April 08, 2015

पर्यावरण विशेष


गर्म होती धरती और कम होती फसल
तपती धरती के चलते बढ़ता समुद्र स्तर, पिघलते ग्लेशियर, अंटार्टिक का पिघलता बर्फ वगैरह तो

प्राय: समाचारों में छाए रहते हैं। मगर धरती के गर्म होने का फसल उत्पादन पर सीधा क्या असर होगा इसे लेकर अध्ययन अभी शुरू ही हुए हैं। ये अध्ययन बहुत आशाजनक तस्वीर नहीं बताते। उदाहरण के लिए, कोलंबिया विश्वविद्यालय के वोल्फ्राम श्लेंकर और नॉर्थ कैरोलिना राज्य विश्वविद्यालय के माइकल रॉबट्र्स ने हाल ही में 1950 से 2005 तक के मौसम पैटर्न और यूएस की तीन प्रमुख फसलों- मक्का, कपास और सोयाबीन- की उपज के परस्पर सम्बंधों का अध्ययन किया है। वे बताते हैं कि किसी वर्ष में फसल की उपज कितनी रहेगी इसका सबसे स्पष्ट सम्बंध इस बात से नजऱ आता है कि उस वर्ष कितनी बार तापमान 29 डिग्री सेल्सियस से ऊपर गया था और ऐसा ऊंचा तापमान कितने दिनों तक रहा था। तापमान 29 डिग्री सेल्सियस से कम रहे तो जितना गर्म हो उपज उतनी अच्छी होती है। मगर 29 डिग्री से ऊपर यही गर्मी नुकसानदायक साबित होती है। श्लेंकर और रॉबट्र्स ने इस बात का विश्लेषण करने के लिए डिग्री-दिन आंकड़े का उपयोग किया है। इसका मतलब होता है कि तापमान 29 डिग्री से कितना ऊपर गया और कितने समय तक ऊपर रहा। उन्होंने देखा कि फिलहाल यूएस में फसलों को ऐसे कुल 53 डिग्री-दिनों का सामना करना पड़ता है जब तापमान 29 डिग्री से ऊपर रहता है। यदि सब कुछ आज की तरह चलता रहा और वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड वृद्धि को रोकने के कोई उपाय न किए गए तो इस अध्ययन के मुताबिक इस सदी के अंत तक मक्का की उपज में 80 प्रतिशत तक की कमी आएगी। यदि कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन को घटाकर 1991 के स्तर से आधे पर लाया गया, जो लक्षित है, तो भी उपज में 30-46 प्रतिशत की कमी आने की आशंका है। भारत के लिए ऐसे अध्ययन नहीं हुए हैं। मगर गौरतलब बात यह है कि फिलहाल यूएस दुनिया का सबसे बड़ा मक्का व सोयाबीन उत्पादक व निर्यातक है। लिहाज़ा यदि यूएस में इनकी उपज कम होती है तो असर वहीं तक सीमित नहीं रहेगा।

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लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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