February 21, 2013

नजरिया



नये पुराने का फेर
पत्थर हों या मनुष्य, सृष्टि में हर वस्तु या जीव का अस्तित्व कुछ समय के लिए ही होता है। यदि दशकों या युगों-युगों का जीवनकाल हमें क्षणभंगुर नहीं भी लगे तो भी अरबों वर्ष से मौजूद ब्रह्माण्ड के सामने तो यह क्षणभंगुर ही कहलायेगा.
प्रकृति हमें बूढ़ा कर देती है। सभी प्राणी जन्म लेने की कीमत अपनी मृत्यु से चुकाते हैं। पूरे जीवनकाल में हम जो कुछ भी संचय करते हैं वह भी चिरस्थाई नहीं होता। बच्चों के खिलौने टूटते हैं, शादी के जोड़े भी कभी तार-तार हो जाते हैं, राजप्रासादों की अट्टालिकाएँ भग्नावशेष में बदल जाती हैं। फिर भी मानव-मन बूढ़े होते संबंधों और पुरानी पड़ती वस्तुओं से ऊबता रहता है और सदैव नवीनता की आकाँक्षा करता है।
हम अब अपने घरों में उपस्थित साजोसामान को पुराना नहीं होने देते। दो-तीन दशक पहले तक तो हम चीज़ों को बेहद टिकाऊ जानकर लंबे अरसे तक काम में लाते थे। उन दिनों चीज़ें निस्संदेह बहुत टिकाऊ बनती थीं। उनमें कोई खराबी आ जाने पर हम तत्परता से उन्हें ठीक कराते थे। फिर ऐसा दौर आया जब चीजों में durability का स्थान changeability ने ले लिया।
अब किसी चीज़ में मामूली खराबी या खोट निकल आने पर हमारी प्रतिक्रिया यह होती है।
ठीक कराने की क्या ज़रुरत है? नया ले लो!
इतने में तो नया आ जाएगा!
इसमें दाग लग गया है। ये शर्ट बेकार हो गयी है!
मैं इससे बोर हो गया हूँ! चलो नया ले लें!
इसमें कुछ ख़ास फीचर नहीं हैं।
इसे किसी को दे देंगे। हम नया ले लेते हैं।
जो भी लोग नया खरीद रहे हैं वे बेवकूफ हैं क्या?
कितने भी पैसे जोड़ लो, साथ कुछ नहीं जाता।
तो... आप अपनी चीज़ों को कितना पुराना होने देते हैं?
मेरे कुछ मित्र तो लगभग हर महीने नए वस्त्र खरीदते हैं। ऐसा नहीं हैं कि उनकी क्रयशक्ति बहुत है या मेरे पास रुपयों की तंगी है पर हर छ: महीने में वे मोबाइल बदल लेते हैं। एक गाड़ी दो-तीन साल से ज्यादा नहीं चलाते। क्यों? क्या वे जो चीज़ें खरीदते हैं वे मेरी चीज़ों की तुलना में जल्दी पुरानी पड़ जाती हैं? तकनीकी सामान (मोबाइल/कम्प्युटर) को छोड़ दें तो कपड़े-जूते, यहाँ तक कि वाहन आदि जैसी वस्तुएँ इतनी जल्दी चलन(?) से बाहर नहीं होतीं और न ही उनमें कोई गंभीर खराबी आती है।
असल बात तो यह है कि नितनई वस्तुओं का उपभोग करना आजकल एक व्यसन में बदल गया है। अब हमसे बारम्बार यह अपेक्षा की जाती है कि हम विभिन्न अवसरों पर हमेशा ही अपनी दो-जोड़ी शर्ट-पैंट में नज़र नहीं आयें अन्यथा लोग हमारे बारे में अवाँछित धारणाएँ बना लेंगे। यही कारण है कि अब लोग हर अवसर पर अलग-अलग  वस्त्र पहनकर जाते हैं। वे नहीं चाहते कि कोई उन्हें यह याद दिलाये कि 'पिछली बार भी आप यही पहनकर आये थे न। मुझे आपने चार साल पुराने मोबाइल के कारण आये दिन लोग टोकते रहते हैं। बाहर वालों से तो मैं निपट लूँ पर श्रीमती जी का क्या करूँ? मेरे प्रति उनकी चिंता जायज़ है।
फिर भी मेरा दिल है कि पुरानी चीज़ों को अपने से दूर करना नहीं चाहता। पुरानी चीज़ों से मेरा मतलब है बेहद टिकाऊ और काम में आ रही चीज़ें। बहुत से लोग आमतौर पर घर में अनेक कारणों से बाबा आदम के ज़माने की वस्तुएँ भरके रखते हैं जिसे मैं जंजाल (clutter) मानता हूँ। हमारा परिवेश जंजाल मुक्त होना चाहिए। यह कोई वैज्ञानिक तथ्य भले न हो पर मेरा मानना है कि अव्यवस्था और जंजाल में रहने से हमारी सकारात्मक ऊर्जा और कार्यक्षमता घटती है। हमारी जितनी ज़रूरतें हों उससे कुछ अधिक मात्रा में वस्तुओं की उपलब्धता ठीक है पर एक सीमा से अधिक उनकी खरीद और उपयोगिता पर निर्भरता को मैं सही नहीं मानता। पुराने पड़ते साजो-सामान और संबंधों के प्रति मेरा दृष्टिकोण यह है कि-
कम्प्यूटर पुराना हो जाने पर खुलने में समय लेता है, मुझे इससे कोई दिक्कत नहीं है।, पुरानी बाइक और कार कुछ ज्यादा देखभाल माँगती है जो कि उसका हक है।, कुर्सियों और मेजों पर पड़ी खरोंचें बचपन की शरारतों की याद दिलातीं हैं।,पूजा के आले में पुरानी मूर्तियाँ और चित्र प्राण-प्रतिष्ठित से जान पड़ते हैं। ,नए व्यक्तियों से मिलते रहने पर भी पुराने दोस्त जि़ंदगी से बाहर नहीं चले जाते।
यह तो सच है कि कभी-कभी कोई चीज़ इतनी बिगड़ जाती है कि उसे ठीक नहीं कराया जा सकता। ऐसे में उसे त्याग कर नया लेने में समझदारी है। हमें यह समझना चाहिए कि हम पुरानी पड़ती वस्तुओं के प्रति आपने मन में गहराते व्यर्थ के असंतोष को बढ़ाते आये हैं। हम जिस उपभोगितावादी काल में रह रहे हैं उसमें हमें हर समय यह याद दिलाया जाता है कि अपनी अंटी ढीली करने से ही सुख की प्राप्ति होती है। टीवी और अन्य प्रचार माध्यम हमपर विज्ञापनों की बौछार करके आवश्यकता सृजित करते हैं और इससे बहुत से लोगों में हीन भावना उदित होती है।
आपका क्या कहना है? (हिन्दी नेस्ट से)

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लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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