January 29, 2011

तन मन धन से समर्पित एक शिक्षाविद्

ठाकुर राम खेलावन सिंह
- द्वारिका प्रसाद शुक्ल
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात का भारत। उत्तरप्रदेश के जिले सुल्तानपुर का पिछड़ा क्षेत्र अलीगंज बाजार जहां साइकिल तक अत्याधुनिक सवारी मानी जाती थी। अलीगंज में एक साप्ताहिक बाजार बृहस्पतिवार के दिन लगती थी और इस कारण हम बच्चे बृहस्तपतिवार को तो बाजार का दिन समझते थे। 10- 12 किमी से पहले कोई जूनियर हाई स्कूल नहीं था। निकटस्थ मिडिल स्कूल मुसाफिरखाना 10 किमी पश्चिम लखनऊ की तरफ था। जाहिर है ज्यादातर बच्चे कक्षा 5 के आगे नहीं पढ़ पाते थे।
श्री राम खेलावन सिंह सौभाग्यशाली थे कि उनके पिता लाहौर में कुछ नौकरी करते थे। वहां रहकर उन्होंने हाई स्कूल (मैट्रिक) तक की शिक्षा प्राप्त की। पश्चात कतिपय कारणों से पैतृक गांव आ गए थे। 1950 में उनकी उम्र 25- 30 वर्ष के लगभग रही होगी। लाहौर के डीएवी कालेज में पढ़ते समय उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के महान नेताओं को देखने और सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। उन्हें स्पष्ट हो गया था कि महात्मा गांधी, सरदार पटेल, मदन मोहन मालवीय, नेहरू जैसे महान नेताओं को ब्रिटेन जैसी विश्व की महाशक्ति से लोहा लेने का साहस, शिक्षा के कारण ही प्राप्त हुआ था। युवा राम खेलावन सिंह जान गए थे कि मनुष्य का स्थायी सशक्तीकरण शिक्षा के माध्यम से ही होता है। इसी अहसास ने उन्हें अत्यंत पिछड़े एवं अशिक्षा के अंधकार में डूबे अपने जन्म स्थान के क्षेत्र में एक मिडिल स्कूल चलाने का विचार दिया।
स्थानीय गणमान्य लोगों से मिलकर 1950-51 में नजदीक के टिकरिया गांव के भगवत प्रसाद तिवारी के आम के बाग के एक कोने में मिट्टी के बने खपरैल वाले भवन में उन्होंने स्कूल शुरु किया। वे ही स्कूल के एकमात्र शिक्षक थे। उन्हें सब लोग हेडमास्टर साहब कहते थे। उन्हीं हेडमास्टर साहब से मेरी पहली मुलाकात सन् 1953 में तब हुई थी जब मैं उस क्षेत्र के सबसे पुराने प्रायमरी स्कूल की कक्षा 4 का छात्र था। मेरी पिताजी ने भी प्राइमरी की पढ़ाई वहीं से की थी। मैं अपने प्राथमिक विद्यालय से शाम को छुट्टी के बाद जूनियर हाईस्कूल इस आकर्षण से आ जाता था कि वहां लड़के वालीबाल खेलते थे। जब बाल आउट होती थी तो मैं दौड़कर उठा लाता था। वहमुझे बड़ा अच्छा लगता था। एक दिन वहां हेडमास्टर साहब आ गए और मुझसे पूछने लगे कि उस दिन मुझे इतिहास में क्या पढ़ाया गया था। मैंने बताया कि अशोक की लाट के बारे में पढ़ाया गया था। उन्होंने पूछा- क्या अशोक के पास लाठी रहती थी। मैं चुपचाप रह गया क्यों कि लाट और लाठी का अन्तर मुझे मालूम नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने मुझे एक अधन्ना (पुराने दो पैसे का सिक्का) पुरस्कार या प्रोत्साहन हेतु दिया था।
जब मैंने 1951 में ताउन (प्लेग) के समय प्रायमरी स्कूल जाना शुरु किया तब लगभग 5 वर्ष का था। गांव से अकेले दो किमी पैदल जाना होता था। प्लेग के कारण गांव का घर छोड़कर लोग- बाग, खाली मैदान में झोपड़ी बनाकर रह रहे थे। उस समय मेरे सीनियर स्व. छोटेलाल श्रीवास्तव कक्षा 6 के छात्र थे। मैं उन्हीं के साथ आता- जाता था। छोटेलाल लगभग अनाथ, अनाश्रित थे। मास्टर रामखेलावन सिंह उन्हें अपने घर में रखकर पढऩे भेजते थे। यह उनकी सहृदयता व दूरदर्शिता का परिचाय था।
