January 29, 2011

पर्यावरण का शत्रु पॉलीथीन

- दिव्या जैन

गृहणियां पॉलीथीन की थैलियों का उपयोग के बाद इनमें ही घर का कूड़ा करकट बची हुई सब्जियां, बचा हुआ अन्न अन्य खाद्य सामग्री भर कर इसमें गां लगाकर खुले में, सड़क पर, नालियों में या कचरे के ढेर में फेंक देती हैं। बात यहां समाप्त नहीं होती बल्कि प्रारम्भ होती है।
प्यारे देशवासियों, पर्यावरण प्रेमियों, गौ भक्तों को दिव्या जैन का जय जिनेन्द्र। मैं इस पत्र के माध्यम से समस्त भारतवासियों का ध्यान आकृष्ट कर उनको सम्पूर्ण देश के लिए, देश के पर्यावरण के लिए गा माता के लिए नुकसान का कारण बन रहे पॉलीथीन की थैलियों की तरफ ले जाना चाह रही हूं। यह मैं इसलिए कर रही हूं कि मैंने पॉलीथीन से हुए नुकसान को नजदीक से देखा है।
विज्ञान ने मानव को प्रगति के पथ पर आगे बढऩे के असीम अवसर दिए हैं, लेकिन मनुष्य ने बिना कुछ सोचे समझे ही विज्ञान के माध्यम से रोजमर्रा के कुछ ऐसे साधन पैदा कर दिए हंै जो मनुष्य के साथ- साथ पर्यावरण के लिए भी नुकसानदायक सिद्ध हो रहे हंै। उनमें से एक है- पॉलीथीन।
पॉलीथीन कागज, कपड़े या गत्ते की तरह गलता नहीं है। आज पॉलीथीन ने मानव जीवन में अच्छी खासी पैठ बना ली है, या कहें कि इसने हमें अपना गुलाम बना लिया है। व्यावसायिक मार्के हो या सब्जी मंडी सभी के हाथों में पॉलीथीन की थैलियां नजर आ जाती हंै। आज लोग कपड़े या जूट का थैला लेकर चलने में शर्म महसूस करते हैं और घर से बाजार हाथ हिलाते जाना पसन्द करते हैं।
जबकि हम सभी जानते हैं कि पॉलीथीन की थैलियां हमारे लिए बहुत नुकसानदायक है। ये जमीन में जाकर उसके उपजाऊपन को नष्ट करती है। नदी नालों में जाकर उसके बहाव को रोककर गन्दगी व बीमारी का कारण बनती है कई बार महामारी का कारण भी बनती है। नदी, तालाब, नालों व धरती पर इसकी परत बिछ जाने से जमीन के भीतर जल नहीं पहुंच पाता। इस तरह ये पेड़ पौधों को पनपने नहीं देती। आज जहां कहीं भी जमीन को खोदकर देखें तो वहां पॉलीथीन की थैलियां ही थैलियां मिलेंगी। पॉलीथीन क्योंकि गल कर नष्ट होने वाली वस्तु नहीं है, बस जमती ही जाती है। इसे जलाने पर विषाक्त गैस पैदा होती है जो पर्यावरण के साथ- साथ मनुष्य के लिए भी खतरनाक है। पॉलीस्टरीन नामक प्लास्टिक को जलाने से क्लोरोफ्लोरो कार्बन बाहर आते हैं, जो जीवन रक्षक ओजोन कवच को नष्ट कर देते हैं।
पॉलीथीन से सीवर लाईन के चोक होने की कई घटनाएं भी हुई हैं। सन् 1998 में मुम्बई में सीवर नेटवर्क चोक हो गया और उसने कृत्रिम बाढ़ का रूप धारण कर लिया जो सिर्फ पॉलीथीन थैलियों के कारण हुआ। मंैने स्वयं पॉलीथीन के नुकसान को देखा है, आज से दो वर्ष पूर्व जब मैं अपने ननिहाल व दादाजी के घर (कोटा) गर्मियों की छुट्टियों में गई थी, तब मुझे पता चला कि एक गाय की मृत्यु पॉलीथीन की थैलियों के कारण हुई है, तो मैं हैरान रह गई कि पॉलिथीन इतना नुकसानदायक भी हो सकता है। मुझे इससे बहुत दु:ख हुआ, मेरे लिए यह असहनीय था लेकिन इस घटना ने मुझे प्रेरित किया कि मैं पॉलीथीन के विरोध में काम करूं।
दरअसल होता यह है कि गृहणियां पॉलीथीन की थैलियों का उपयोग के बाद इनमें ही घर का कूड़ा करकट बची हुई सब्जियां, बचा हुआ अन्न व अन्य खाद्य सामग्री भर कर इसमें गांठ लगाकर खुले में, सड़क पर, नालियों में या कचरे के ढेर में फेंक देती हंै। बात यहां समाप्त नहीं होती बल्कि प्रारम्भ होती है। खुले में घूमते मवेशी विशेषकर गाय जिसे हम माता, बल्कि माता से भी बढ़कर मानते हंै वे भोजन की खुशबू से आकर्षित होकर थैली की गांठ को खोलना चाहती हैं लेकिन खोल नहीं पातीं अन्त में वह भोजन सामग्री को थैली समेत खा जाती हैं। उनके पेट में धीरे- धीरे यह थैलियां जमा होती जाती हंै क्योंकि पॉलीथीन का किसी तरह पाचन सम्भव नहीं है अत: अधिक मात्रा में पेट में जमा पॉलीथीन उनके शरीर में बीमारियां पैदा कर देती है और उनका हाजमा खराब कर देती है इस तरह उनको मौत की नींद सोना पड़ता है। कितनी खतरनाक मौत होती है उस निरीह की...।
पशु चिकित्सकों के सामने यह समस्या रहती है कि कोई भी ऐसी दवाई नहीं है जो पशुओं के पेट में जमा पॉलीथीन को पचा सके या बाहर निकाल सके। इस तरह पॉलीथीन पशुओं के लिए चलता- फिरता कत्लखाना है और हम हैं कि इससे बेखबर होकर मवेशियों को मौत के मुंह में भेज रहे हैं।
यहां मैं आपको यह भी बताना चाहूंगी कि अगर पॉलीथीन या कचरा निकालने के लिए पशुओं के पेट का ऑपरेशन कराया जाए तो उसमें बहुत अधिक खर्चा आता है तथा 3 घण्टे से भी अधिक समय लगता है साथ ही उसे ठीक होने में लगभग 45 दिन लगते हैं। ऐसा कौन व्यक्ति है जो यह सब कुछ कर सके। मजबूरन पशु को... मरना पड़ता है।
मैं यहां कहना चाहूंगी कि लोग गाय को बचाने के नाम पर बड़े- बड़े कार्य करते हैं, कोई कानून बनाने की बात करता है, कोई रैली निकालता है। यह सब वे करें अच्छी बात है इससे चेतना आती है, पर क्या यह हमारा दायित्व नहीं है कि हम गायों की मौत का कारण बन रहे पॉलीथीन की थैलियों के उपयोग को बन्द कर दें। पॉलीथीन को खुले में, उसमें भोजन सामग्री बांध कर नहीं फेंके। अगर हम ऐसा कर पाएं तो बेमौत मर रहे इन पशुओं पर हमारा बहुत बड़ा उपकार होगा।
इस विषय में सरकार कानून बना दे तब भी हम सबका इसके प्रति जागरूक होना जरूरी है। हम डर से नहीं बल्कि विवेक के आधार पर इनका पालन करें। अत: मेरा यह निवेदन है कि आप सब पॉलीथीन के दुष्प्रभाव को समझें और इसके उपयोग को बन्द करें, इसके स्थान पर कागज या कपड़े के बने हुए बैग का उपयोग करते हुए पर्यावरण संरक्षण में भागीदार बनें और ऐसा करने में शर्म नहीं बल्कि गर्व का अनुभव करें। इसे अपनी परम्परा व संस्कृति का हिस्सा मानें।
इसके साथ ही मैं प्लास्टिक के बने खिलौनों की बात भी करना चाहती हूं। 'सैंटर फॉर संाइस एण्ड एनवायरमेंट' (सी.एस.ई.) का ताजा अध्ययन बताता है कि भारतीय बाजारमें बिक रहे अधिकांश खिलौनों में थैलेट नामक रसायन पाया जाता है। सीएसई ने प्रमुख ब्रांड्स के 24 खिलौनों के नमूने जांच करवाएं, इसमें 15 सॉफ्ट टॉयज व 9 हार्ड टॉयज थे। जांच में सामने आया कि सभी में एक या एक से अधिक तरह के थैलेट्स नामक रसायन थे जो कि किसी न किसी तरह से छोटे- छोटे बच्चों में अनेक तरह की बीमारियों का कारण बन रहे हैं, जिसमें अस्थमा, गुर्दा, एलर्जी, प्रजनन सम्बन्धी बीमारियां प्रमुख हैं। यह सब बताने के पीछे मेरा मकसद यह है कि हम पॉलीथीन व प्लास्टिक के दुष्प्रभाव को समझें। हम सस्ते, सुन्दर व सुलभ के चक्कर में इनका उपयोग करके स्वयं के साथ- साथ सम्पूर्ण देश के पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं।
आइए हम आज से ही नई शुरूआत करें, जागें व जगाएं। अभी नहीं तो कभी नहीं, कागज व कपड़े की संस्कृति की तरफ पुन: लौटें और ऐसा करने में गर्व का अनुभव करें। मैं तो यह भी कहूंगी कि सरकार को तुरन्त नियम बनाना चाहिए कि प्रत्येक कर्मचारी रोजाना हाथ में कपड़े का थैला लेकर कार्यालय व बाजार जाए और उस पर यह भी लिखवाए कि- 'पॉलीथीन पर्यावरण का शत्रु है।'
मैंने ऐसा किया है आप भी करें क्योंकि यह हम सब का दायित्व भी है। हम जिस धरती पर रहते हंै उसके प्रति हमारी भी कुछ जिम्मेदारी बनती है।
मैं अन्त में यह भी कहूंगी कि हमने अब तक पॉलीथीन की थैलियों को उपयोग में लेकर पर्यावरण को बहुत अधिक नुकसान पहुंचाया है। उस गलती को सुधारें और उसके लिए वृक्षारोपण करें, मात्र पौधे ही नहीं लगाए बल्कि उसकी रक्षा का भी संकल्प लें, उसे पुत्र के समान पालें, बड़ा करें बाद में वह पौधा बड़ा वृक्ष बनकर हमें व हमारी पीढिय़ों को इतना कुछ देगा जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होगी।
आओ- आओ हम पेड़ लगाएं
छोटा नन्हा पेड़ लगाएं
अखबारों में नहीं, जमीन पर लगाएं
छोटा नन्हा पेड़ लगाएं
हजारों नहीं सिर्फ एक पेड़ लगाएं
छोटा नन्हा पेड़ लगाएं
रिकार्ड के लिए नहीं हमारे स्वयं के लिए
छोटा नन्हा पेड़ लगाएं।
मेरे बारे में ...
अपने जीवन में घटित घटना से प्रेरित होकर विगत लगभग 2 वर्षों से पॉलीथीन मुक्ति अभियान चला रही चित्तौडग़ढ़ शहर की रहने वाली 10 वर्षीय नन्ही बालिका दिव्या जैन का प्रयास, लगन, निष्ठा और हौसले की मिसाल है। राज्य सरकार ने जब 1 अगस्त 2010 से राज्य में पॉलीथीन पर पूर्णतया प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया तो इस नन्ही बालिका ने राजस्थान के कई जिलों व कस्बों में घूम- घूम कर पॉलीथीन की थैलियों के दुष्प्रभाव की जानकारी दी और कपड़े की थैलियां बाटकर शपथ पत्र भरवाया। वह राज्य सरकार के निर्णय से काफी प्रसन्न है क्योंकि अपने मिशन के लिये लगातार प्रयासरत रही दिव्या को सफलता मिली है। दिव्या को उसके द्वारा लगातार किये जा रहे प्रयासों के लिये कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है तथा प्रशस्ति पत्र भी प्राप्त हुए हैं। दिव्या कहती है- 'मेरे लिये यह खेल या मजाक नहीं बल्कि एक मिशन है, जिसमें मैं कामयाब रहूंगी'
पता- मकान नं.-59, सेक्टर-4 गांधीनगर, चित्तौडगढ़- 312001 (राजस्थान) मो. 9214963491
E-mail: divyasanjayjain@gmail.com, www.divyajain99.blogspot.com

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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