February 28, 2011

चाय क्या कहते हैं वैज्ञानिक?

- डा. विजय कुमार उपाध्याय

चाय में उपस्थित थियोफायलीन नामक पदार्थ हमारे फेफड़ों में हवा के आवागमन के रास्ते को चौड़ा कर देता है जिसके फलस्वरूप हम अधिक आराम से सांस ले सकते हैं। इससे दमा तथा सांस सम्बंधी समस्याओं से ग्रस्त लोगों को काफी लाभ होता है तथा वे राहत महसूस करते हैं।
चाय आज संसार में सबसे सस्ता तथा सर्वाधिक लोकप्रिय पेय पदार्थ है। इसके सेवन से एक प्रकार की तात्कालिक ताजगी प्राप्त होती है। वैज्ञानिक शोधों से पता चला है कि चाय सिर्फ ताजगी प्रदान करती है, अपितु यह कई प्रकार के रोगों को भी हमसे दूर रखती है। चाय में कई प्रकार के यौगिक पाए जाते हैं, जिनमें प्रमुख हैं विभिन्न प्रकार के फ्लेवनॉयड। फ्लेवनॉयड में शक्तिशाली ऑक्सीकरण- रोधी गुण पाए जाते हैं। फ्लेवनॉयड का ही एक उपवर्ग है कैटेचिन जो चाय को स्वाद एवं सुगंध तो प्रदान करता ही है, साथ ही हमारे शरीर को कई प्रकार के स्वास्थ्य संबंधी लाभ भी पहुंचाता है। यूएसए के बोस्टन में स्थित टफ्ट्सन विश्वविद्यालय के कुछ शोधकर्ताओं ने विभिन्न प्रकार की चाय की ऑक्सीकरणरोधी क्षमता की तुलना 22 प्रकार की अन्य वनस्पतियों से की। इन शोधों से पता चला है कि चाय की ऑक्सीकरण- रोधी क्षमता अच्छे फलों और सब्जियों से भी अधिक है। विशेषकर हरी चाय (कहवा) तथा काली चाय में यह गुण सबसे अधिक पाया जाता है।
ऑक्सीकरण- रोधी उस प्रकार के पदार्थ हैं जो हमारे शरीर में पहुंचकर कोलेस्ट्राल के ऑक्सीकरण को रोकने का काम करते हैं। यदि कोलेस्ट्राल के ऑक्सीकरण को न रोका जाए तो ये ऑक्सीकृत होकर हमारी धमनियों की दीवार से चिपक जाते हैं। इसकी वजह से हृदय रोग का खतरा पैदा हो जाता है। इसी कारण जो लोग अधिक चाय पीते हैं उन्हें दिल का दौरा पडऩे का खतरा बहुत कम रहता है। हाल में किए गए वैज्ञानिक शोधों से पता चला है कि जो लोग प्रतिदिन पांच कप या उससे अधिक चाय पीते हैं, उन्हें दिल का दौरा पडऩे का खतरा 79 प्रतिशत घट जाता है।
चाय में पाया जाने वाला ईजीसीजी (एपि गैलो कैटेचिन गैलेट) नामक रसायन कैंसर के विरुद्ध काफी अधिक सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम पाया गया है। चाय में उपस्थित थियोफायलीन नामक पदार्थ हमारे फेफड़ों में हवा के आवागमन के रास्ते को चौड़ा कर देता है जिसके फलस्वरूप हम अधिक आराम से सांस ले सकते हैं। इससे दमा तथा सांस सम्बंधी समस्याओं से ग्रस्त लोगों को काफी लाभ होता है तथा वे राहत महसूस करते हैं। चाय में मौजूद फ्लोराइड दातों के क्षय को रोकने में सक्षम है। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययनों से पता चला है कि एक कप काली या हरी चाय में लगभग 35 से 45 मिलीग्राम कैफीन मौजूद रहता है। इसके कारण अधिक संवेदनशील लोगों में माइग्रेन की समस्या पैदा हो सकती है। चाय में मौजूद टैनिन नामक पदार्थ हमारी पाचन प्रणाली को प्रभावित करता है जिससे खाद्य पदार्थों में मौजूद लौह को अवशोषित करने की क्षमता घट जाती है। अत: बहुत अधिक चाय पीने से एनीमिया की समस्या पैदा हो सकती है। चाय में मौजूद टैनिन दातों के एनेमल पर भी बुरा प्रभाव डालता है जिससे दातों पर धब्बे पैदा हाते हैं। अधिक चाय के सेवन से पेशाब अधिक हो सकती है जिसके कारण शरीर का जल एवं पोटेशियम जैसे रासायनिक पदार्थों का संतुलन गड़बड़ा सकता है।
कुछ समय पूर्व प्रयोगशाला में विभिन्न जन्तुओं पर किए गए प्रयोगों से पता चला है कि चाय में मौजूद कैटेचिन नामक पदार्थ कैंसर के विकास को रोकने में सक्षम है। यह ट्यूमर कोशिकाओं के विकास को रोकने में काफी प्रभावशाली साबित हुआ है। परन्तु अभी यह स्पष्ट नहीं है कि ये पदार्थ मानव शरीर पर कितने प्रभावी हैं। कुछ क्षेत्रों में मानव समुदायों पर किए गए अध्ययनों से पता चला है कि अधिक मात्रा में चाय पीने वाले लोगों में स्तन कैंसर, त्वचा कैंसर, पेट का कैंसर, गुदा कैंसर तथा अन्य प्रकार के कैंसर से ग्रस्त होने की संभावना बहुत कम रहती है।
यूएसए के कुछ शोधकत्र्ताओं ने ऐरीजोना क्षेत्र में धूम्रपान करने वाले लोगों को प्रतिदिन चार कप कैफीन- मुक्त हरी चाय पीने को दी। यह प्रयोग लगातार चार महीने तक चलाया गया। प्रयोग के अन्त में पाया गया कि प्रयोग में शामिल धूम्रपानियों के डीएनए की क्षति (जिसके कारण कैंसर हो सकता है) 30 प्रतिशत घट गई। इस प्रयोग से यह स्पष्ट हो गया कि धूम्रपान करने वाले लोग यदि नियमित रूप से हरी चाय का सेवन करें तो वे कैंसर के खतरे से बच सकते हैं।
हाल ही में जर्नल ऑफ एन्वायरमेंटल पैथालॉजी, टॉक्सिकोलॉजी एण्ड ओन्कोलॉजी में एक शोध पत्र प्रकाशित हुआ है जिसमें बताया गया है कि नियमित रूप से काली चाय का सेवन करने वालों को मुह का कैंसर होने की संभावना बहुत कम रहती है। इसी प्रकार अमेरिकन जर्नल ऑफ कार्डियोलॉजी में प्रकाशित एक शोध पत्र में बताया गया है कि नियमित रूप से काली चाय पीने वालों को हृदय रोग होने की संभावना बहुत कम रहती है।
तमिलनाडु के बन्नारी आमान इंस्टिट््यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी में कार्यरत डा.जी.एस. मुरुगेसन ने अपने शोधों से पता लगाया है कि काली चाय में किण्वन के दौरान उत्पन्न पदार्थ भूमिगत जल में मौजूद आर्सेनिक को हटाने की क्षमता रखता है। आर्सेनिक एक विषैला पदार्थ है जो कोलकाता तथा आसपास के भूमिगत जल में काफी मात्रा में उपस्थित है। आर्सेनिक युक्त इस जल को पीने से लोगों में अनेक प्रकार की बीमारियां पैदा हो रही हैं। काली चाय की मदद से इस जल को आर्सेनिक के प्रदूषण से मुक्त किया जा
सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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