February 21, 2013

कालजयी कहानियाँ



 ममता
- अक्षय कुमार जैन
छोटे से गाँव में हम सब रहते हैं। यद्यपि भाई-बहिनों की शिक्षा का उपयुक्त प्रबन्ध कुछ भी नहीं हो सकता, पर असन्तुष्ट कोई भी नहीं है। बहिनों को पत्र-पत्रिकाओं, सुई चलाने से अवकाश नहीं मिलता और अनुज़ सतीश को, या सत्तो कहना ठीक होगा, पशु-पक्षियों की मित्रता से छुट्टी नहीं मिलती। ब्रह्म मुहूर्त में जगे, बिना शौच गए सुखिया गाय, मोती कुत्ता, लहिया चिडिय़ा और न जाने कितने मेंढक आदि जीवों से, जिनका अपना-अपना एक-एक नाम है, सुबह का सलाम कर दिया जाता है। इन सब के निर्दिष्ट स्थान भी हैं। सुखिया नौहरे में, मोती कोठार में और लहिया ऊपर छत पर प्रात: काल से मानो सत्तो की प्रतीक्षा में बैठे रहते हैं।
लहिया मामूली-सी चिडिय़ा है, साधारण रूप में उसमें कोई आकर्षण नहीं। दो वर्ष पहले उसने न जाने किस भौगोलिक अथवा प्राकृतिक दृष्टि से हमारी छत के टूटे हुए छप्पर में अपना घर बनाना ठीक समझा। तब से कई बार वह बच्चे दे चुकी है। बच्चे अवश्य उड़ जाते हैं पर वह यहीं की यहीं बनी है। दो वर्ष का समय सत्तो के लिए कम नहीं है। अब लहिया की और उसकी का$फी घनिष्ठता हो गई है। आरम्भ उसका मुझे ज्ञात है। पहले-पहल उसी टूटे छप्पर पर सत्तो अनाज के दाने बिखेर देता था। अब इतनी उन्नति हो चुकी है कि सुबह-शाम सत्तो दाने हाथ पर रख कर उसे पुचकारता है, बुला लेता है और न जाने कितने उलाहनों के साथ वह चिडिय़ा अपने मेज़बान के हाथ के दाने चट कर जाती है। छोटे बच्चे होने पर वही क्रिया दिन भर में चार-छह बार की जाती है। तब लहिया दाने स्वयं नहीं खाती। चोंच में भर कर बच्चों की छोटी-छोटी चोंचों में न्यायपूर्वक बाँट देती है। और चीं-चीं करते वे बच्चे किसी सीमा तक सत्तो के आगमन की प्रतीक्षा में रहते हैं। यद्यपि मुझे सत्तो के इन कामों में न दिलचस्पी है, न कुछ आनन्द ही आता है, पर जब कोई कृत्य हमारे सम्मुख प्रतिदिन हो, और वह भी कई बार तो देखना ही पड़ता है। देखना भर, उससे परे कुछ नहीं। बात भी इन्हीं दोनों की है, लहिया और सत्तो की।
अभी शायद परसों की बात है, बादल सुबह से ही घिर रहे थे। संध्या को मैं लहिया के निवास-स्थान से कुछ दूर चारपाई पर बैठा एक पुस्तक पढ़ रहा था। देखा इस बार लहिया के बच्चे बड़े हृष्ट-पुष्ट और चालाक हैं। अभी शायद उनकी आँखें भी ठीक तरह से नहीं खुली हों। लहिया को उनकी रक्षा में अपने पंख उन पर रखने पड़ते हैं। पर फिर भी वे कुलबुल करते रहते हैं। कभी इधर हो जाते हैं, कभी उधर और उससे बेचारी लहिया का बैलेंस ठीक नहीं रह पाता, उसे रह-रह कर अपने को सम्भालना पड़ता है। मैं सोच रहा था कि यह चिडिय़ा नाहक तंग होती है। जब बच्चे कुलबुल करते हैं तो क्यों उड़ नहीं जाती। भुगतने दे शरारत का मज़ा। कुछ इसे इन बच्चों से आशा नहीं कि वृद्धावस्था में सेवा करेंगे।
