December 25, 2010

ब्रूस मिलसम की एक दिलचस्प समुद्री यात्रा

- प्रताप सिंह राठौर

राह बनी जब मंजिल
अपने जीवन को इस धरती पर एक तीर्थयात्रा मानने वाले यायावर मनुष्यों के व्यक्तित्व मुझे सदैव आकर्षित करते हैं। शायद इसलिए क्योंकि बचपन से ही मुझे यायावरी सर्वोत्तम मानवीय उद्यम लगने लगा था। यद्यपि कि मैं अपने जीवन में कभी- कभार ही देश- विदेश में यायावरी कर पाया हूं फिर भी चाहत आज भी उतनी ही तीव्र है। ऐसे में ज कभी भी कोई यायावर मिल जाता है तो उसके अनुभवों को सुनकर, जानकर सुखी होता हूं।
बात 1988 की है। मैं वाराणसी में रोजी- रोटी के चक्कर में था। वाराणासी विश्व में यायावरों के प्रिय स्थलों में ऊंचा स्थान रखता है। वहीं एक दिन एक अंग्रेज यायावर नवयुवक ब्रूस मिलसम से भेंट हुई। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करके ब्रूस विश्व भ्रमण पर निकल पड़े। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने आस्ट्रेलिया को केंद्र बनाया। वे वहां पर 2-3 महीने काम करके इतना कमा लेते हैं कि वर्ष के शेष 9-10 महीने वे किसी देश का भ्रमण कर सकें या समुद्र में नौकायन करते हुए प्रशांत महासागर में फैले असंख्य टापुओं में भ्रमण का अनिर्वचनीय आनंद ले सकें। मेरे विचार में जीना इसी का नाम है। भारत भ्रमण के संबंध में ब्रूस को मेरे सुझाव बड़े उपयोगी लगे। तबसे वे अपने यायावरी के अनुभवों से पत्रों द्वारा मुझे अवगत कराने लगे। ऐसा ही एक पत्र, जिसमें ब्रूस ने न्यूजीलैंड के आसपास बिखरे टापुओं के बीच नौकायन का वर्णन किया है, का अनुवाद -
पिछले साल समुद्री तूफान में मस्तूल टूट जाने के कारण कैरियाड (ब्रूस की नाव का नाम) बुरी तरह टूट गई थी पर उसे फिर से मरम्मत करके नई जैसी कर लिया है और तब से मेरा समुद्री पर्यटन विचित्र तरह का, पर बहुत ही दिलचस्प रहा है। गर्मी तो (कैरियाड की मरम्मत में) गुजर गई। मैं अब जाड़े में साउथ आइलैंड का समुद्री भ्रमण कर रहा हूं।
गर्मियों में भी मैंने दूसरों की और अन्य मछुआरों की नौकाओं पर जितना हो सका समुद्री पर्यटन किया। मैं टापू के दक्षिणी आधे भाग के आस- पास कई बार गया और उत्तरी आधे भाग की भी कुछ यात्राएं की। मैंने पैदल भी यात्राएं की। मैं एक मित्र के फार्म पर कुछ दिन ठहरा जहां मैंने गायों को दुहने, भेड़ों को चराने तथा भूसा ढोने में उसकी सहायता की। मारापूरी झील में मछली मारने गया तथा दो ट्राउट मछलियां मारी।
वहां से लौटकर कैरियाड में फिर से समुद्री पर्यटन प्रारंभ किया। मेरी पहली यात्रा स्टुअर्ट आइलैंड की थी। मैं एक हफ्ता पैटरसन इनलेट में ठहरा। वहां मुझे दो नाविक और मिल गए और हम सब लोग टापू के चारों ओर नौका में घूमे, इसमें हमें 10 दिन लगे। एक नाविक जो अंग्रेज था, हम लोगों को छोड़कर अपनी यात्रा पर आगे बढ़ गया पर दूसरा नाविक डेव मेरे साथ फियोरलैंड में नौकायान के लिए रूका रहा। हम लोग 23 अप्रैल को मेरे तीसवें जन्मदिन पर नाव से अपनी यात्रा पर निकले। यहां पर पूर्व की ओर बहने वाली हवा का मिलना दुर्लभ होता है लेकिन इस समय हम लोगों की किस्मत बुलंद थी जहां हमें बढिय़ा पुरवइया मिली जो हमारी नाव को पूरे रास्ते तेजी से पश्चिमी तट तक ले