August 25, 2011

मैं सुन रहा हूँ

- यशवन्त कोठारी

यह स्वच्छ साफ धूप
गुनगुनाती हवा
चमकदार पहाड़
प्रकाश और ज्योति की घड़ी
मैं इस विशाल देश का
महत्तम संगीत- नाद सुन रहा हूँ।
मैं सुन रहा हूँ, प्रताप की हुँकार
शिवाजी की तेज आवाजें
चढ़ रहे नेत्र हिमालय के
और भीगे कदमों की आहट जो
सुबह को चीर कर आगे बढ़ रही है।
मैं गंगा नदी का अविराम
सितार वादन भी सुन रहा हूँ
उसी में शामिल है यमुना और
सरस्वती की जुगलबंदी
तेल की तरह गाढ़ा तरल
किनारे के कीचड़ को
निगलने को आतुर
नदी की विशाल बाहें
मैं इन बाहों का संगीत सुन रहा हूँ।
हिन्दमहासागर, अरबसागर और
बंगाल की खाड़ी के पागल भैंसे
की तरह के चीत्कार
पेड़ों, शाखों और तटों को मथती हुई
हवाओं की झंकार
मैं अब सुन रहा हूँ और मौन हूँ।
मैं सुन रहा हूँ,
पुरवाई हवाओं की चटखती आवाजें
खानाबदोश गाड़ोलियों की टंकारे
और, ऊपर चमकते सूरज का संगीत।
मैं वन-प्रान्तर का विहाग-राग भी
सुन रहा हूँ।
चहचहाटें, कोयल की तानें,
शेरों की गुरु गम्भीर आवाजें,
ढोलों की ढमक,
औरतों की कानफोड़ू आवाजें,
पंखों की फडफ़ड़ाहट और
खिखियाते बंदरों की
चक्करघिन्नियां
सपनीली आवाजें,
लम्बी दोहरी पुकारें
और आकाश के नीचे घने
बादलों की फुसफुसाहटें
मैं मध्यभारत दक्षिण-उत्तर के चश्मों की
हँसी सुन रहा हूँ।
लालची मछलियाँ
पानी को गुमराह और गंदला
करने की नाकाम कोशिशें करती हुई
भी सुनाई पड़ रही हैं
चट्टानों की दरारों में गिरती
जल की अविरल धारा का सुगम संगीत,
मुझे किसी शहनाई-सा सुनाई दे रहा है।
मैं सुन रहा हूँ,
हलों को जोत रहे बैलों की आवाजें,
सांझ को घर लौटती गायों की
रंभाने की आवाजें,
गन्ने पेरती कोल्हू और
कड़ाह की खुशबुएँ,
मैं सब सुन रहा हँू।
धुआं ऊगलती आवाजें और
नारियल, सुपारी, इलायची
की मीठी तानें,
पेड़ों को चीर कर
चिल्लाने की आवाजें,
घडिय़ालों और मक्कारों की
दाँत किटकिटाने की आवाजें
मैं पूरे देश को गाते, बोलते, पुकारते,
हँसते और मुस्कराते सुन रहा हूँ।
खिलखिलाते लहंगे
मुस्कराती कुर्तियाँ
झूमती ओढ़नियाँ
इठलाती चोलियों का संगीत
मैं सब सुन रहा हूँ।
भागती रेलें,
चीखते इन्जन
चरवाहों के गीत
सड़कों का शोर- शराबा
सीमेंट और कंकरीट के
जंगलों की भुतहा आवाजें
विभिन्न जातियाँ,
बोलियाँ, भाषा और
समुद्री हवाओं की चीखें,
इस पवित्र घड़ी में
सब कुछ सुखद है।
मैं अपने देश का
प्रिय गीत सुन रहा हूँ
खानों के मजदूरों की आवाजें,
अकाल राहत की सुरसुराहटें,
बाढ़ की गलियों से गुजरती आवाजें,
यही है मेरा देश
पालनों के पास लोरियों का स्वर
अनगिनत पालनों में सोए भोले- भाले
सरल दूधमुँहे बच्चे
यही है मेरा देश
मेरे बच्चे
यही है हमारा देश।
संपर्क: 86, लक्ष्मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर-302002 फोन: 2670596
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1 Comment:

सहज साहित्य said...

कोठारी जी की कविता आद्यन्त प्रवाहमयी और सशक्त है ।

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