Wednesday, December 28, 2011

देसी और विदेशी संस्कृति का संगम

1965 में सप्रू हाउस बनने के बाद तो जैसे दिल्ली की सांस्कृतिक काया पलट हो गयी। आधुनिक तकनीक और यंत्रों से लैस इस हॉल में संगीत समारोह होने लगे और विदेशी फिल्मों के शो भी शुरू हो गए। दिल्ली के मंडी हाउस को कला का अड्डा बनाने में सप्रू हाउस का बड़ा योगदान है।
सांस्कृतिक गलियारों से उभरती दिल्ली
आजादी से पहले भी दिल्ली में संगीत, मुशायरों और दूसरे सांस्कृतिक कार्यक्रमों की महफिलें जमती थी पर उनमे खास बात ये थी कि पुरानी दिल्ली में देसी कार्यक्रम होते थे तो नई दिल्ली में पश्चिमी संगीत और नृत्य का बोलबाला था।
पुरानी दिल्ली में संगीत कुछ ही लोगों या समुदाय तक सीमित था। यहां तक की महिलाओं की भागीदारी तो बिलकुल ना के बराबर थी। किसी हद तक तो उसे ठीक नजर से देखा भी नहीं जाता था इसीलिए अजमेरी गेट के करीब बदनाम जी बी रोड के कोठों से गूंजती गजल या ठुमरी की आवाज को ही संगीत की संज्ञा दी जाती थी। जो भारतीय संगीत होता भी था उसके आयोजन के लिए कोई बड़ा हॉल भी नहीं था। उस समय इन संगीत सम्मेलनों को संगीत की कांफ्रेंस कहा जाता था और यह अक्सर कुतुबमीनार या फिरोज शाह कोटला में बड़े घास के मैदानों में होती थी या फिर उन रईस लोगों के घर में जिन्हें संगीत से लगाव था।
दिल्ली की मशहूर सरोद वादक स्वर्गीय शरण रानी बेक्लिवाल के पति एस एस बेक्लिवाल के अनुसार 'उस समय सब तरफ पश्चिमी नाच और संगीत का बोलबाला था। संगीत और कला को ठीक नजर से नहीं देखा जाता था।' 77 साल के फादर जॉन कैल्ब के अनुसार 'लड़की तो लड़की, पुरुषों का संगीत सीखना भी अच्छा नहीं माना जाता था। मुझे याद है मैं तबला सीखने पहाडग़ंज जाता था हालांकि मैं पंडित हुस्न लाल भगत राम जी के पास जाता था जिन्होंने लता मंगेशकर को भी तालीम दी लेकिन लोग समझते थे कि मैं कोठे पर बजाने जा रहा हूँ।'
जहां तक नई दिल्ली की सवाल है तो कनॉट प्लेस के होटलों में या क्रिसमस जैसे त्योहारों पर डांस होता और बाकी दिनों में पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम होते थे। रीगल सिनेमा हॉल उस समय सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अड्डा माना जाता था। वहां अक्सर शेक्सपीयर के नाटक होते थे और जवान लोग एक पारसी महिला दीना रोड़ा से बॉल रूम डांस सीखने आते थे।
रीगल सिनेमा हॉल
कनॉट प्लेस में आए दिन शॉपिंग करने वाले शायद ही जानते हों की किसी समय यह इलाका दिल्ली का सांस्कृतिक अड्डा भी होता था। हिन्दुस्तानी स्कूल ऑफ म्यूजिक एंड डांसिंग की स्थापना 1936 में कनॉट प्लेस में हुई थी। संगीत नाटक अकादमी भी इसी सिनेमा हॉल से चालू हुआ था, और आज के दिनों का मशहूर गंधर्व महाविद्यालय भी कनॉट प्लेस के सी ब्लाक से शुरू हुआ था। मंडी हाउस का त्रिवेणी कला संगम भी 1951 में कनॉट प्लेस के एक कॉफी हाउस में शुरू हुआ था। गंधर्व महाविद्यालय आज दीन दयाल उपाध्याय मार्ग पर एक शानदार इमारत में चल रहा है और उसके संस्थापक पंडित विनय चन्द्र मृदुल के पुत्र और जाने माने गायक विपुल मृदुल उसके प्रिंसिपल हैं।
दिल्ली को पंडित नेहरु की देन
सही मायने में दिल्ली की सांस्कृतिक तस्वीर 1947 में ब्रिटिश राज के बाद ही बदली। इसका काफी श्रेय जाता है तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु को। पंडित नेहरु ने संगीत और कला को काफी प्रोत्साहन दिया और एक के बाद एक बड़े हॉल दिल्ली में बने जहाँ कार्यक्रम होने लगे। 1952 में संगीत नाटक अकादमी, दो साल बाद साहित्य अकादमी और ललित कला अकादमी और 1959 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा दिल्ली को पंडित नेहरु की ही देन कहना होगा। इनके बाद शहर में 1961 में रवींद्र भवन का निर्माण हुआ। मौजूदा दौर में बदलावों की गवाह दिल्ली 1965 में सप्रू हाउस बनने के बाद तो जैसे दिल्ली की सांस्कृतिक काया पलट हो गयी। आधुनिक तकनीक और यंत्रों से लैस इस हॉल में संगीत समारोह होने लगे और विदेशी फिल्मों के शो भी शुरू हो गए। दरअसल दिल्ली के मंडी हाउस को कला का अड्डा बनाने में सप्रू हाउस का बड़ा योगदान है। वहां आने वाले कलाकारों की वजह से ही वहां पर नेशनल स्कूलऑफ ड्रामा, संगीत नाटक अकादमी और कमानी हाल का निर्माण हुआ। और तब दिल्ली में दौर शुरू हुआ भारतीय संगीत और कला का। यहां तक की 1960 में दिल्ली में मशहूर संगीत वाद्य यंत्रों की दुकान, गोदीन ने मजबूर होकर सितार और तबले आदि बेचना शुरू किया। उससे पहले इस दुकान पर सिर्फ पियानो ही बिकता था। दिल्ली ने बॉलीवुड को भी कई बड़े सितारे दिए जिनमें शाहरुख खान का नाम प्रमुख है। उनका एक्टिंग करियर मंडी हाउस से ही शुरू हुआ था। इसके इलावा नीना गुप्ता, अनंग देसाई, राम गोपाल बजाज ने भी मंडी हाउस की चाय की दुकानों से अपना कला जीवन आरम्भ किया। मशहूर पेंटर मकबूल फिजा हुसैन ने भी अपना काफी समय बंगाली मार्केट की दुकानों और ढाबों में बिताया।
दिल्ली की सांस्कृतिक धरोहर
आज जब नई दिल्ली की स्थापना के सौ वर्ष हो गए हैं तो उन कलाकारों को नहीं भुलाया जा सकता जिन्होंने दिल्ली शहर को देश विदेश में मान दिलाया। इनमें सरोद वादक शरण रानी, तबला वादक फय्याज खा और शफात खान, सारंगी नवाज सबरी खान, बिरजू महाराज, कत्थक नृत्यांगना उमा शर्मा, ओडिसी नृत्यांगना माधवी मृदुल के नाम शामिल हैं। वैसे कुछ ऐसे कलाकार भी हैं जो आए तो बाहर से थे लेकिन बसे दिल्ली में और उसे सम्मान भी दिया। इनमें पंडित रवि शंकर, उस्ताद अमजद अली खान शामिल हैं। संगीत और नृत्य के इलावा जाने माने लेखक खुशवंत सिंह भी दिल्ली की महान धरोहर का हिस्सा हैं। (नौरिस प्रीतम- डायचे वेले से)

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