पुस्तक मैंने बन्द कर दी और इसी ओर मनुष्य के स्वार्थ का दृष्टिकोण सम्मुख रखते हुए बड़ी देर तक मैं सोचता चला गया। मुझे ढूँढे कोई कारण न मिला कि क्यों वह नादान चिडिय़ा माँ बनती है और फिर क्यों अपने को अकारण मुसीबत में फँसाती है। अभी अण्डों को सेआ, अभी बच्चे निकाले, उनकी रक्षा की, पानी-धूप से उन्हें बचाया, दाना-पानी दिया, चाहे स्वयं भूखी रही। और फिर मनुष्य की तरह वृद्धावस्था में सेवा की भी आशा भी तो नहीं, जो इतना कष्ट सहा जावे। कुछ वृष्टि हो निकली और मैं, क्योंकि लहिया के विषय में जानकारी कर रहा था, पास के छप्पर में बैठ गया जहाँ से देख सकूँ कि लहिया किस प्रकार उन शरारती बच्चों की रक्षा करती है।
वर्षा इतने वेग से हुई कि सर्दी के कारण माँ ने मुझे नीचे बुला भेजा। बड़े कोठे में बैठे माँ, पिताजी और सब सत्तो से लहिया के गुण सुन रहे थे। मैं भी चुपचाप श्रोताओं में मिल गया। लहिया की समस्या मेरे मस्तिष्क में पूर्ण रूप से घूम रही थी। इधर लहिया का चरित्र-चित्रण हो रहा था, मैं भी ध्यान लगा कर सुनने लगा। सत्तो ने कई घटनाएँ सुनाईं। पर एक घटना बड़ी विचित्र थी। उसी दिन सुबह एक कौवे ने बच्चों को या तो खाद्य-पदार्थ समझा अथवा न जाने क्यों किस भावना से लहिया के घर पर धावा बोल दिया। लहिया ठीक समय पर पहुँची और बड़ी वीरता से तथा चातुर्य से उसने उस दीर्घकाय (लहिया के लिए) कौवे को भगा दिया। और दूसरी ओर उन शैतान बच्चों को सम्भालती भी गई। मुझे फिर लगा- चिडिय़ा ज़रा-सी माँ बन गई तो कौवे से लड़ पड़ी और अगर कौवा मार देता तो? बच्चे तो वह अंडे रखकर फिर पा सकती थी।
पानी रात भर न रुका। मैं सोचते-सोचते सो गया। क्या लहिया उस प्रलयकारी वृष्टि में भी उन शरारती बच्चों पर बैठी भीगती रहेगी और रक्षा के भार को पूर्णतया पूरा करेगी? सत्तो उस रात को इतना भीगा कि उसे कुछ सर्दी-सी हो गई। मुझे तो प्रात:काल पता चला कि माता जी के सिर में दर्द है, वह रात भर न सो सकीं। सोतीं कैसे? वे माँ हैं और एक माँ अपने छोटे बच्चे के लिए सब कुछ बलिदान कर सकती है। वह स्वयं कष्ट सह सकती है पर बच्चे के पसीने के स्थान पर रक्त बहा देगी क्योंकि माँ का यह जन्मसिद्ध अधिकार है। दुर्भाग्य से अथवा सौभाग्य से वह भी माँ हैं और इसीलिए रात भर नहीं सोईं। यहाँ तक तो ग्राह्य है कि माँ अपने बच्चे को सर्दी लग जाने के कारण सो न सकी और वह भी मनुष्य जाति की। पर भगिनी विमला ने मुझे दाँत साफ़ करते समय सूचना दी- 'सत्तो बड़ा रो रहा है, आप चल कर मना लीजिए।
मैंने कुल्ली करके पूछा-- 'क्यों क्या टैम्प्रेचर ज़्यादा हो गया?’
'नहीं, बुखार तो अब नहीं है। पर रात की वर्षा में उसकी लहिया मर गई।
मैं सन्न रह गया। वाह रे माँ की ममता! जान भी दे दी। मैं सत्तो के पास पहले न जा कर ऊपर पहुँचा। देखा, दोनों बच्चे अब भी कुलबुल कर रहे थे। शायद भूखे थे और लहिया का निर्जीव शरीर नीचे पड़ा था।
मैंने कहा- यह सब क्या? माँ की ममता और बलिदान। निस्सन्देह वह रात भर अपने पंख फैला कर अपने बच्चों की रक्षा करती रही होगी।
रचनाकाल: 05 जुलाई 1937

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