January 29, 2011

वो सुबह कभी तो आएगी...

जब शाम को सूरज डूबता है तो चाहे वृद्ध हो या जवान, रईस हो या गरीब, स्वस्थ हो या बीमार प्रत्येक मनुष्य इस उम्मीद के साथ सोता है कि कल सुबह शुभ होगी। वर्ष 2010 (जिसकी एकमात्र पहचान भ्रष्टाचार के सर्वनाशी भयंकर ज्वालामुखी का फटना होगी) की आखिरी शाम को तो देश के अधिकांश आम नागरिकों की यह उम्मीद कई हजार और गुना बढ़ गई होगी। नववर्ष की सुबह आई, लेकिन हमारी उम्मीद पूरी नहीं हुई। भ्रष्टाचार के एक से एक ज्यादा शर्मनाक मामले उजागर होते ही जा रहे हैं।

आम नागरिक आज यही महसूस कर रहा है कि भ्रष्टाचार के मामले में पानी सर के ऊपर से बढ़ चुका है। इसलिए आइए जरा इस बात पर गौर करें कि भ्रष्टाचार इतना भयंकर प्रकोप कैसे बना? समस्या के मूल कारणों को समझने से ही समस्या का हल भी निकलता है।
लाल बहादुर शास्त्री के प्रधान मंत्रित्वकाल तक देश की राजनीति भी काफी कुछ हमारे समाज के पारंपरिक मूल्यों और आदर्शों के प्रति आस्थावान बनी रही। शास्त्रीजी की असामयिक मृत्यु एक युगांतकारी घटना थी- मूल्यवान राजनीति के युग का अंत। वंशवाद पर आधारित मूल्यविहीन राजनीति का प्रारंभ हुआ जिसमें पारंपरिक परिभाषाओं को तिलांजलि देकर नई परिभाषा गढ़ी गईं। चाहे जैसे भी हो, धनवान बनना सफलता का एकमात्र पैमाना बन गया। नेता के प्रति स्वामीभक्ति राजनीतिक प्रतिबद्धता की पर्याय बन गई और चापलूसी राजनीतिक कौशल का प्रमाण। ऐसे माहौल में देश मेंकानून का राज्य होने के बजाय निरंकुशता शासन का मूलमंत्र बन गई जिसकी परिणति 1975 के आपातकाल में हुई जो सदैव ही हमारे इतिहास का काला अध्याय रहेगा।
आपातकाल तक के सात- आठ वर्षों में परिवारवाद से प्रेरित राजनीति का स्पष्ट संदेश था कि शासन तंत्र में सत्तासीन होने का मतलब था धनवान बनने का अवसर। अधिकांश राजनेता और सरकारी अधिकारी तथा कर्मचारी अपने को कानून से ऊपर मानते हुए भ्रष्टाचार के माध्यम से धन और संपत्ति लूटने में जुट गए। माले मुफ्त, दिले बेरहम। यहां तक कि सत्ता के सर्वोच्च पद पर आसीन परिवार से जुड़े योगी ब्रम्हचारी तक मर्सिडीज कार, वायुयान और एक बंदूक के कारखाने के मालिक बन गए।
केंद्र से प्रेरित होकर उत्तरप्रदेश, बिहार तथा अन्य प्रदेशों में भी परिवारवाद से प्रायोजित क्षेत्रीय दलों का उद्गम हुआ और उन्होंने भी राजनीति को भ्रष्टाचार से धनवान बनने का माध्यम बनाया। इस प्रकार के कुशासन में अपहरण जैसे संगीन अपराध उद्योग बन गए और डकैती तथा हत्या में लिप्त अपराधी बड़ी संख्या में राजनीतिक दलों का चोला पहनकर विधानसभाओं और संसद के सदस्य बन कर सत्ता के उच्च स्तरों पर कब्जा करने लगे। संसद में बहुमत सिद्ध करने के लिए सदस्यों की खरीद फरोक्त होने लगी। स्वाभाविक था कि पिछले दो दशकों में भ्रष्टाचार का पैमाना बोफोर्स सौदे के 64 करोड़ रुपयों से बढ़कर आज कामनवेल्थ गेम्स और 2जी स्पेक्ट्रम के हजारों, लाखों करोड़ रुपए तक जा पहुंचा।