गई। हम लोग सीधे डस्की साउन्ड तक गए, क्योंकि रास्ते में पडऩे वाले चॉकी साउन्ड और प्रीजरवेशन इनलेट में मैं पहले ही मछली मारने के लिए घूम चुका था। डस्की साउन्ड में दूसरे दिन हमने कैप्टन कुक (जिन्होंने 18वीं शताब्दी में आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की खोज की थी।) से संबंधित कुछ ऐतिहासिक स्थानों की खोजबीन की। फिर हम लोग ब्लफ़ (एक छोटा सा समुद्री बंदरगाह और मछुआरों की बस्ती) के एक मछुआरे के निमंत्रण पर उसकी नौका पर एक दिन भ्रमण के लिए गये। जब हम लोग समुद्र में थे तो एक नाविक का हाथ कट गया अत: उसे तुरंत हवाई जहाज से चिकित्सा के लिए भेजना पड़ा। उसकी दोस्त भी उसके साथ चली गई। तब कप्तान ने मुझसे और डेव से पूछा कि क्या हम बाकी दिनों में मछली मारने में उसके नाविक का काम करेंगे? हम लोग सहर्ष तैयार हो गये।
लेकिन मछली तो बिल्कुल भी नहीं पकड़ी जा सकीं। अचानक ही सब क्रेफिश अन्र्तध्यान हो गईं। इसलिए हम दोनों पैसा तो कोई खास न कमा सके लेकिन हम लोगों को भोजन मिलता रहा और डाउटफुल साउन्ड तक की मुफ्त सैर भी।
साथ ही एक फ्लोट प्लेन (समुद्र से उडऩे व समुद्र पर उतरने वाला वायुयान) से तेअनाऊ तक की यात्रा और वहां के होटल में एक रात ठहरने को भी मिला। जब हम मछली मार रहे थे तो हम लोगों ने डस्की साउन्ड की खोजबीन भी एक नौका से की। हम लोगों ने मछली मारने का तीन हफ्ते तक काम किया। फिर कप्तान अपनी नौका लेकर ब्लफ़ लौट गया। डेव ने भी तय किया कि उसने फियोरलैंड काफी घूम लिया था अत: वह भी उसी के साथ वापस चला गया।
पर मेरा मन अभी नहीं भरा था अत: एकेरन पैसेज के रास्ते उत्तर की ओर ब्रेकसी साउन्ड की ओर चल दिया। मैं ब्रेकसी साउन्ड के छोर तक गया जहां चारों ओर हिमाच्छादित पर्वत थे। वहां से मैं ब्रेकसी साउन्ड के मुहाने की ओर लौटा तथा एक 110 फीट लम्बे लोहे के जहाज रेन्गिमी के पास अपनी नौका का लंगर डाला। रैन्गिमी वहां पर सदैव के लिए लंगर डाले बंधी हुई है। इसका मालिक एक परिवार है जो उसका प्रयोग गोताखोरी, मछली मारने और मौज मस्ती में छुट्टियां बिताने के लिए करते हैं। स्कूलों की छुट्टियां थी अत: पूरा परिवार रैन्गिमी पर ही था। मैंने भी उनके साथ गोताखोरी की और उन्होंने बाद में मेरा ऑक्सीजन टैंक भी भर दिया। हम लोगों ने एकेरान पैसेज में दो बार गोते लगाये। मैंने कुछ क्रेफिश पकड़ी तथा काला मूंगा भी देखा। आश्चर्य की बात यह है कि काला मूंगा जब तक समुद्र की तलहटी में रहता है सफेद होता है। हम लोगों ने साउन्ड में भी एक गोता लगाया। पर पिघलती हुई बर्फ के ताजे पानी के कारण वहां पर काफी ठंडा था तथा वहां देखने के लिए भी कुछ नहीं था। उस परिवार ने रैन्गिमी जहाज से प्रस्थान के पहले अपने हेलीकाप्टर में भी मुझे एक छोटी सी हवाखोरी कराई। फिर वह सब लोग हेलीकाप्टर से चले गये। मैं भी अपनी नौका खोलकर डाग साउन्ड की ओर चल दिया। चूंकि हवा नहीं चल रही थी अत: यह नौकायन मजेदार नहीं था पर दूरी भी ज्यादा नहीं थी। मैं जब डाग साउन्ड में प्रवेश कर रहा था तो पानी बरसने लगा और साथ ही धूप भी निकली हुई थी। सम्पूर्ण इन्द्रधनुष निकला हुआ था। एक किनारे से दूसरे किनारे तक। पानी में उसकी परछाई नौका के पास से गुजर रही थी। यह इन्द्रधनुष मुझे अपने साये में एक घंटे तक साउन्ड में 5 मील तक लिये चला गया। जब तक कि 19 मिलीमीटर फिशआई लेन्स का कैमरा न हो इस खूबसूरत इंद्रधनुषीय दृश्य का चित्र लेना असंभव होगा।
