June 05, 2010

गर्मी और प्रदूषण दोनों से राहत देने वाला

कुदरती एयरकंडीशनर
- विकास तिवारी
कुदरत की शक्ति में ही बेहतर एयरकंडिशनिंग का विचार निहित है। खासकर सूरज की तपिश में। उन्हें दस साल से ज़्यादा समय के बाद इस सवाल का एक जवाब मिल ही गया कि आखिर रात के प्राकृतिक समय की ठंड को कैसे कैद किया जाए और बाद में इसका इस्तेमाल इमारत को गर्म रखने के लिए किया जाए।
ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते दिन-ब-दिन बढ़ रही गर्मी के कारण आज पूरी दुनिया में एयरकंडीशनर की मांग तेजी से बढ़ती जा रही है। परंतु वर्तमान में उपयोग किए जाने वाले एयरकंडीशनर भी प्रदूषण को बढ़ावा देने वाले ही होते हैं। लेकिन हमें खुश इसलिए होना चाहिए क्योंकि जर्मनी के वैज्ञानिकों ने इको फ्रेंडली एयरकंडीशनर बनाने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया है।
म्युनिख में फ्राउएनहोफर इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने एक हाईटेक बिल्डिंग मटैरियल तैयार किया है। ये असल में मोम की नन्हीं गिट्टियां हैं जो दीवारों में पैबस्त कर दी जाएं तो बन जाता है इको फ्रेंडली एयरकंडीशनर। इमारतों और मकानों के निर्माण में जो बात अब ध्यान दी जाने लगी है कि गर्मियों के मौसम में अंदर का तापमान कैसे ख़ुशनुमा रखा जाए। ग्लोबल वॉर्मिंग की चिंताओं के बीच गर्मियों में मौसम में ऊंचे तापमान रिकॉर्ड किए जा रहे हैं और एसी की खपत बढ़ गई है लेकिन इस वजह से खतरा भी बढ़ गया है, कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का।
पर्यावरण से जुड़ी इसी चिंता को दूर करने की दिशा में फ्राउएनहो$फर इन्स्टीट्यूट फॉर सोलर एनर्जी सिस्ट्मस आईएसई में कार्यरत प्रोफेसर फोल्कर विटवर के दिमाग में यह विचार आया, जिनका मानना है कि कुदरत की शक्ति में ही बेहतर एयरकंडिशनिंग का विचार निहित है। खासकर सूरज की तपिश में। उन्हें दस साल से ज़्यादा समय के बाद इस सवाल का एक जवाब मिल ही गया कि आखिर रात के प्राकृतिक समय की ठंड को कैसे कैद किया जाए और बाद में इसका इस्तेमाल इमारत को गर्म रखने के लिए किया जाए।
अपने सहयोगी पीटर शौशिग के साथ प्रोफेसर विटवर ने लेटेंट हीट सेवर्स पर काम शुरू किया। इनका इस्तेमाल मोम, खासकर पैरेफिन के साथ किया जाता है। कमरे की असहनीय गर्मी को काबू में करने के लिए ये पदार्थ दीवारों में गर्मी को कैद कर लेते हैं और उसे इधर-उधर फैलने से रोकते हैं।
असल में ये काम भौतिकी के उस नियम के तहत होता है जैसा एक ग्लास में बर्र्फ के एक टुकड़े के पिघलते समय देखा जाता है। आइस क्यूब को जब गर्म किया जाता है तो वह पिघलने लगती है। लेकिन उसके आसपास का पानी तभी गर्म होता है जब बर्फ का आखिरी कण पिघल जाता है।
वैक्स के इन कैपश्यूलों को रात में ठंडा और सख्त होना होता है ताकि अगले दिन वे फिर से काम कर सकें। इसका मतलब ये हुआ कि ट्रॉपिकल इलाकों में ये बहुत कारगर नहीं हैं, जहां तापमान बहुत स्थिर रहता है। लेकिन वैज्ञानिक एक ऐसे सिस्टम पर काम कर रहे हैं जहां कैपश्यूलों को दीवार पर पानी के छिड़काव से ठंडा रखा जा सकता है।
विटवर के अनुसार कैपश्यूलों का इस्तेमाल कूलिंग के दूसरे उद्देश्यों के लिए किया जाता है। उनका कहना है कि कई चादरों और डाइविंग पोशाकों में इसका इस्तेमाल होता है। आने वाले समय में इलेक्ट्रिक कारों में भी कूलिंग बैटरियों में इन कैपश्यूलों का इस्तेमाल किया जा सकता है। मौसम के बढ़ते तापमान को देखते हुए यही उम्मीद की जानी चाहिए कि यह इको फ्रेंडली एयरकंडीशनर शीघ्र ही बाजार में आए ताकि गर्मी और प्रदूषण दोनों से हमें राहत मिले।

0 Comments:

लेखकों से अनुरोध...

उदंती.com एक सामाजिक- सांस्कृतिक वेब पत्रिका है। पत्रिका में सम- सामयिक मुद्दों के साथ पर्यावरण को बचाने तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों को प्राथमिकता से प्रकाशित किया जाता है। समाजिक जन जागरण के विभिन्न मुद्दों को शामिल करने के साथ ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर से जुड़े लेखों और साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे कहानी, कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, निबंध, लघुकथाएं और संस्मरण आदि का भी समावेश किया गया है। उपर्युक्त सभी विषयों पर मौलिक अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है। आप अपनी रचनाएँ Email-udanti.com@gmail.comपर प्रेषित करें।

माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

उदंती.com तकनीकि सहयोग - संजीव तिवारी

टैम्‍पलैट - आशीष