भ्रष्टाचार में अत्यंत तीव्र गति से वृद्धि पिछले पांच- छह वर्षों में हुई है। आज यह इतना विकराल रूप ले चुका है कि न्याय प्रणाली, सेना और मीडिया भी इसके प्रकोप से ग्रसित हंै। इसका मुख्य कारण है पिछले पांच-छह वर्षों में केंद्र में शासन व्यवस्था से शर्मनाक खिलवाड़। जिसके चलते शासन की पूरी शक्ति ऐसे व्यक्ति के हाथों में है जिसकी संसद या जनता के प्रति कोई जवाबदारी नहीं है। इसके विपरीत शासन के उच्चतम संवैधानिक पद पर बैठाए गए व्यक्ति के पास अपनी कैबिनेट के किसी मंत्री को टोकने की भी शक्ति नहीं है। परिणाम है कैबिनेट के सभी मंत्री मनमानी करने में लगे हैं।
भ्रष्टाचार को समर्पित इसी कुशासन का परिणाम है कि देश की जनता दमघोंटू महंगाई से त्रस्त कराह रही है। नक्सलवाद पनप रहा है और आतंकवाद की काली छाया पसरी हुई है।
प्रश्न है कि इस विकराल समस्या से निदान कैसे मिलेगा! भ्रष्टाचार से निपटने का तरीका भी आम आदमी के हाथ में होता है। क्योंकि भ्रष्टाचार सिर्फ आम आदमी को ही सताता है। अभी हाल में आम आदमी ने बिहार में भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार किया है। बिहार के चुनाव में आम आदमी ने ऐसे व्यक्तियों को शासन के लिए चुना है जो हमारे पारंपरिक मूल्यों से अपना जीवन अनुशासित करते हैं। बिहार में आम आदमी ने वंशवाद की राजनीति करने वाले भ्रष्टाचारी नेताओं को धूल चटा दी। बिहार में सत्तासीन नेताओं ने भ्रष्टाचार के लिए दंडित सरकारी कर्मचारियों की सम्पत्ति जब्त करने का कानून बना कर पूरे देश को भ्रष्टाचार से निपटने का एक कारगर तरीका दिखाया है। प्रसन्नता की बात है कि मध्य प्रदेश सरकार भी ऐसा ही कानून बनाने जा रही है। देश की अन्य सरकारों को भी इसका अनुकरण करना चाहिए।
प्रसन्नता की बात है कि वर्ष के प्रथम सप्ताह में सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने स्वीकार किया कि आपातकाल में सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय कि आपातकाल में नागरिकों के मूलभूत अधिकार निष्क्रिय रहेंगे गलत था। वास्तव में सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय से आम नागरिकों को नववर्ष की शुभकामनाएं दी हैं।
हम अपने पारंपरिक मूल्यों का पालन करके ही भ्रष्टाचार से मुक्ति पा सकते हैं। हमारे पारंपरिक मूल्यों के अनुसार जीवन में सफल होने से ज्यादा महत्वपूर्ण है सफलता पाने का साधन। अतएव आइए हम सब लोग संकल्प लें कि सिर्फ ईमानदार व्यक्तियों को ही अपना वोट देंगे। इस प्रकार हम भ्रष्टाचार से मुक्त सुबह को संभव बनाने में कारगर प्रयत्न करेंगे।
सुधी पाठकों को नववर्ष की शुभकामनाएं।
- डॉ. रत्ना वर्मा

1 Comment:

Devi Nangrani said...

Adarneey Ratnaji
Is mudde ko uthakar aapne bahut accha kiya. Par kya janta yeh tai kar payegi ki Immandaar kaun hai. Aksar aisa bhi hota hai ki gurbat ko kharedne ke liye ameeri tatpar rahti hai. Haan janta Imandaandaar aur nishtavaan ho to baat ban sakti hai..

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