अगले दिन भी हवा इतनी हल्की थी कि मुझे नौका पूरे दिन नैन्सी साउन्ड तक इंजन से ही चलानी पड़ी। जिस कव में मैंने अपनी नौका का लंगर डाला उसमें आगे पीछे बस इतनी ही जगह थी कि एक नौका ही आ सके। अत: मैं घूमकर टामसन साउन्ड होता हुआ ब्रैडशा साउन्ड पहुंचा। अगले दिन मैं डाउटफुल साउन्ड गया जो बगल में ही थी। अत: मुझे खुले समुद्र में नहीं जाना पड़ा। मुझे पहली बार ढाई घंटे तक फियोरलैंड में आनंददायक नौकायान का मजा मिला। मैं डीप कव पहुंचा और वहां कुछ दिन रूका। मैंने इंजन का पंखा निकाल कर मरम्मत की तथा पंखे को इंजन में मजबूती से बांधे रखने के लिए एक नई चाबी बनाई। यह सब करते हुए अच्छा हुआ कि कोई चीज उस गहरे कव में नहीं गिरी।
रविवार के अपरान्ह में मैं सामने के पन- बिजलीघर को देखने गया। वहां काम करने वाले एक व्यक्ति ने मुझे पूरा पन-बिजलीघर दिखाया। फिर हम लोग मारापुरी झील के आर- पार बिजलीघर की नौका से गये। सोमवार को मैं एक ट्रक में सी अर्चिन लेकर ब्लफ़ तक गया और ट्रक को वापस लाया। एक व्यक्ति ने मेरे साथ मेरी नौका पर सैर करने को कहा तो उसे लेकर हम लोग बुधवार को दक्षिण जाने के लिए तैयार हुए। बृहस्पतिवार को हवा शांत थी अत: पूरे रास्ते हमें इंजन चलाना पड़ा। हम लोगों ने अपनी नौका एकेरान पैसेज में किनारे के वृक्षों से बांधी। हम ने नौका से मछली मारने वाली डोरियां डाली और कुछ ही मिनटों में अपना डिनर पकड़ लिया। शुक्रवार को फिर हवा नहीं चल रही थी अत: हमें इंजन चलाना पड़ा।
इसके बाद हम प्रीजरवेशन इनलेट पहुंचे। शनिवार को इनलेट के छोर तक पहुंच गए और वहां के झरने पर चढ़े। रविवार के लिए मौसम की भविष्यवाणी थी कि पश्चिम से बढिय़ा हवा चलेगी। अत: हम उस उम्मीद से चल निकले पर हवा बहुत हल्की थी अत: हमारी चाल बहुत धीमी रही और कई बार तो हमारी नाव बिल्कुल स्थिर ही हो गई। पर आधी रात के बाद हवा बढिय़ा चलने लगी और हमारी चाल काफी तेज हो गई। फोवोक्स स्ट्रेट के बीच में से हम ब्लफ़ रात को 9 बजे पहुंच गये। इसी के साथ मेरा शीत कालीन नौकायान समाप्त होता है। अब मैं 48 घंटे नौकायान कर सीधे क्राइस्ट चर्च (नगर) पहुंचने की योजना बना रहा हूं जहां मुझे विश्वास है बाकी बचे शीतकाल के लिए कोई काम अवश्य मिल जाएगा।
***
देश व दुनिया के बारे में जानने के लिए पढऩे तथा यात्रा के शौकीन प्रताप सिंह राठौर का जन्म स्थान उत्तर प्रदेश फतेहगढ़ (फर्रूखाबाद) है। अंग्रेजी साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने बैंक में नौकरी की। वे भारतीय साहित्य, संस्कृति, इतिहास, समाज शास्त्र तथा नेचरल साईंस से संबधित हिन्दी अंग्रेजी किताबों का निरंतर अध्ययन करते हैं। इतिहास व सामाजिक विषयों पर विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में आलेख एवं संस्मरण प्रकाशित हो चुके हैं, उन्होंने भारत के साथ यूरोप का विस्तृत भ्रमण किया है।
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