधुनिकता के साथ-साथ इसमें परिवर्तन होता गया। मछली पालन और ठेके पर तालाब देने के चलन ने कमल के फूलों का अस्तित्व ही खत्म कर दिया। अब इन तालाबों में जलकुंभी और काई की बहुतायत है, जिससे यह इस्तेमाल के लायक नहीं रह गए हैं।
5. ऐतिहासिक बूढ़ा और रायपुरा तालाब पुराने किले से लगे हुए थे। खोखो तालाब का निर्माण कल्चुरी काल में राजा रामचंद्र कोका ने करवाया था। प्रसिद्ध इतिहासकार सुरेंद्र नाथ मिश्र के अनुसार संपूर्ण हिंदुस्तान में तालाबों की ऐसी सुदृढ़ व्यवस्था देखने को नहीं मिलती। यहाँ के ताल पचरी (घाट) के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। इसे महिलाओं की सुरक्षा और निजता को बचाए रखने के लिए पत्थरों की दीवारों से सुसज्जित किया गया था।

6. धार्मिक दृष्टि से भी इसके खासे मायने हैं। लगभग हर तालाब किसी न किसी धार्मिक स्थल को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था। दूधाधारी मंदिर के सामने महाराज बंध, बूढ़ेश्वर नाथ से लगा बूढ़ातालाब, कंकाली मंदिर के सामने कुंडनुमा तालाब जिसे वर्तमान में कंकाली तालाब कहते हैं। रामसागर तालाब का निर्माण बस्तर भूषण पंडित केदारनाथ ठाकुर ने माता-पिता की याद में करवाया था। इसी तरह दीनानाथ साव ने तेलीबांधा तालाब को स्वरूप दिया।

0 Comments:

लेखकों से... उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक लेखों के साथ पर्यावरण, पर्यटन, लोक संस्कृति, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, व्यंग्य, लघुकथाएँ, कविता, गीत, ग़ज़ल, यात्रा, संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। आपकी मौलिक, अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। रचनाएँ कृपया Email-udanti.com@gmail.com पर प्रेषित करें।
माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। माटी संस्था कई वर्षों से बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से उक्त गुरूकुल के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (U.K.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर, रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी, रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से स्कूल जाने में असमर्थ बच्चे शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होंगे ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेंगे। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ.ग.) मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष