January 29, 2011

लघुकथाएँ

 डॉ. अशोक भाटिया
कागज की किश्तियाँ
चुनाव होने में अभी दो साल पड़े थे। राज्य में प्रौढ़- शिक्षा पर पांच सौ करोड़ रुपए का खर्च करने की मंजूरी मिली थी। जीपों का मुंह गांवों की तरफ मुड़ गया। अनुभव ने देहातियों को सिखा दिया है कि यहां मन्त्री और अफसर किन कारणों से आते हैं।
नए सिरे से अनपढ़ लोगों की सूचियां बनाई जाने लगीं। इनमें पिछली सूचियों में जोड़े गए कई नाम भी शामिल किए गए।
हमारे गांव बिज्जलपुर में भी ऐसा ही हुआ। जिस दिन प्रौढ़ों को पढ़ाने का सामान लाया गया, उस दिन बच्चों की आंखों में एक नई चमक आ गई। अधनंगे, नाक बहाते बच्चे जीप से कुछ दूर जमा होकर धीरे- धीरे बतियाने लगे।
सुबह का वक्त था। मर्द लोग खेतों में या शहर में निकल गए थे। चौधरी धर्मसिंह ही रह गया था। आवाज सुनकर वह लाठी टेकता, उनके चेहरे पढ़ता हुआ आ पहुंचा। जीप से सामान उतारा जा रहा था। चौधरी ने कहा- 'किस्मत सै रात नें पाणी बरस्या था। सब लोग खेत्तां नै गोडऩ खात्तर गए हैं।' फिर हाथ जोड़कर बोला- 'आप इन बालकां नै कुछ पढ़ा- लिखा दे तो इनकी जिंदगी बण जांदी।'
एक अधिकारी बोला- 'देख ताऊ, हमें बच्चों के लिए नहीं भेजा गया। यह पढऩे- लिखने का सामान रखा है, आने पर उन सबको दे देना।'
डयूटी पूरी करने के बाद ज्यों ही जीप स्टार्ट हुई, बच्चे सामान पर टूट पड़े। बीरू ने किताबों के पन्ने फाड़ते हुए कहा- 'चलो रै, जौहड़ में किश्तियां चलाएंगे।'
रिश्ते
वह आम बस थी और स्वरूप सिंह आम ड्राइवर था। सवारियों ने सोचा था कि भीड़- भाड़ से बाहर आकर बस तेज हो जाएगी। पर ऐसा नहीं हुआ स्वरूप सिंह के हाथ आज सख्त ही नहीं, मुलायम भी थे। भारी ही नहीं, हल्के भी थे। उसका दिल आज बहुत पिघल रहा था, वह
कभी बस को, कभी सवारियों को और कभी बाहर पेड़ों को देखने लगता, जैसे वहां कुछ खास बात को। कंडक्टर इस राज को जानता था। लेकिन सवारियां धीमी गति से परेशान हो उठीं।
'ड्राइवर साहब, जरा तेज चलाओ, आगे भी जाना है', एक ने तीखेपन से कहा।
स्वरूप सिंह ने मिठास घोलते हुए कहा, 'आज तक मेरी बस का एक्सीडेंट नहीं हुआ।'
इस पर सवारियां और उत्तेजित हो गईं। दो- चार ने आगे- पीछे कहा, 'इसका मतलब यह नहीं कि बीस- तीस पे ढीचम-ढीचम चलाओ।'
कोशिश करके भी स्वरूप सिंह बस तेज नहीं कर पा रहा था। उसने बढ़ते हुए शोर में बस रोक दी। अपना छलकता चेहरा घुमाकर बोला, 'बात यह है कि इस रास्ते से मेरा तीस सालों का रिश्ता है। आज मैं यह आखिरी बार बस चला रहा हूं। बस के मुकाम पर पहुंचते ही मैं रिटायर हो जाऊंगा, इसलिए।'

4 Comments:

Devi Nangrani said...

Ashok Bhatia ji ki laghukathaon mein Laghutam tatv ke saath aur bhi bareekiyaan shamil hain jo kahani ko laghukatha banne mein safal hoti hai.

Madanlal Shrimali said...

दोनों लघुकथाएँ सुंदर पर बस वाली लघुकथा दिल को छु गई।

सुधाकल्प said...

बेहद मार्मिक

Chitra said...

Rishte... An awesome short story. Please notify on posting new stories.

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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