मैं जब कक्षा 6 में हेडमास्टर साहब के स्कूल में भर्ती हुआ तब तक वहां लगभग 120 से 140 छात्रों की संख्या हो गई थी। हरी- भरी क्यारियों और आम के बाग के बीच गुरुकुल जैसा सुरम्य वातावरण था। चूंकि फीस से आय अधिक नहीं हो पाती थी अत: पर्याप्त शिक्षक नहीं रहते थे। कक्षा 8 में हिन्दी, सामाजिक शास्त्र, गणित व विज्ञान हमें हेडमास्टर साहब स्वयं पढ़ाते थे जिसके लिए उन्हें पर्याप्त समय नहीं मिलता था।
हेडमास्टर राम खेलावन सिंह अध्यापकों की कमी को आंशिक रूप में कुछ युक्तियों से पूरी करते थे। उदाहरणार्थ -
1. पुराने छात्र राम जगदीश द्विवेदी व कृषि एवं प्रसार अध्यापक यादव जी से गणित में मार्गदर्शन दिलवा देते थे।
2. उनका कहना था कि गणित की पुस्तक में हल किये हुए उदाहरणों को ठीक से समझकर प्रश्नों को हल करने का प्रयास करें। यदि न आवे तो एक पृष्ठ छोड़कर दूसरे प्रश्न को हल करें? लगातार सोचते/ प्रयास करते रहने से काफी लाभ मिलेगा। यह उनका उद्बोधन था।
3. वे पिछले 5 वर्ष के कक्षा की बोर्ड परीक्षा के प्रश्नपत्रों को हल करने के लिए कहते थे। इससे रिवीजन और तैयारी सटीक होती थी।
4. वे इतिहास व नागरिक शास्त्र तथा विज्ञान के पाठ कक्षा में एक छात्र से पुस्तक से पढ़वाते थे। बीच- बीच में स्पष्टीकरण देते थे।
5. उनका एक सबसे अच्छा गुण यह था कि सवेरे सामूहिक प्रार्थना के बाद छात्रों को बिठाकर प्रेरणात्मक संबोधन देते थे। उनका एक वाक्य मुझे अब भी याद है... 'यदि धन खो जाए तो कोई चिंता की बात नहीं, यदि स्वास्थ्य में कमी आ जाए तो कुछ चिंता की बात है परंतु यदि चरित्र क्षीण हो जाए तो बहुत बड़ी हानि की बात है।' इसे वे अंग्रेजी में भी दुहराते थे।
मैं 1955- 57 के सत्र में स्वाध्याय, मार्गदर्शन, क्यारियों में बैठकर अकेले पढऩे के फलस्वरूप प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हो गया। बाद में पता चला कि जिले में मेरी दूसरी पोजीशन थी। मुझसे और मेरे परिवार वालों से अधिक खुशी हेडमास्टर साहब को हुई। उन्होंने निश्चय किया कि हाई स्कूल पढऩे के लिए मुझे जिले के सबसे अच्छे स्कूल (राजकीय हाई स्कूल, सुल्तानपुर) में भर्ती करवाएंगे। मेरे पिताजी को साथ लेकर उन्होंने कक्षा 9 में वहां मेरा एडमिशन करवा दिया। और बताया कि मुझे 10 रुपए प्रतिमाह की सरकारी छात्रवृत्ति भी मिलेगी।
कुछ वर्षों पश्चात वह जूनियर हाई स्कूल जिला बोर्ड के आधीन हो गया तथा अब वहां नए प्रधानाध्यापक की नियुक्ति हो गई। इसके पश्चात हेडमास्टर साहब ने प्राइवेट हाई स्कूल चलाने का प्रया किया। जो कुछ समय चला। वे विद्यार्थियों को प्राइवेट छात्र के रूप में हाई स्कूल की परीक्षा दिलाते थे। कतिपय कठिनाइयों के कारण कुछ समय बाद वह बंद हो गया।
अब मास्टर रामखेलावन सिंह घर की खेती करने, कराने लगे, ट्यूबवेल लगवाया। एक बेटा अस्वस्थ था... शनै: शनै: पत्नी और पुत्र वियोग झेलना पड़ा। बेटी और पोती का विवाह किसी तरह निपटा दिया था।
