January 20, 2016

बचपन की यादों में देशप्रेम का जज़्बा

    बचपन की यादों में देशप्रेम का जज़्बा

- डॉ. रत्ना वर्मा

यादों के झरोखों से यदि बचपन में झाँक कर देखने की कोशिश करूँ और उसमें भी अपने पढ़ाई के दिनों की तो देश प्रेम का ज़ज़्बा हमारे लिए गर्व और मस्तक ऊँचा उठाकर चलने वाली भावना से जुड़ा होता था। चाहे समय 26 जनवरी का हो या 15 अगस्त का तथा इन अवसरों पर रंगमंच पर प्रस्तुत किए जाने वाले नृत्यनाटक या फिर गीत का हो।
   तब सुबह की प्रभात फेरी में शामिल होना आवश्यक होता थाया यह कहना अधिक उचित होगा कि छुट्टी मनाने जैसी बात तब मन में आती ही नहीं थी और उसकी तैयारी तो पूछि मत- सफेद यूनिफॉर्म के साथ पॉलिश किए हुए सफेद मोज़े और जूते। चार दिन पहले से ही इसकी तैयारी शुरू हो जाती थी। कपड़ों के जूतों में सफेद पॉलिश के लिए तब चॉक जैसा बारकेक लाया जाता थाजिसे पानी में भीगोकर जूतों को चमकाया जाता था। हमारे पीटी शूज़ एकदम नए की तरह चमक जाते थे। दोस्तों और भाई- बहनों के बीच होड़ लगी होती थी कि मेरी यूनिफॉर्म और मेरा जूते तुम्हारे जूते से ज्यादा सफेद है। पर वह सब किसी विज्ञापन की तर्ज पर मात्र सफेदी की चमकार नहीं होती थीवह सब हम बच्चों की आपसी नोकझोंक के साथ देश के प्रति आदर का भाव भी होती थी।
   इस तरह सवेरे- सवेरे तिरंगा झंडा हाथों में लेकर जब- झंडा ऊँचा रहे हमारा.... गाते हुए कदम- ताल मिलाते हुए चलते थे तो भीतर से कहीं देशप्रेम का ज़ज़्बा हिलोरे लेते था।  प्रभात फेरी में बच्चों की आन- बान- शान देखते ही बनती थी।  कड़क कपड़ों और चमकते सफेद जूतों की आभा ओज़ बनकर सबके चेहरे पर भी चमकती थी।  जनवरी में तब कड़ाके की ठंड और अगस्त में बारिश का मौसम होता थापर बच्चों के उत्साह को न ठंड रोक पाती थी न बारिश। ( अब तो कब कौन -सा मौसम होता हैपता ही नहीं चलताहमने अपने पर्यावरण को भी तहस-नहस जो कर दिया है) देशभक्ति के गीतों के साथ पूरे शहर का चक्कर लगाते हुए यदि अपने घर के सामने से जूलूस निकलता था तो नज़रें स्वत: ही उधर घूम जाती थीं कि माता- पिता के साथ आस- पास के कितने लोग हमें अपने देश के लिए नारा लगाते देख रहे हैं।
   दिन भर रेडियो में देश भक्ति केगीतों की गूँज सुनाई पड़ती थी।  जहाँ डाल- डाल पर सोने की चिडिय़ा करती है बसेरा...ऐ मेरे वतन के लोगों.....ऐ मेरे प्यारे वतन....ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम..... जैसे ओज से भरे गीत सुनकर ही यह अहसास हो जाता था कि गुलामी के बाद की आजादी कितनी सुकून- भरी और आनंददायी होती है।
   देश प्रेम का ज़ज़्बा संभवत: इसी तरह बचपन से पने आप ही पैदा होता चला जाता था। न कुछ कहने की ज़रूरतन कुछ करने की। जीवन की चाल ही इस तरह चलो कि देश प्रेम अपने आप ही पैदा हो। आजादी के लिए अपने आपको कुर्बान कर देने वाले वीरों की कथाएँ तो पढ़ाए ही जाते थे।
   वीरों की कथाओं से मुझे याद आया मेरे बाबूजी जिन्होंने स्वयं आजादी की लड़ाई में भाग लिया था और नागपुर में वकालत की पढ़ाई करते समय भूमिगत रहने के कारण एक साल परीक्षा नहीं दे पाए। वे हमारे लिए आजादी के मतवालों की कथाओं वाली छोटी-छोटी पॉकेट बुक लाया करते थे-  जिसमें झाँसी की रानीभगतसिंहबिस्मिलचंद्रशेखर आजादराजगुरूसुखदेवमहात्मा गाँधीसरोजिनी नायडूनेहरूसरदार पटेल आदि न जाने कितनी महान विभूतियों की कहानियों के साथ नंदनपराग और मोटू- पतलू जैसी कॉमिक्स की किताबें साथ होती थीं, जिन्हें पढ़ते हुए हम बड़े हुए। पढऩे और लिखने की आदत बचपन में पढ़ी गई इन किताबों का ही नतीजा है। 
   समाज के प्रति एक जिम्मेदार नागरिक बनाने में तब अभिभावक के साथ शिक्षा और शिक्षक की जो भूमिका होती थी, वह आज की व्यावसायिक शिक्षा- व्यवस्था में कहीं गुम हो गई है। अब तो बच्चों को पूछो आजादी का दिन है स्कूल में कोई कार्यक्रम नहीं हैतो वे कहते हैं कल हो गया नआज तो छुट्टी है। यानी आजादी भी एक दिन पहले ही मना ली जाती है।
   कहने का तात्पर्य यही कि  बीज तो तभी बो दिया जाता है, चाहे वह देश के प्रति जिम्मेदारी का हो चाहे अभिव्यक्ति की आजादी का। इसके लिए अलग से किसी किताब की अलग से विचार या अलग से कोई प्रयास करने की जरूरत नहीं पड़ती।
   देश की सुरक्षा के लिए सियाचिन ग्लेशियर में तैनात हनुमनथप्पा जैसे जवान की जब मौत होती हैतब आँखें सबकी नम हो जाती हैं और हाथ सैल्यूट के लिए उठ जाते हैं। फिर आज ऐसा क्या हो गया कि देश के प्रति भक्ति को लेकर सवाल उठने लगेचूक कहाँ हो रही है कौन लोग हैं जो देश को कमजोर करने में लगे हैं?  बलिदानियों के लिए कुछ की आँख में न एक क़तरा आँसू हैन शर्म है। क्या आँख का पानी भी मर गया है ? देश को क्षति पहुँचाने वालोंशर्मनाक बयानबाजी करने वालों और भारत के संविधान तक को चुनौती देने वालों के समर्थन में ये कौन लोग खड़े हो रहे हैंक्या ये बुद्धिजीवी हैं या वे हैं जिनकी बुद्धि का दिवाला ही निकल गया हैआज इस ज्वलन्त प्रश्न पर विचार करना ज़रूरी है कि हम बड़े हैं या देश बड़ा है।

Labels: ,

1 Comments:

At 05 March , Blogger सुनीता अग्रवाल "नेह" said...

bilkul mere man ki baat likhi apne ...

 

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home