May 10, 2011

आपके पत्र/ मेल बॉक्स

नए स्तंभ
उदंती में आरंभ किए गए 'किताब' और 'पिछले दिनों' स्तँभ अच्छे हैं। हमेशा कि तरह विचार भी बहुत बढिय़ा है कि 'आँदोलन से विद्रोह नहीं पनपता बल्की शाँति कायम रहती है'। उम्मीद ही नहीं विश्वास है कि 'माटी संस्था' औरतों के प्रति सँवेदनशील होकर समाज में इस एक मुद्दे को गहराई से छुएंगी और साथ ही सजग होकर यह भी देखेंगी कि यह कोई उत्तर खोजने वाला बने ना कि अँध समर्थन।
- दीपक शर्मा
deepakrajim@gmail.com
'अकेला उड़ चला'
अप्रैल अंक में प्रकाशित हिमांशु जी के हाइकु भावपूर्ण और कवितामयी रस लिए हुए हैं, हाइकु कविता का एक बहुत छोटा रूप है जिसमें अपनी बात कहना 'गागर में सागर' भरने जैसा कार्य है। हिमांशु जी ने सचमुच अपने हाइकु में 'गागर में सागर' भरने का सद्प्रयास किया है और वे सफल भी रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि ये भावहीन और शुष्क नहीं हैं बल्कि कविता का रस लिए हुए हैं।
- सुभाष नीरव
subhneerav@gmail.com
मन को छूती हाइकु
काव्य में भावना प्रधान होना बहुत जरूरी होता है ताकि मधुरता बनी रहे भले ही रचना शिक्षाप्रद हो, आशावादी हो या फिर व्यथा या पीड़ा के भाव लिए हुए हों। काव्य में सदैव कोमल शब्द और भाव होते हैं जो मन को छू जाते हैं। हिमांशुजी की सभी हाइकु बहुत अच्छे लगे, बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं।
- डॉ. जेन्नी शबनम
Jenny.Shabnam@gmail.com
डॉ. भावना कुंवर- यूके, सुनील गज्जाणी- बीकानेर, रचना- यूके, सुधा भार्गव- बंगलूरू, गिरिजा कुलश्रेष्ठ-ग्वालियर, निर्मला कपिला और मनुकाव्य को भी काम्बोज जी के हाइकु अच्छे लगे।
जाऊं पिया के देस ओ रसिया...
उपरोक्त शीर्षक से प्रकाशित संस्मरण ने पुरानी यादें ताजा कर दीं। 1965 में हमारे गाँव में भी रेडियो आया था। चौपाल में सब चुपचाप होकर सुनते थे। देहाती कार्यक्रम में जब प्रस्तोता राम- राम कहते थे तो श्री अमोलक सिंह (जिनका रेडियो था) बड़ी जोर से 'राम-राम भाई राम-राम' कहते थे। एक बार किसी ने पूछ लिया कि ताऊ रेडियो कितने बैण्ड का है? उनका उत्तर आज तक मन ही मन मुस्काने को मजबूर करता है-'अरै भाई इसमैं तो बहर भित्तर बैण्ड ही बैण्ड हैं।' विकिरण का अभिशाप -लेख में बहुत ही महत्त्वपूर्ण जानकारी दी गई है। कुछ सुखों के लिए हम अपना अमन- चैन खोने को तैयार हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो बढ़ती सुविधाएँ ही हमारे विनाश का कारण बनती जा रही हैं। हम आदिम युग से भी ज्यादा बर्बर हो रहे हैं। कुछ वर्षों के सुख के लिए आने वाली पीढिय़ों को नरक में झोंकने को तैयार हैं।
- रामेश्वर काम्बोज
rdkamboj@gmail.com
पत्रिका की छपी प्रति
उदंती का अंक मिला। आपकी पत्रिका बहुत ही सुन्दर छपती है। नेट पर इसका ले आउट अलग होता है लेकिन छपी प्रति ज्यादा अच्छी लगती है।
जवाहर चौधरी, इंदौर
jc.indore@gmail.com
अद्भुत रंग
आसमान में कलाबाजी करते परिन्दे के जरिए सीजर सेनगुप्त ने रंग बिरंगे पक्षियों से परिचय तो करवाया ही है साथ ही सात ताल व पंगोट की सैर करने की इच्छा भी जगा दी। हिन्दी की यादगार कहानियों के माध्यम से परदेशीराम वर्मा उन कहानियों से परिचय करवा रहे हैं जो चर्चित व प्रसिद्ध रही हैं। पिछले अंक में श्रीकांत वर्मा की कहानी शवयात्रा में प्रेम का एक अद्भुत रंग पढऩे को मिला। शिव की नगरी ताला की जानकारी भी अच्छी लगी।
- पूजा शुक्ला, विशाखापट्टनम
shuklapoojarao@gmail.com

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