जीवन के अंतिम वर्ष उनके बड़े संघर्षपूर्ण एवं आर्थिक तंगी के थे। लेकिन उनका स्वाभिमान, सामाजिक कार्यों में उनकी सहभागिता तथा अध्यवसाय गजब का था। वे सादा जीवन उच्च विचार की प्रतिमूर्ति थे। फटे कपड़े पहनकर, कई दिन बिना भोजन के रह लेना उनकी दिनचर्या बन गयी थी। परंतु किसी से आर्थिक सहायता मांगना तो दूर उसके बारे में जिक्र भी उन्हें बर्दाश्त नहीं था। कभी- कभी खेत की फसल या सब्जी ले जाकर बाजार में स्वयं बेच आते थे। परंतु पुराने प्रिय शिष्यों तक से कोई आर्थिक सहायता उन्हें स्वीकार्य नहीं थी। इसके बावजूद समाज में लड़कियों के विवाह के अवसर पर फटे- मैले कपड़ों में जाते अवश्य थे तथा यथा संभव आशीर्वाद स्वरूप भेंट देते थे।। दैन्य या दुर्बलता (शारीरिक अथवा मानसिक) उनमें कभी नहीं दिखी।
इस बीच मैं शिक्षा पूरी करके भारतीय स्टेट बैंक की सेवा में कार्यरत रहा। गांव जाने पर उनसे मिलता तथा उनका स्नेह प्राप्त करता। मैंने कभी उन्हें आदर के अलावा कपड़ा, धन आदि देने की पेशकश करने की भूल नहीं की। इस तरह उनका मेरे प्रति प्रेम बना रहा। वे हमारे इलाके के बहुचर्चित, बहुआयामी, दूरदर्शी शिक्षाविद् थे।
हमारे पिताजी से भी उनका बड़ा प्रेम था, वे मेरे घर आने की कृपा करते थे। जब वे पिताजी के आग्रह पर हमारे साथ घर आते थे और भोजन स्वीकार कर लेते थे तो हम लोग इसे अपना सौभाग्य मानते थे।
जीवन के अंतिम समय तक उन्हें यह चिंता रहती थी कि क्षेत्र में कन्या विद्यालय तथा पुस्तकालय एवं वाचनालय का अभाव है। धीरे- धीरे कन्या विद्यालय तो हाई स्कूल स्तर तक हो गया है परंतु पुस्तकालय, वाचनालय अभी नहीं है।
इधर उनके शिष्य तथा मेरे सहपाठी श्रीमाता प्रसाद शुक्ल ने एक प्राइवेट डिग्री कालेज की स्थापना की है। मेरे अनुरोध पर वे पुस्तकालय स्वर्गीय हेड मास्टर साहब की पुण्य स्मृति को समर्पित करने को सहर्ष तैयार हो गए।
हमारी गांव पंचायत बकुरी (जिसमें गड़ारा गांव सम्मिलित है) में अब पंचायत भवन भी बन गया। ग्राम प्रधान से मैंने कहा है कि कम से कम 1 या 2 कमरे पुस्तकालय एवं वाचनालय के लिए बनवाने का प्रयास करें। आशा है हेडमास्टर साहब की इच्छा मरणोपरान्त पूर्ण हो सकेगी।
समाजोत्थान के लिए तन- मन- धन से नि:स्वार्थ सेवा को ठाकुर साहब ने अपने जीवन का ध्येय बनाकर अंतिम सांस तक चरितार्थ कर दिखाया। हेडमास्टर राम खेलावन सिंह की दूरदर्शिता से पिछले 50- 60 वर्षों में उस पिछड़े क्षेत्र में अब शिक्षा का प्रचार हो चुका है। आशा है मास्टर साहब की आत्मा इस सबसे संतोष का अनुभव करेगी। मैं व्यक्तिगत रूप से उनके प्रति अत्यंत आभारी हूं और उनकी पुण्यस्मृति को शत्- शत् प्रणाम करता हूं।
लेखक के बारे में...
ग्राम बबुरी जिला सुल्तानपुर उत्तरप्रदेश में 21 फरवरी 1945 को जन्म। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमएससी (गणित)। भारतीय स्टेट बैंक में वरिष्ठ पद से 2001 में सेवानिवृत्त। अध्ययन और समाजसेवा में विशेष रुचि।
पता: एम.एस.80, डी ब्लाक, अलीगंज, लखनऊ 226024
मो. 9450046597

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