September 21, 2010

आपके पत्र/ मेल बॉक्स

जागरूकता जरूरी
गुड़ाखू के गुलाम पढ़ा अच्छा लगा। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के अपने 11 वर्ष के प्रवास में मैं भी इसका दुरुपयोग देख चुका हूं। जागृति न होने के कारण न जाने कितने मासूम इसका खमियाजा भुगतेंगे। इसके लिए जनजागरण की नितान्त आवश्यकता है ।

- रामेश्वर काम्बोज हिमांशु , मुम्बई
rdkamboj@gmail.com
पीपली लाइव के बहाने
उदंती का नया अंक देखा। हमेशा की तरह बहुत सुन्दर है । पीपली लाइव पर तो इस समय दुनिया भर की निगाह है। आपने नए ढंग से प्रकाश डाला है। चोला माटी के ... पूरा पढ़ कर आनंद आया। अन्य सामग्री में डिजायनर टंकी अच्छी लगी। चित्रकार महेशचंद्र शर्मा का काम बहुत सुन्दर है। बधाई।
- जवाहर चौधरी, इंदौर
jc.indore@gmail.com
आकर्षक एवं कलात्मक
उदंती जैसी पत्रिका रायपुर से निकल रही है और आज तक मेरी आंखों के आगे से नहीं गुजरी इसका दुख है। बहुत ही आकर्षक कलात्मक एवं सुरूचिपूर्ण एवं पर्यावरण से ओतप्रोत रचनाएं हैं। कुल मिलाकर हमारे राज्य को गौरवान्वित करने की सजग क्षमता। वैज्ञानिक सोच को रेखांकित करने वाला ऐसा प्रयास मैंने नहीं देखा। हां पत्रिका का साहित्यिक एवं सांस्कृतिक एप्रोच थोड़ा कमजोर लगा।
- रामेश्वर वैष्णव, रायपुर
सार्थक सवाल
कानून के जंगल में न्याय का अकाल पढ़कर अच्छा लगा। आपने बहुत ही सार्थक सवाल को उठाएं हैं। न्याय के अभाव में सार्थक विकास संभव नहीं हो पाता और ईमान के आभाव में कानून सार्थक नहीं हो पाते। विडंबनाओं के इस मकडज़ाल पर चिंता के लिए आप को साधुवाद।
- सुरेश यादव, दिल्ली
sureshyadav55@gmail.com
कहानी नहीं सत्य घटना
उदंती का अंक पहली बार देखने का अवसर मिला और सहसा विश्वास नहीं हुआ कि अपने शहर से इतनी बेहतरीन पत्रिका निकल रही है। कहानी एक और द्रौपदी हाल ही में घटी सत्य घटना है इसे कहानी कहकर समाज के निकृष्ट कार्य को कहानी का छद्म आवरण देने की कोई जरूरत नहीं थी जो विषय की गंभीरता को कमजोर कर देता है। पता नहीं क्यों लेखक इसे सत्य घटना के रूप में प्रस्तुत करने से हिचक गया। छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक स्थलों का वर्णन प्रदेश की संपदा को उद्घाटित तो करता ही है आमंत्रित भी करता है प्रकृति प्रेमी सैलानियों को। हां संपादकीय अवश्य कुछ हथियार डालते हुए सैनिक सा लगा। पत्रिका की कीर्ति समूचे साहित्य जगत में पहुंचे, ऐसी कामना करता हूं।
- के. पी. सक्सेना, टाटीबंध, रायपुर
सम्पूर्ण पत्रिका
हिमांशु जी की छोटे बड़े सपने और कट्टरपंथी दोनों ही अच्छी लघुकथाएं हैं। बधाई। उदंती पहली बार नेट पर देखने को मिली। कुछ नए पुराने अंक भी देखे। गरीबों का मसीहा लघुकथा में अच्छा व्यंग्य किया गया है। दूसरी लघुकथाएं और अन्य सामग्री भी अच्छी हैं। कुल मिलाकर एक सम्पूर्ण पत्रिका है उदंती।
- पवित्रा अग्रवाल
काश इनके सपने पूरे हों
दोनों लघु-कथाएं एक से बढ़कर एक हंै। बच्चों के सपने बच्चों जैसे ही मासूम होते हैं। काश इन जैसे बच्चों के ऐसे सपने पूरे हो जाएं! दूसरी लघुकथा पढ़ते- पढ़ते मेरी तो जैसे सांस ही रुक गई कि आगे क्या होने वाला है... इससे बढ़कर और इन्सानियत क्या होगी ?
- डॉ. हरदीप संधु, सिडनी
shabdonkaujala@gmail.com
विषयों में विविधता
पहली नजर में अंक पढऩे की उत्सुकता बढ़ाता है। विषयों में विविधता है।
- डॉ. प्रेम जनमेजय, नई दिल्ली
प्रासंगिक सामग्री
इतनी सार्थक और प्रासंगिक सामग्री उदंती में देने के लिए धन्यवाद। पीपली लाइव के बहाने फिल्म के बारे में रोचक जानकारी मिली, राहुल सिंह को धन्यवाद, शुभकामनाओं सहित।
- सुधा अरोड़ा, मुंबई- 400076
sudhaarora@gmail.com

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लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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