December 14, 2013

आपके पत्र/ मेल बॉक्स

मौलिकता का अहसास

उदंती के वेब संस्करण के माध्यम से पिछले कुछ अंकों पर नज़र डालने का मौका मिला। प्रकाशन सामग्री व गेटअप, मुद्रण आदि सभी दृष्टिकोणों से पत्रिका ने प्रभावित किया। अनकही, लोकपर्व, कलाकार, परम्परा, प्रेरक, पूजापर्व जैसे स्तंभों के अंतर्गत प्रकाशित रचनाएँ मौलिकता का अहसास कराती हैं। सभी अंकों पर संपादक की पकड़ और मेहनत साफ झलकती है। पत्रिका के उज्ज्वल भविष्य के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
 - किशोर श्रीवास्तव, नई दिल्ली , kishorsemilen@gmail.com

बसंत साहू की कला को नमन

उदंती के अक्टूबर नवम्बर अंक में प्रकाशित बसंत साहू के सभी चित्र बहुत ही सुंदर हैं!  इस अनूठे कलाकार के साहस तथा उनकी लगन को नमन! उनके साथ हुए हादसे के बारे में पढ़कर जितना दु:ख हुआ उतनी ही प्रसन्नता उनके द्वारा बनाए गये चित्रों को देखकर हुई! दुख व कठिनाइयों- भरे दुर्गम रास्ते में आगे क़दम बढ़ाकर अपनी मंजि़ल तक पहुँचने का नाम ही असली मायनों में 'जीनाकहलाता है... इसका जीता-जागता प्रमाण बसंत साहू हैं! उनका परिचय कराने व उनके बनाए चित्रों को साझा करने का आभार! 
इसी अंक में विजयादशमी पर कृष्ण कुमार यादव का लेख 'जहाँ होती रावण की पूजामें इतनी उपयोगी तथा रोचक जानकारी देने के लिए धन्यवाद। हिमांशु जी की सभी कविताएँ बहुत ही सुंदर संदेश लिये हुए दिल में उतर गईं! काश! ऐसा हर कोई सोच ले तो किसी की देहरी पर, किसी के दिल में कभी अँधेरे टिक न पाएँगे! हर दिल में बस उजियारा ही उजियारा होगा!

पूरा जीवन दर्शन

दीपावली पर हिमांशुजी की चार कविताएँ जिसमें-
उम्र भर रहते नहीं हैं, संग में सबके उजाले।
दूर उजालों की बस्ती है, पथ में भी अंधियार बहुत है।
अँधियारे से आगे देखो सूरज है उजियार बहुत है।
नहीं गगन छू पाए तो क्या मन का ही विस्तार बहुत है।
आदमी है आदमी तब, जब अंधेरों से लड़े।
सब एक से बढ़कर एक। ये भाव, ये पंक्तियाँ अपने में पूरा जीवन दर्शन समाए हुए हैं। बस जरुरत है तो इसे समझ कर इसको अमल में लाने की....
                                                                         -मंजु मिश्रा

अलग तरह की पत्रिका

पत्रिका प्राप्त हुई बहुत ही अच्छी है। हमारे छत्तीसगढ़ के त्योहार के विषय में आपने बहुत अच्छी जानकारी दी है। यह अपने आप में अलग तरह की पत्रिका हैं। आपने मेरे भावों को बहुत ही सुंदर ढंग से अपने लोगो तक पहुँचाया है। इसके लिए धन्यवाद एवं शुभकामनाएँ । आप इसी तरह अपने लेखन कार्य को आगे बढ़ाते रहें ताकि समाज को सही दिशा मिले।

                     -बसंत साहू, basantartist@gmail.com

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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