February 28, 2011

दो लघुकथाएं

1. सच झूठ
सुरेन्द्र सर्वेक्षण में लगी अपनी ड्यूटी करता हुआ, एक घर से दूसरे घर जा रहा था।
एक घर में उसे दो सदस्य मिले, बाप- बेटा।
उसने एक फार्म निकाला और अपने ढंग से भरने लगा। घर के मुखिया का नाम, पता, काम लिखने के बाद, पूछना शुरू किया-
'आटा कितना लग जाता होगा?'
'जितना मर्जी लिख लो जनाब ! '
'फिर भी, बीस- पच्चीस किलो तो लग ही जाता होगा?'
'हां जी।'
'दालें कितनी खा लेते हो? '
'आप समझदार हो, लिख लो खुद ही।'
'पांच- छह किलो तो खा लेते होंगे? '
'क्यों नहीं, क्यूं नहीं।'
'घी? '
'खाते हैं जी।'
'वह तो परमात्मा की कृपा से खाते ही होंगे। कितना शुद्ध और दूसरा कितना? '
'देसी घी? वह तो आपने याद दिला दिया। दिल तो बहुत करता है।' उसके चेहरे पर जरा- सी उदासी आ गई।
'मीट- अण्डों का सेवन?'
'परमात्मा का नाम लेते हैं जी, पर जी में बहुत आता है।' कहते हुए उसने एक गहरी सांस ली।
इसी तरह दो सौ साठ प्रश्नों वाला फार्म, सुरेन्द्र ने एक- एक करके भरा। पूरी बात हो जाने पर, सुरेन्द्र ने फार्म से अंदाजा लगाया और पूछा, 'बाकी तो सब ठीक है, पर जो आपने बताया है, उससे अनुमान होता है कि आप कुछ ज्यादा नहीं बता पाए।'
इस बार बेटे ने जवाब दिया, 'दरअसल सही बात बताएं, हम घर में रोटी बनाते ही नहीं। हम बाप- बेटे दो आदमी यहां रहते हैं। बाकी तो गांव में हैं। हमने एक होटल वाले से बात तय कर रखी है। दाल- रोटी सुबह, यूं ही शाम को।'
सुरेन्द्र दोनों की तरफ टिकटिकी बांधे देखता रहा घंटा पौन लगाया फार्म भरने में और निकला..
'भई! ये क्या किया आपने?'
'किया क्या बेटा ! पहले तो मुझे लगा कि मैं यह क्या बता रहा हूं। फिर ज्यों- ज्यों तू पूछता रहा, मेरा मन किया कि तुझसे बातें जरूर करूं।'
'पर आपने झूठ क्यों बो?'
'झूठ कहां बोला बेटा। यह तो सब सच है। झूठ तो बेटा यह है जो हम अब गुजर कर रहे हैं।'
2.हद
एक अदालत में मुकदमा पेश हुआ।
'साहब, यह पाकिस्तानी है। हमारे देश में हद पार करता हुआ पकड़ा गया है।'
तू इस बारे में कुछ कहना चाहता है ? मजिस्ट्रेट ने पूछा।
मुझे क्या कहना है, सरकार! मैं खेतों में पानी लगाकर बैठा था। हीर के सुरीले बोल मेरे कानों में पड़े। मैं उन्हीं बोलों को सुनता चला आया। मुझे तो कोई हद नजर नहीं आई।

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